प्रीति शर्मा "असीम " की कविताएँ

महाराणा प्रताप

वीर भूमि राजस्थान का,
  वह वीर प्रताप राणा था ।
जिसके साहस से कांप गया।
अकबर ने लोहा माना था ।

7 फुट के वीर का ,
72 किलो का भाला था ।
200 किलो का कवच पहनकर।
चेतक पर चलता,
आजादी का वीर मतवाला था।

वीर भूमि राजस्थान का ,
वह वीर प्रताप राणा था ।

विधर्मी बनाना ना स्वीकार किया ।
40000 की सेना से ,
अकबर की,
  सवा लाख सेना को मारा था ।

हर बार अकबर को हार दी,
  देशभक्ति का ,
  प्रताप जगत ने माना था ।

धन्य वीरभूमि राजस्थान की।
  महाराणा प्रताप वीर महान की।
  युग -युग गाएगा गाथा विश्व ।
आत्मसम्मान के महाप्राण की।


प्रीति शर्मा "असीम"
---

मुझे .......अफसोस रहेगा ।

जिदंगीयों को,
अंधविश्वासों से दूर ले जाता ।

प्यार से जिंदगी है।
  यह बात समझा पाता।

विश्वास का,
एक छोटा-सा ही सही।
पर... एक घर बना पाता।

समझ कर भी,
न-समझी का खेद रहेगा।

मुझे .......अफसोस रहेगा।

अंधेरे दूर हो जायें,
दिलदिमाग से भरमों के।

अंधविश्वास की सोच से,
निकाल कर,
जो तर्क समझा पाता।

चिराग तो बहुत जलायें।

लेकिन........?

चिरागों तले जो रहे अंधेरे,
उन्हीं का भेद रहेगा।

मुझे ......अफसोस रहेगा।
 
जिदंगी ईश्वर की अमूल्य नेमत।

नही दे सकता।
किसी बाबा का....कोई धागा।

हिम्मत से संवारो ,
अपने जीवन को।

न खोना,
बहमों में अपने ,
आज और कल को।

भटकन को अपनी समेट कर।
ईश्वर का सत्य -संवाद रहेगा।

और तब तक वेद- विज्ञान रहेगा।
फिर न कोई खेद और न भेद रहेगा।

समझ जायें तो.... अच्छा है।
फिर न कोई अफसोस रहेगा।
-----

सीता की अग्नि परीक्षा..... ..कब तक

सीता की अग्नि परीक्षा ...कब तक

नारी के आत्मसम्मान पर,

उठते रहेगें ।
प्रश्न????
  शायद जब तक।

सीता की अग्नि परीक्षा ...तब तक।


जब तक नारी तुम मूक रहकर,

सब सहती जाओगी।
भीख में कैसी...... इज्जत पाओगी।

बस हां में हां मिलाओंगी

तब तक तुम देवी रूप पूजी जाओगी।


तुम्हारे विद्रोह का ......एक शब्द,

विचलित ना कर दे,

"पुरुष "अहम को जब तक

सीता की अग्नि परीक्षा ....तब तक।


नारी के आत्मसम्मान पर

उठेंगे प्रश्न जब तक।

खोखले आदर्शों की वेदी पर

सती होगी तुम तब तक।


आंखों में नमी पर होठों पर हंसी

लेकर हंसोगी जब तक।

अपने आत्मसम्मान के लिए

लड़ोगी जब तक।


सीता की अग्नि परीक्षा होगी
हर नारी रूप में तब तक।

 
प्रीति शर्मा "असीम "
नालागढ़ ,हिमाचल प्रदेश
--

मजदूर

कभी इंटे उठाता।
  कभी तसले ,
मिट्टी  के भर -भर ले जाता।

पीठ पर लादकर ,
  भारी बोझे,
  वह चंद सिक्कों के लिए ,
एक मजदूर ,
कितना मजबूर हो जाता।

ना सर्दी ,
ना गर्मी से घबराता।
मजबूरी का ,
फायदा ठेकेदार उठाता।

इतने पैसे ......नहीं मिलेंगे।
मन मारकर ,
जो देना है ..........!!!!!!!!
दे दो मालिक ,
कह कर चुप रह जाता।

मजदूर अपनी,
  मेहनत का ,
  आधा हिस्सा भी ना पाता।
  कितना मजबूर होकर रह जाता।‌।
  --
 
  मां बगलामुखी जयंती विशेष

जय मां बगलामुखी

पीतांबरा है नाम तुम्हारा।
दसमहाविद्या में आठवां स्थान तुम्हारा ।।

सिद्धिदात्री तुम कहलाती ।
वाक् सिद्धि को सिद्ध कर जाती।।

वाद -विवाद में विजय दिलाती।
  शत्रु का स्तम्भन कर जाती ।।

पीतरूप मां को है प्यारा ।
  जन -जन को लगे हैं न्यारा।।

पाप पाखंड को दूर है करती ।
  शत्रु की जीवा को हरती ।।

"वीर रात्रि" की जो साधना करता।
  छत्तीस अक्षर मन में धरता।।

कमी कोई रहने ना पाएं ।
तंत्रिका -मंत्रिका सिद्ध कर जाएं।

बगला सिद्ध विद्या वह पाएं।
एकाक्षरी मंत्र  जो सिद्ध करे जाएं।

हर संकट से मां बचाएं।
  बुद्धि- सिद्धि जय मां से पाएं।

वीरवार को ध्यान जो करता।
  मां से उसको ज्ञान है मिलता।।


प्रीति शर्मा "असीम "
नालागढ़ हिमाचल प्रदेश

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