उत्तराखण्ड की लोक कथा - घुघूती, भै भूखू, मैं सूती - डॉ. उमेश चमोला

उत्तराखण्ड की लोक कथा

घुघूती, भै भूखू, मैं सूती

- डॉ. उमेश चमोला

बहुत पहले की बात है। एक लड़की थी । उसका नाम घुघुती था । उसकी शादी बहुत दूर के गाँव में हुई थी । जब घुघुती की शादी हुई थी, उस समय उसका भाई चैतू बहुत छोटा

था । दीदी की विदाई के समय चैतू उसके साथ जाने की जिद करने लगा । उसकी माँ ने कहा, ‘‘ तुम अभी बहुत छोटे हो । जब तुम बड़े हो जाओगे तो दीदी के ससुराल दीदी से मिलने चले जाना।‘‘ समय बीतता गया । चैतू धीरे - धीरे बड़ा होता गया । जब भी फूल संक्रान्ति के दिन बच्चे घर -घर की देहरी में बुरांस और प्योंली के फूल डालते, चैतू को घुघुती की बहुत याद आती । होली, दशहरा, दीपावली, मकरैण आदि त्योहारों में चैतू को घुघुती की खुद लग जाती । उसे जब भी हिचकी लगती वह कहता, ‘‘ मुझे दीदी याद कर रही है।‘‘ तीज त्योहारों में गाँव की स्त्रियां मायके आ जाती , चैतू उन्हें देखता तो सोचता,‘‘काश मेरी दीदी भी यहाँ आ जाती तो वह बहुत खुश हो जाता । वह भी दीदी के लिए अरसे तैयार होते देखता ।‘‘

एक दिन चैतू ने अपनी माँ से कहा,‘‘ माँ! बहुत साल हो गए दीदी से मिले हुए । अब तो मैं बड़ा भी हो गया हूँ । मुझे दीदी के ससुराल जाने की आज्ञा दे दो ।‘‘

‘‘ बेटा! माता-पिता के लिए अपने बच्चे हमेशा छोटे ही रहते हैं। तुम्हारी दीदी का ससुराल यहाँ से बहुत दूर है। वहाँ पहुँचने के लिए कई दिनो तक पैदल चलना पड़ता है। घनघोर जंगल को पार करना पड़ता है। रास्ते में कई हिंसक जानवरों से भी सामना करना पड़ सकता है। वहाँ का रास्ता ऊबड़ खाबड़ है, चढ़ाई और उतराई का रास्ता है। गाड गदेरों को पार करना पड़ता है। वहाँ तुम्हारा अकेला जाना ठीक नहीं है।‘‘ - उसकी माँ ने कहा ।

वह जिद पर अड़ा रहा । उसकी जिद के आगे उसकी माँ की एक न चली । उसे चैतू को घुघुती के ससुराल जाने के लिए हाँ करनी ही पड़ी । उसकी माँ ने उसे कुल देवता भैरव की बभूत और फटिंग (चमकने वाला पत्थर) के कुछ गारे ( टुकड़े) देते हुए कहा,‘‘ रास्ते में तुम्हें डर लगेगी तो यह बभूत और फटिंग के गारे अपने साथ रखने से तुम्हें हिम्मत मिलेगी । तुम कुलदेवता के आशीर्वाद से घुघुती के पास पहुँच जाओगे। बेटा! वहाँ दीदी से मिलकर जल्दी वापस आ जाना । मैं भी बूढ़ी हूँ । पता नहीं कब ऊपर वाले के घर से मुझे बुलावा आ जाए ।‘‘

चैतू अपने घर से दीदी के ससुराल जाने के लिए तैयार हो गया । उसकी माँ ने घुघुती को देने के लिए अरसे (कुटे हुए चावलों से बना हुआ पकवान) एक पोटली में दे दिए । घुघुती के लिए उसकी माँ ने एक सोने की जंजीर भी दे दी ।

चैतू चलता गया । कई दिन ऊबड़ खाबड़ जंगल के कठिन रास्तों से गुजरते हुए आखिर चैतू घुघुती के ससुराल पहुँच ही गया । जब वह घुघुती के विश्राम कक्ष में पहुँचा तो उसने देखा कि घुघुती सो रखी थी । उस जमाने में किसी को नींद से जगाना पाप माना जाता

था । चैतू उस कक्ष में रात भर घुघुती के उठने की प्रतीक्षा करता रहा। घुघुती उठी ही नहीं। उसने सोई हुई घुघुती के गले में सोने की जंजीर डाल दी । उसने घुघुती के कक्ष के खदरे (चीजों को रखने के लिए कमरे की दीवार में बनाई गई छोटी जगह) में अरसे की पोटली रख दी । उसे अपनी माँ के कहे शब्द याद आए ‘‘ बेटा! वहाँ दीदी से मिलकर जल्दी वापस आ जाना । मैं भी बूढ़ी हूँ । पता नहीं कब ऊपर वाले के घर से मुझे बुलावा आ जाए ।‘‘

घुघुती अभी भी नहीं जगी । चैतू ने घुघुती के लिए एक पत्र लिखकर वहाँ छोड़ दिया ।

वह घुघुती के ससुराल से वापस अपने घर की ओर चल पड़ा ।

चैतू के जाने के बाद घुघुती की नींद टूट गई । उसने अपने गले में पड़ी सोने की जंजीर देखी । उसे आश्चर्य हुआ । तभी उसकी नजर खदरे में रखी अरसे की पोटली पर पड़ी । उसने चैतू का लिखा हुआ पत्र पढ़ा । उसे पता चल गया कि उसका भाई उससे मिलने के लिए यहाँ आया था । उसके मुँह से शब्द फूट पड़े,‘‘ घुघुती! भै भूखू, मैं सूती ‘‘ (मैं घुघुती, मेरा भाई भूखा रहा, मैं सोती रही ।) उसकी आँखों से टप- टप आँसू गिरने लगे । कुछ देर बाद वह अपने भाई की खुद (याद) में मर गई । मरने के बाद वह एक पक्षी घुघुती (फाख्ता ) बन गई । लोक मान्यता है कि बसंत के समय आज भी वह घुघुती पक्षी के रूप में यही दोहराती है-‘‘ घुघुती! भै भूखू, मैं सूती ‘‘।

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