मृत्यु को महसूसता मैं -- पंकज प्रसून की कविताएँ

मृत्यु को महसूसता मैं

-- पंकज प्रसून

वह अंधेरी कोठरी

पूरे नौ महीने की कैद

जिससे निकल कर मैं आया

वहीं अंधेरा---काला, काला

देख रहा

महसूस कर रहा सर्वत्र

बदन हो रहा बर्फ़

दिल की धड़कन पड़ रही मंद

और अचानक सब कुछ बंद

सामने अंधेरा घुप्प

सब कुछ काला

काला ही काला सन्नाटा

बिल्कुल ठंडा

बर्फ़ की सिल्लियों पर रखा मेरा शरीर

नहीं लग रही ठंड उसे

--- न सिहरन

---- न ठिठुरन

----- न वेदना ,न संवेदना

रोशनी नहीं कहीं

उस अंधकार का

तेजी से हिस्सा बनता मैं

मेरा निर्जीव बदन

लकड़ियों के बीच रखा बेजान शरीर

आग---

पहले सुलगती

फिर फैलती

फिर धधकती

और धू धू जलती आग में जलता

मेरा शरीर

बदलता जा रहा राख में

हवा का एक झोंका आया

वे गया उड़ा मेरी राख

जहां-तहां

मेरा शरीर

जो 'है' था

अब 'था' है

मेरी पहुंच से बहुत दूर

हो गया मेरा शरीर

अब जिसे मैं पा नहीं सकता

चला जाता हूं वापस अंधकार में

सब कुछ बिसर कर

हवाओं के साथ मैं

मेरा मैं

उड़ते- उड़ते

हवा में ही घुल गया हूं

अब मैं कुछ नहीं हूं

अपना अंत देख रहा हूं

मैं मर चुका हूं

--


पंकज प्रसून

मेरे वर्तमान का वह अंतिम क्षण
---

देख रहा था मैं
सर्द होते अपने पैरों को
और धीरे-धीरे
सुन्न होता जा रहा मेरा शरीर
नीचे से
ऊपर से
दोनों सांसें
मद्धिम होती मेरे दिल की धड़कन
मंद होती फेफड़ों की गति
धीमी हो रही सांस…
सब कुछ देख रहा था
मैं ख़त्म हो रहा था
आंखें बंद
पलकें भारी…
चाह रहा था
खोलूं आंखें
खुद नहीं पातीं
मैं विवश था
लाचार था
मैं मर रहा था
मद्धिम होती मेरे दिल की धड़कन
और बढ़ती भयानक ठंड
सामने फैलता अंधकार
और मैं विवश और लाचार
कुछ कहना चाहता था
कह न सका
मुंह बंद हो चुका था
आंखें पथरा रहीं थीं
और तब आ ही गयी वह घड़ी
छूट गयी आखिरी सांस
और मैं मर गया
उस क्षण से पहले मैं
जीवित था
अब मर चुका
इतिहास बन गया
मेरे वर्तमान का वह अंतिम क्षण
मेरे वजूद को साथ ले गया

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