डॉ ध्रुवपाल सिंह की कविताएँ

1.
प्रश्न विज्ञान से
सिद्धांतमय हो तुम
श्रेष्ठतम का भाव
उत्कृष्ट बुद्धिमत्ता
क्यों खड़े हो आज किंकर्तव्यविमूढ़ ?
विश्व विजय के अहं में चूर
तुम किस दिशा में भटक गये
जीवन रक्षक मानवता के पोषक,
फिर ये रक्तबीज कहाँ से प्रकट हुए ?
भौतिक सुख साधन देने वाले
परमाणु से ऊर्जा लेने वाले
मानवता की जंग लड़ने वाले
किन हाथों से तुम फिसल गए ?
2.
प्रश्न मुनष्य से
कर संक्रमित का परित्याग
निष्ठुर बन बैठ गये
एक पल में अपनापन भूल गये
हे मानव ये कैसी मानवता ?
नर में नारायण का दर्शन
उस नर को निरीह छोड़ देना
एकांतवास कर माला जपते
हे मानव ये उपासना कैसी ?
माना कुछ वैधानिक मजबूरी
बहुत जरूरी तन से तन की दूरी
तुम अपनी जान बचाने को
मन मे दूरी क्यों कर बैठे?
विधि विधान सब व्यस्त हुआ
तेरी जान बचाने को
तू फिर भी क्यों कायरता कर
क्यों पत्थर बरसाता उन पर ?
3.
प्रश्न समाज से
माना कि विपदा भारी है
कृन्दन है जग में चहुंओर
आपद धर्म निभाने को
रुक गया विश्व का हरेक छोर
फिर भी गणित लाभ हानि का क्यों ?
शूरवीर हैं डटे हुए
कर्तव्य पथ पर न्यौछावर हैं
दुबका बैठा जब जग सारा
सब छोड़ हैं प्रहरी डटे हुए
फिर भी ये कटुता निंदा क्यों ?
धन दौलत पद प्रतिष्ठा सब चूर हुए
मतिभ्रम वो सारे दूर हुए
याद आ गए गांव खलिहान
अहम वहम सब टूट गए
फिर भी ये पागलपन क्यों ?
4.
प्रश्न स्वयं से
''अह्म ब्रह्मास्मि''
ये नशा काफूर हुआ
समरथ गोसाईं भी दोषयुक्त
धरती पर पड़े हिम शिखर
पर अहम अभी भी बाकी क्यों ?
दवा खोजने को आतुर,
अभी समझ ना आयी बीमारी
विकट मृत्यु तांडव का भय
रे मानव तेरी लाचारी
पर वहम अभी तक बाकी क्यों ?
ध्वस्त किले, ढह गए महल
वीरान पड़ा ये विश्व सकल
औंधे मुंह पड़ी है भौतिकता
सिसक रही सब विलासिता
फिर भी मन मे ये चंचलता क्यों ?
--
1- प्रश्न प्रकृति से
निष्ठुर दोहन जब बंद हुआ
जल, मिटटी, वायु हुए शुद्ध
मानव जनित प्रदूषण युक्त
स्वच्छंद, स्वतंत्र, पावन, निर्मल
शायद अब धरा सुकून में है !
जीव जगत के वासों में
अब दखल नहीं किसी का है
कूकती कोयल बागों में
भ्रमर का गुंजन डालों में
शायद अब बसंत उपवन में है !
पेड़ों की शाख सुरक्षित है
ओजोन कवर भी रक्षित है
ना धुंध धुंएँ के बादल हैं
ना पानी में अब विष है
शायद मंद पवन खुश है !
2- प्रश्न भगवान से
सकल विश्व सहमा सहमा
सब सीमाओं में बंधा हुआ
क्रूर काल विषाणु का
चहुँ दिशा में कृन्दन मचा हुआ
क्यों कर श्रृष्टि पर यह कोप हुआ !
विज्ञानं ज्ञान सब मौन हुआ
सब तंत्र हुआ बेहद बेबस
मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे बंद
तांडव का दानव बेख़ौफ़ हुआ
क्यों कर कोविड मदहोश हुआ !
जग में भीषण ख़ामोशी
मन में भाव उदासी का
जन जन में मचा कोहराम
आलम चहुँदिशा बेबसी का
दया सिन्धु आँखें खोलो, अब बहुत हुआ !
3-प्रश्न अभिमान से
क्यों तलवारें म्यान में हैं
क्यों बेदम गोले बारूद हुए
क्यों बिना बात गरजने वाले
भयाक्रांत खामोश हुए
क्यों बंद बोलती शूरों की ?
बडबोलापन खामोश हुआ
जुबाँ बंद दुनिया के ठेकेदारों की
बंद पड़े सब एम एन सी
बंद पड़ा विश्व का कारोबार
क्यों नीति ध्वस्त गद्दारों की ?
क्यों धुल धूसरित योद्धा हैं
क्यों फटे हाल पुरोधा हैं
क्यों खुद को मालिक कहने वाले
नौकर बनकर भी जिन्दा हैं
क्यों हेकडी सब काफूर हुई ?
--
डॉ ध्रुवपाल सिंह
उत्तर प्रदेश शासन
Comments
Post a Comment
Ask me anything here...