उमेश जबलपुरी की कविताएँ

बहुत भूलना चाहा तुम्हें


बहुत भूलना चाहा तुम्हें
ज़माने को लगा भूल गया तुम्हें
पर ऐसी भूली हुयी भूल
मैं तुम हो

डूबते सूरज की लाली
में तुम हो
लौटती चिड़ियों की चिड़चिड़ाहट
  मैं तुम हो

बच्चे की खिलखिलाअट
मैं तुम हो
कोयल की कूक
मैं तुम हो

सर्द हवाओं की ठिठुरन
मैं तुम हो
बसन्त की बहती बयार
मैं तुम हो


जहां जहां तुम्हें न सोचा
  ऐसी हर गली बस्ती की बसाहट
तुम हो

मृग के नयन
मैं तुम हो
मोर के पंख
मैं तुम हो

गुलाब की मस्ती
मैं तुम हो
जल की शीतलता
मैं तुम हो

गोधूली बेला कीं घन्टी
मैं तुम हो
धरा की सौधी ख़ुशबू
मैं तुम हो

जहां जहां तुम्हें न सोचा
ऐसी भूल की भूल
मैं तुम हो
उमेश जबलपुरी

--


भूला नहीं हूँ

भूला नहीं हूँ  

वो

लमहे लफ़्ज़
एहसास संजीदगी
ख़्वाब ख़ुशियाँ
खवाईश मलाल
मनाना रूठना
सुनना सुनाना
कहना बोलना
पाना खोना

सब बन्द है
यादो की तिजोरी में
वक़्त कीं चाबी से
लम्हा उन्हें खोलता है
ख़ुश होता है

उमेश जबलपुरी
३/५/२०२०

--

मुझे तेरे शहर में
जानते हैं लोग
मुझे मेरे नाम से न सही
तेरे नाम से
जानते हैं लोग
            
कभी सोचा न था
आकर तेरे शहर में
सब कुछ लुटाकर
पहचान भूल जाऊँगा
तेरे नाम से जाना जाऊँगा

मुझे तेरे शहर में
जानते हैं लोग
मुझे मेरे नाम से न सही
तेरे नाम से
जानते हैं लोग

तेरे शहर की
हर गली की तन्हाई
मुझे जानतीं पहचानती है
ये बात अलग है वो
तेरे नाम से पुकारती है


मुझे तेरे शहर में
जानते हैं लोग
मुझे मेरे नाम से न सही
तेरे नाम से
जानते हैं लोग


तेरे शहर के बाग बगीचे मे
खिलते फूल महकतीं पत्तियाँ
पहचानती है मुझे
लेकिन मुझे मेरे नाम से नहीं
तेरे नाम से महकाती है मुझे

मुझे तेरे शहर में
जानते हैं लोग
मुझे मेरे नाम से न सही
तेरे नाम से
जानते हैं लोग
उमेश जबलपुरी
५/५/२०२0

----


पुरानी किताब रद्दी में बेची
उनसे सूखे फूल आंसू से झरे
तुम बहुत याद आए

दिखा सड़क पर चलता फिरता चॉद
धोखा सा हुआ   चश्मा पोछा
तुम याद बहुत आए

बरसात की बूँद माथे पर टपकी
घनघोर घटाओं में चाय की चुस्की
तुम बहुत याद आए

स्कूल में पढ़ते ध्यान भटका
मैडम की छड़ी साथियों की हँसी
तुम बहुत याद आए

वक़्त बदला  सदियाँ बीती
लम्हा ठहरा एहसास जागे
तुम बहुत याद आए

उमेश जबलपुरी
३/५/२०२०
---



मॉ
मॉ दिल की धड़कन
सॉस में महकती ख़ुशबू
आँख की रोशनी
धमनियों में बहता उत्साह है

मॉ
वाणी में गूंजती सरस्वती
मन्दिर के प्रासाद
आजान की गूंज
शबद के कीर्तन है


मॉ 
मेरे आईने में तू है
तेरे आईने में हूँ
में तुझमें
तू  मुझमें है

(२)


मॉ
तू  सबसे कमजोर
दरिद्र  असहाय
बेटे का निवाला
क्यों है

अम्बानी के घर का
आराम
सुख
सुविधा
क्यों नहीं हो


मॉ
तू उस नाकारा अवारा की
प्रार्थना
दुआ
क्यों है

अम्बानी का
आशीर्वाद
सलामती
क्यों नहीं

मॉ
तू
सुदामा में क्यों है
कृष्णा में क्यों नहीं

मॉ
तू उस बेपरवाह की
रसोई भूख निवाला रोटी
में क्यों है

अम्बानी की
दौलत शोहरत तिजोरी
  में क्यों नहीं है

मॉ तेरी
ममता का ख़ज़ाना
दुलार की पोटली
उस आलसी केलिए क्यों है
अम्बानी के लिए क्यों नहीं

मॉ
तेरी जमा पूँजी
पेन्शन
वसीयत
उस कामचोर के
लिए क्यों है
अम्बानी के लिए क्यों नहीं

क्यों की
तू मॉ है
सिर्फ़ मॉ है
केवल मॉ है
मॉ है


(३)
मॉ
घर से बहार जाने पर
काजल का टीका
क्यों लगाती है मॉ  ?

दो चार दिन
घर की मेहमानी में
आचार पापड़ बरी सब
  क्यों बना जाती है मॉ ?

घर का कोना कोना
साफकर चमका
क्यों जाती है मॉ ?


काम वालों के रहते
बर्तन कपड़े साफ़
क्यों कर देती मॉ ?

पेन्शन के पैसे से
सब्ज़ी फल ख़रीद
क्यों लेतीं हैं मॉ ?

पत्नी के रहते
खाना खीर
हलुआ पूड़ी
क्यों खिला देती है मॉ ?

मौक़ा देखकर अकेले में
अपनीं उम्र भी
मेरे नाम
क्यों कर देती है मॉ?

ठिठुरतीं ठंड में भी
कम्बल रज़ाई उढाने
क्यों आ जाती मॉ?

आफिस से
विलम्ब होते
चिन्तित
क्यों हो जाती है मॉ

क्यों की
तू मॉ है
सिर्फ़ मॉ है
केवल मॉ है
मॉ है
उमेश जबलपुरी
७/५/२०२० 

Comments

Popular posts from this blog

Gove confirms mandatory housebuilding targets for councils will be abolished in face of Tory rebellion – UK politics live

Kotak Mahindra Bank Recruitment 2022 Released for Graduate Candidates And Apply Online