दिनेश चन्द्र गहतोड़ी की कविताएँ

दिनेश चन्द्र गहतोड़ी
मेरी कृति (किरण प्रवेश) की एक कविता


कुछ कहते हैं...
ये सितारे,
जो रहते हैं...
हमसे दूर,
क्षितिज़ के पार....
सह कर नियति की प्रताड़ना को,
बार -बार....
हर अँधेरी रातों के
दिलों में जलते हैं,
हमसे कुछ कहते हैं,

निज कर्म में लीन...
बनाती हैं
प्रकृति को रंगीन,
ये नदियाँ.....
ऊँचे शिखरों से अवतरित,
मिलने को....
सिंधु से आतुर,
करके स्वीकार...
चट्टानों की मार,
बार -बार...
अभिराम बाट में बहती हैं,
हमसे कुछ कहती हैं,

कुछ खड़े...
प्रकृति के आँचल में,
कुछ पड़े...
प्रकृति की गोद में,
सब हैं
ब्रह्माण्ड के भागीदार,
पिरो कर....
एक ही प्रेम सूत्र में
बनते प्रकृति का अटूट हार,
कुछ मूक... कुछ बाचाल...
हर छण... हर काल...
सब हमें
समर्पित रहते हैं,
हमसे कुछ कहते हैं,

आओ सुन लें.....
इस मूक वृंद को,
इनके करुणामय
शांत क्रन्द को,
ये सहते....
चुप रहते हैं,
सुंदर प्रकृति के...
मधुर उपहार,
सभ्य मानव के...
क्रूर हथियार,
इनकी सास्वत स.र.ग.म में,
जो सन्देश हमेशा रहते हैं...
......शायद......
हमसे ही कुछ कहते हैं,
हमसे ही कुछ कहते हैं......
--


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दिनेश चन्द्र गहतोड़ी
ग्राम -पाटी (जौलामेल )
उत्तराखंड
--

दीन -आग्रह

हे मानव....
तुम हम पर भी दो ध्यान,
सायद तुम्हारे
तनिक प्रयास से
आ जाये हम पर नई जान,
तुम हम पर भी.......

हम भी आये हैं
इस जग में.....
मीठे -मीठे अरमान लिए
मुस्कराके हमारे जीवन में
तुम बन जाओ नये अरमान
तुम हम पर भी......

हम दीन हैं...
वक़्त के जाल में फ़से हुवे,
अपने ही कुछ
हालातोँ के....
सिकंजोँ पर कसे हुवे,
बंधुत्व की भावना को
उजागर करके...
बढ़ाओ हमारा भी अभिमान,
हम पर भी......

इस अंधकार से
उठकर हम.....
जीवनसार को समझ सकें,
कर्म छेत्र के
इस युग में फिर...
बना सकें अपनी पहचान,
तुम हम पर भी दो ध्यान.....
तुम हम पर भी दो ध्यान.....


दिनेश चन्द्र गहतोड़ी
ग्राम - पाटी (जौलामेल )
चम्पावत  उत्तराखंड
---


मेरी कृति  (किरण प्रवेश) की एक कविता

         .......   मजदूर........
ना आशा.....
ना लहू रगों में,
ना तन पर बूंद पसीना है,
मैं कहता हूँ....
यारों गर्व से


मेरी कृति( किरण प्रवेश) की एक कविता
...........मजदूर .............

ना आशा...
ना लहू रगोँ में,
ना तन पर बूंद पसीना है,
मैं कहता हूँ
यारों गर्व से...
फिर भी मुझको जीना है,

बनता हूँ......
हर कर्म का आधार,
फिर भी मैं रहता
निराधार......
करता हूँ......
हर कल्पना को साकार,
फिर मैं रहता
निराकार........

मैं मजदूर
जीने को मजबूर,
हूँ जीवन के बहुत करीब
लेकिन....
जिंदगी से बहुत दूर,

मेरे भी जीवन में रवि...
अरमां अनेक ले आता है,
और स्वयं......
अपनी किरणों से
उन्हें भरपूर सींचता है,

लेकिन.....
रजनी के प्रथम पड़ाव में,
सभी स्वप्न खो जाते हैं..
और हकीकत जीवन की
दास्तां शुरु हो जाती है,

स्वप्नों की....
सुन्दर मंजिल को,
भूख की आंधी में ढ़हाता हूँ,
हर स्वप्न जला कर चूल्हे में.....
इस तन की
आग बुझाता हूँ,

बुझ जाता है...
चिराग आशा का,
निराशा में....
मेरा घर जलाकर,
काली लहक.....
अंधकार की महक,
न हसूूँ...
न रोऊँ....
जगता हुवा सोऊँ,
खुद से पूछूँ बार -बार
लेकर दिल में हताशा,
क्या होती है आशा की भाषा?

जो भी हो...
अब जैसे भी हो,
मुझको भी इस
कर्म भूमि में.....
अपना अस्तित्व बचाना है,

मैं कहता हूँ...
यारों गर्व से,
फिर भी मुझको जीना है....
फिर भी मुझको जीना है,

दिनेश चन्द्र गहतोड़ी
ग्राम -पाटी  (जौलामेल )
चम्पावत  उत्तराखंड

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(अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस 1मई पर )

मेरी कृति  (किरण प्रवेश) से

... सत्य की खोज....

मैं चला....
सत्य को खोजने,
झूठे सपनोँ के...
अशांत मन को,
शांति के जलधि में डुबोने,
मैं चला......

