रोहित ठाकुर की कविताएँ

[ साधारण क्षणों में भी असाधारण रूप में औरतों को याद करता हूँ  ]


दादी को

माँ को

चाची को

भौजी को

पत्नी को

बहन को

असंख्य औरतों को

गन्दे बर्तनों के बीच

गन्दे कपड़ों के बीच

अंधेरे रसोई में

साधारण कपड़ों में

साधारण बात कहते हुए

असाधारण रूप में याद करता हूँ  |

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[ गौरैया ]

गौरैया को देखकर

कौन चिड़िया मात्र को याद करता है

गौरैया की चंचलता देखकर

बेटी की चंचल आँखें याद आती है

पत्नी को देखता हूँ रसोई में हलकान

गौरैया याद आती है

एनीमिया से पीड़ित एक परिचित लड़की

कंधे पर हाथ रखती है

एक गौरैया भर का भार

महसूस करता हूँ अपने कंधे पर

गौरैया को कौन याद करता है चिड़िया की तरह  |

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[ घर लौटते हुए किसी अनहोनी का शिकार न हो जाऊँ  ]

दिल्ली  - बम्बई  - पूना  - कलकत्ता

न जाने कहाँ - कहाँ से

पैदल चलते हुए लौट रहा हूँ

अगर पहुँच गया अपने घर

उन तमाम शहरों को याद करूँगा

दुःख के सबसे खराब उदाहरणों में

हजारों मील दूर गाँव का घर नाव की तरह डोल रहा है

उसी पर सवार हूँ

शरीर का पानी सूख रहा है

नाव आँख के पानी में तैर रही है

विश्वास हो गया है

नरक का भागी हूँ

घर पहुँचने से पहले आशंकित हूँ

किसी अनहोनी के  |

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देहरी पर लालटेन

[ लालटेन  ]

क्या आया मन में की रख आया

एक लालटेन देहरी पर

कोई लौटेगा दूर देश से कुशलतापूर्वक

आज खाते समय कौर उठा नहीं हाथ से

पानी की ओर देखते हुए

कई सूखते गले का ध्यान आया  |

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[ घटना नहीं है घर लौटना  ]

दुर्भाग्य ही हम जैसों को दूर ले जाता है घर से

बन्दूक से छूटी हुई गोली नहीं होता आदमी

जो वापस नहीं लौट सकता अपने घर

मीलों दूर चल सकता है आदमी

बशर्ते कि उसका घर हो

विश्व विजेता भी कभी लौटा था अपने घर ही

हम असंख्य हताश लोग घर लौट रहे हैं

हमारे चलने की आवाज

समय के विफल हो जाने की आवाज है  |

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[ उस आदमी के लिए जो सात दिनों में पैदल चलकर दिल्ली से दरभंगा पहुँचता है ]

बेटी ने कहा स्कूल बंद है

मैंने धीमी आवाज़ में कहा काम बंद है

कहा नहीं जाता पर -

कह गया यह शहर छोड़ कर जाना है

बेटी से पूछता हूँ -

दिल्ली से दरभंगा पैदल चलकर जाना है

तुम चल सकोगी

बेटी कहती है खिलखिला कर -

मेरी उँगलियों को पकड़ कर वह जा सकती है दूर

बहुत दूर

हम लोग पैदल चल रहे हैं  |

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[ एक गतिहीन दुनिया में गतिशील है एक साइकिल सवार  ]

एक गतिहीन दुनिया में

गतिशील हैं बच्चे

एक छोटा सा लड़का

अपने आँगन में निरंतर चला रहा है साइकिल

उसके चेहरे पर जो मुस्कराहट है

उसे मैं अपने जीवन की कार्यसूची में शामिल कर रहा हूँ

कविता में नहीं

आपके कानों में यही कहना चाहता हूँ

साइकिल सवार हाँकता रहे अपनी साइकिल

गोल  - गोल

पृथ्वी की परिधि से बाहर भी सुनाई दे उसकी हँसी  |

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[ मेरी जेब खाली थी शेष नहीं था कुछ कहना  ]

मेरे पास कुछ नहीं था

एक गुलमोहर का पेड़ था सरकारी जमीन पर

पास की पटरी से गुजरती हुई ट्रेन की आवाज थी

रिक्शा वालों की बढ़ती भीड़ थी

चिड़ियाँ नहीं थी उनकी परछाईयाँ दिखती थी

गिटार बजाता एक लड़का था जो खाँसता बहुत था

हम पानी में नहीं कर्ज में डूबे थे

हम कविताएँ नहीं गाली बकते थे

हमें याद है हमारे कपड़े में कुल मिलाकर पांच जेबें थीं

एक में कमरे की चाभी

दूसरे में घर की चिट्ठी

तीसरी - चौथी और पाँचवीं खाली  |

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[ जाल ]

उस जाल का बिम्ब

जो छान ले तमाम दुःख

जीवन से

और

सुख की मछलियाँ

मानस में तैरती रहे

हम मामूली लोगों की

कल्पना में

रह - रह कर आता है  |

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रोहित ठाकुर

नाम रोहित ठाकुर

विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं बया, हंस, वागर्थ, पूर्वग्रह ,दोआबा , तद्भव, कथादेश, आजकल, मधुमती आदि में कविताएँ प्रकाशित

विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों  - हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, अमर उजाला आदि में कविताएँ प्रकाशित ।

100 से अधिक ब्लॉगों पर कविताएँ प्रकाशित ।

कविताओं का मराठी और पंजाबी भाषा में अनुवाद प्रकाशित ।


पत्राचार का पता  - रोहित ठाकुर

C/O – श्री अरुण कुमार

सौदागर पथ

काली मंदिर रोड के उत्तर

संजय गांधी नगर  , हनुमान नगर  , कंकड़बाग़

पटना, बिहार

पिन – 800026


मेल  : rrtpatna1@gmail.com

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