निलेश जोशी "विनायका" की कविताएँ

होगी विजय
कर धैर्य धारण है मनुज
इस विकट भयंकर काल में।
रख हौसला अपने ह्रदय में
गति रोककर संयम बरत।
हर युद्ध की नीति अलग
इतिहास को भी जान ले।
जब शत्रु हो हमसे प्रबल
जा दूर उससे हो अदृश्य।
दे तोड़ उसकी हर कड़ी
कमजोर कर क्षण क्षण उसे।
संकल्प ले निश्चित विजय का
निडर बन विश्वास दृढ़।
कहर कुदरत का कठिन
दंड का रोना क्या रोना।
विष विषाणु से विक्षिप्त विश्व
अदृश्य हो संग्राम कर।
तांडव कोई भी कोरोना का
टिक अधिक नहीं पाएगा।
होगी विजय है भरत पुत्र
धीरज धर घर में ठहर।
निलेश जोशी "विनायका"
बाली, पाली (राजस्थान)
तालाबंदी की घोषणा
लॉकडाउन की कीमत हमने
बहुत देर से जानी है।
धीरे-धीरे समझ रहे हम
सब की यही कहानी है।
जनता कर्फ्यू की बात नयी
बात सभी ने मानी थी।
ताली थाली ढोल बजाकर
शंखनाद की ठानी थी।
शुभ ध्वनि गूंजी घर-घर में
विस्मृत संस्कृति का मान किया।
हुई तरंगित दसों दिशाएं
प्रकृति ने अमृत पान किया।
दुनिया दहक उठी जिस भय से
लड़ने का अभियान किया।
विश्वासघात करके विषधर ने
खुद को जग में बदनाम किया।
अति क्रूर विषाणु कोरोना ने
मानव मन पर आघात किया।
जीवन के बढ़ते सुंदर पथ में
महामारी का वज्रपात किया।
अदृश्य शत्रु की मार भयंकर
किसको मारे किस का संहार करें।
किसके विरुद्ध युद्ध करें हम
किसका हम उद्धार करें।
शक्तिशाली देश विश्व के
अपारशक्ति के पुंज बड़े थे।
कमर टूट गई उनकी अब
विपदा में उनके हाथ खड़े थे।
धीरज धरकर भारत ने
रचना व्यूह की कर डाली।
अपनों की रक्षा के हित में
तालाबंदी घोषित कर डाली।
रहे सुरक्षित सब अपने घर में
संबल दे सबको भय दूर करें।
सामाजिक दूरी में रहकर
वायरस को चकनाचूर करें।
निलेश जोशी"विनायका"
बाली, पाली (राजस्थान )
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प्रथम प्रेम
बलखाती काली केश लटें
नागिन बन मुख पर लोट गई।
खंजर उन तिरछे नयनों का
उर के द्वारे पर घोंप गई।
मन सिहर उठा स्पंदन से
मधु पान करा वो नार गई।
वह मादकता मधुराधर की
यूं प्रणय पाश में फांस गई।
जो मर्म छुपाये थी हिय में
बातों बातों में बोल गई।
प्यासे तपते मरुधर में
वर्षा का अमृत घोल गई।
मन की उजड़ी हुई बस्ती में
संचित पूंजी वो छोड़ गई।
पतझड़ से सूखे उपवन में
नव पल्लव पुष्प सी डोल गई।
पहली बात हुई जिस पल में
हृदयों के बंधन जोड़ गई।
क्षण स्तब्ध थे मधु घड़ियों में
जीवन की धड़कन मोड़ गई।
प्रथम प्रेम की छुअन में
अपना सब कुछ वो हार गई।
अनंत प्रेम के सागर में
डूबा मुझको वह तार गई।
निलेश जोशी "विनायका"
बाली, पाली (राजस्थान)
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श्रम साधक को विश्राम नहीं
करता दिन-रात परिश्रम है।
यह श्रम का बड़ा पुजारी है।
पल भर भी आराम नहीं।
श्रम साधक को विश्राम नहीं।
इसकी राह कठिन बहुत है।
मंजिल पाने की चाह बहुत है।
मन में इसके विराम नहीं।
श्रम साधक को विश्राम नहीं।
लक्ष्य भेद की चाहत है।
अधरों पर जीत की राहत है।
आलस का कोई काम नहीं।
श्रम साधक को विश्राम नहीं।
तेरे कर्मों से जीवित जग है।
स्वेद कणों से सिंचित जग है।
अपनी पीड़ा का ज्ञान नहीं।
श्रम साधक को विश्राम नहीं।
अन्न खेतों में उपजाता है।
खुद भूखा सो जाता है।
लेता कभी विश्राम नहीं।
श्रम साधक को विश्राम नहीं।
यह तेरा खून पसीना है।
तुझे निर्धनता में जीना है।
बिन तेरे निर्माण नहीं।
श्रम साधक को विश्राम नहीं।
मद मंजुल महलों में सोता है।
तू अपनी मेहनत बोता है।
रुकता तेरा कोई काम नहीं।
श्रम साधक को विश्राम नहीं।
तू सर्व शक्तिमान दिखाई देता है।
बीज विश्वास का बंजर में बोता है।
मेहनतकश तन पर परिधान नहीं।
श्रम साधक को विश्राम नहीं।
मेहनत कड़ी धूप में करता है।
सर्दी गर्मी वर्षा रहता है।
तुझे भूख का भान नहीं।
श्रम साधक को विश्राम नहीं।
निलेश जोशी "विनायका"
बाली, पाली (राजस्थान)
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