चला शहर के पार,
खोजा.....
ऊँची मीनारों पर,
शहर की उन तंग गलियों
और चौड़े चौराहों पर,
फिर भी मुझको मिला कहां...
मैं लगा.....
खुद ही से बूझने,
फिर चला सत्य को खोजने,

अब चला...
अनोखी राहों पर,
खोजा......
शिखर के शीर्ष,
और एकांत....
सरिता के किनारों पर,

समीरोँ की स.र.ग.म.....
नदियों की कल-कल,
बहते रहते हैं
जो अविरत....
कर्तव्य करते हैं निरंतर,

सत्य छिपा हैं इन्हीं पर
सत्य है सास्वत....
सत्य है शिव,
शिव छिपा है.....
हर आत्मा में.. हर कर्तव्य में....

दिनेश चन्द्र गहतोड़ी
ग्राम -पाटी ( जौलामेल )
चम्पावत   उत्तराखंड


मेरी कृति  (किरण प्रवेश)  से

........ मिलन........

अनंत शून्य के अंत से...
नीले शैलोँ पर
घिर गई घटा,
रुक जा....तनिक
चंचल चित्त मेरे...
देख लें ये प्राकृतिक छटा,

पवन संग में तीव्र वेग से...
ऐसे उतर रहे थे बादल,
जैसे धरती पर गिर कर....
प्यारे पर्वत हो गए हों घायल।

या शायद ये प्रेमी हैं....
बंधक थे...
काल के पिंजरे में,
अवसर पाते ही निकल कर...
समा गये हों बाँहों में,

कितना अच्छा है यह मिलन....
यह सबको लगता है प्यारा,
झूम उठी......
धरती भी इससे,
यह है सुख देने वाला।

खड़ी हो, महि के आँगन में.....
अभिनन्दन करती फसलें,
हरे वृक्ष के....
शीर्ष पर बैठा... पंछी...
हर्षित हो रहा मन ही मन में।

0000000..

दिनेश चन्द्र गहतोड़ी
ग्राम  - पाटी  (जौलामेल )
चम्पावत  उत्तराखंड

मेरी कृति ( किरण प्रवेश)  से

.......... सपने..............

सपने
आते हैं.....
नव सुहागिन की तरह,
आहिस्ता-- आहिस्ता....
सज -धज कर
नन्ही भोली सी.....
आँखों में सुशोभित,
खुशी से ओतप्रोत
प्रेमाश्रुओं की वृष्टि में
सम्पूर्ण भीगकर.....
मन के हिंगोले में झूलते।
सपने......
चकित आशान्वित नयनोँ के,
उन्मुक्त गगन में उड़ते....
इंदु को बिंदु समझकर खेलते...

सपने......
उछलते   सहमते....
नव यौवन के प्रांगण में।
उलझते.....
खुद के बुने मकड़जालों में।
स्वयं लिखते...
समय के ललाट पर अपनी किस्मत.....।

सपने....
ठहर जाते हैं,
जीवन के आख़री पड़ाव में।
खोजते स्वयं के...
अनगिनत पद्चिन्ह।
जो बन गये थे तपती रेत में,
बह गये हवा के साथ।

सपने देखते सपने...
डूबते सूरज की लालिमा में।
जो बनाती है अनेकोँ आकृतियां,
बादलों के शीर्ष में....।

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दिनेश चन्द्र गहतोड़ी
ग्राम    पाटी(  जौलामेल )
चम्पावत उत्तराखंड

मेरी कृति ( किरण प्रवेश )  से

........... कोरोना................

जब क्रूर स्वार्थी मानव का....
कुछ ऐसा करतब होता है।
कि कपट कलूसित नियत पर
स्वयं बिधाता रोता है।

एक उदार महिपालक ने,
महि सारी तुम को सौप दी।
तुमने इस सुन्दर रचना पर,
विभत्स अणुअस्त्र बना डाले।

दुःख देकर   असहायों को....
क्या तुम सुख से रह पाओगे?
लेकर जीवन लाचारों का....
क्या तुम जीवन जी पाओगे?

जब - जब तुम दीन मलिनों से,
जीने का हक़   छीनोगे......
तब -तब तुम स्वयं सन्मुख,
अपना काल कोरोना पाओगे।

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दिनेश चन्द्र गहतोड़ी
ग्राम -  पाटी ( जौलामेल )
चम्पावत -  उत्तराखंड

मेरी कृति ( किरण प्रवेश)  से

............ प्रेम अश्रु............

मैं बन जाऊँ प्रेम अश्रु....
इस भृमित जगत में,
छणिक जीव के......
सचल  अचल अरु
तरु पल्ल्व के..........
करूँ बसेरा दीन चक्षु ।
मैं बन जाऊँ प्रेम अश्रु,


जिसे तुम समझो शूल द्वार,
वह बन जाये पुष्प हार।
धुले सत्य से बार -बार....
सत ही हो फिर मनुज रक्षु।
मैं बन जाऊँ प्रेम अश्रु

बलिदान प्रेम की गाथा में,
जिस ओर नित्य ही होता है।
मैं गिरू उसी पावन पथ में,
जिससे वह सान गुजरता है।

उस एक छण में ही मेरा.
गर्व अनंत हो जायेगा....
जब प्रेम अश्रु की एक बूँद से,
हर इंसान नहायेगा........।

हे देव कृपा की छाँव मात्र से...
ऐसा ही कमाल कर दो,
मेरे सारे जीवन व्रत को.....
प्रेम नीर से तुम भर दो....।

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दिनेश चन्द्र गहतोड़ी
ग्राम   पाटी  (जौलामेल )
चम्पावत  (उत्तराखंड )

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