जानकारी / 15 सावन को नहीं लगेगा पंजपीर का सलाना मेला - विकिपीडिया हिंदी
नमस्कार दाेस्ताें, विकिपीडिया हिंदी में आपका स्वागत है। अगर आप अबाेहर या अबाेहर के आसपास के क्षेत्र में रहते हैं तो आपने पंजपीर की दरगाह के बारे में जरूर सुना होगा। जहां पर हर साल 15 सावन यानि 30 जुलाई को भव्य वार्षिक मेला लगता हैं। जहां पर अबोहर हीं नहीं ब्लकि आसपास के दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु नतमस्तक होने के लिए आते हैं।
आभा नगरी (अबोहर) में स्थित हिंदू-मुस्लिम आस्था की प्रतीक पांच पीरों की दरगाह के अस्तित्व की कहानी जितनी प्राचीन है, उतनी ही दिलचस्प भी है। माना जाता है कि गुस्से में आकर यहां डेरा जमाए बैठे पीरों को ढूंढते हुए इनकी पत्नियां यहां पहुंची तो पीरों ने उन्हें शाप देकर भस्म कर दिया था। अब सदी से भी ज्यादा समय से यहां हजारों लोग शीश झुकाने दूरदराज के क्षेत्रों से आते हैं। हर वीरवार को पीरों की दरगाह पर मेला लगता है।
कोरोना वायरस के बढ़ रहे प्रकोप को देखते हुए पंजाब सरकार द्वारा भीड़ एकत्र न करने के निर्देश दिए हैं। जिसके तहत पंजपीर दरगाह पर हर साल 30 जुलाई को लगने वाला वार्षिक मेला नहीं लगेगा। दरगाह के सेवादार विजय सामा ने बताया कि कोरोना महामारी के चलते सार्वजनिक स्थानों पर भीड़ एकत्र करने पर मनाही है। कोविड-19 के कारण सुरक्षा के मद्देनजर मेले को स्थगित कर दिया गया है।
उन्होंने अबोहर तथा आसपास के राज्यों से आने वाले श्रद्धालुओं से अपील की है कि वह अपने घरों में रहें तथा सुरक्षित रहें। सामा ने बताया कि इस बार न तो झूले लगेंगे और न ही स्टालें लगाई जाएगी। पीर की दरगाह वैसे तो पुराने समय पर खुलता व बंद हो रहा है, लेकिन भीड़ एकत्र नहीं होने दी जाती। इसबार कोरोना वायरस ने बड़े-बड़े धार्मिक स्थल तक बंद कर दिए हैं।
ये हैं पंजपीर की दरगाह का इतिहस
पांच पीरों की दरगाह के इतिहास के अनुसार धर्मनगरी में एक बहुत बड़ा टीला हुआ करता था, जो अब थेह के नाम से जाना जाता है। कभी यहां राजा आबू चंदनी का महल हुआ करता था, जो आबू नगरी व आभा नगरी कहलाता था। बताते हैं कि सूर्यवंशी राजा आबा चंदनी के बाद राजा हरीचंद ने राजपाठ संभाला। राजा हरीचंद की केवल एक बेटी ही थी। आखिरी समय में राजा को कुष्ठ रोग हो गया। राजा का कुष्ट रोग का इलाज करने के लिए शाही हकीमों ने बहुत जोर लगाया, लेकिन सब कुछ बेअसर साबित हुआ।
उस समय किसी ने राजा को सलाह दी कि मुल्तान (पाकिस्तान) के पांच पीरों के घोड़ों के खून से इस बीमारी का इलाज संभव है। शहजादी को जब इस बात का पता चला तो वह सूरतगढ़ के ठाकुर की मदद से पांच पीरों के पास गई और पांचों पीरों से उनके घोड़े मांगने लगी। जब मांगने पर पीरों ने अपने घोड़े न दिए तो शहजादी छल से पांचों पीरों के घोड़े यहां ले आई। इससे राजा की बीमारी तो ठीक हो गई, लेकिन कुछ अरसे बाद राजा की मौत हो गई। ठाकुर शहजादी से विवाह करके आबू नगरी में रहने लगा।
जब शहजादी पांचों पीरों के घोड़े आबू नगरी ले लाई तो पीरों ने बार-बार घोड़े लौटाने का संदेश भिजवाया, लेकिन ठाकुर व शहजादी ने घोड़े नहीं लौटाए। इस पर पांचों पीर अपनी पत्नियों को उनके पीछे न आने की नसीहत देकर खुद घोड़े लेने आबू नगरी आ पहुंचे और टीले पर डेरा डाल दिया। काफी समय बाद भी जब पीर वापस मुल्तान नहीं पहुंचे तो उनकी पत्नियां उनकी नसीहत को नजरअंदाज कर उन्हें ढूंढती हुई आबू नगरी आ पहुंचीं। पांच पीरों ने जब अपनी पत्नियों को देखा तो वह गुस्से से बेकाबू हो गए। उन्होंने उन्हें शाप देकर भस्म कर दिया।
शहजादी की ओर से घोड़े न लौटाने की जिद से गुस्साए पांच पीरों ने आबू नगरी को भी नष्ट होने का श्राप दे दिया, लेकिन उसका कोई असर न हुआ। जब पांच पीरों ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा तो उन्हें पता चला, कि उनका मामा अलीबख्श अपनी अदृश्य शक्ति से आबू नगरी को बचा रहा है। इस पर पीरों ने अपने मामा को धिक्कारा तो वह नगर छोड़कर चला गया। उसके जाते ही आबू नगरी राख हो गई। महल व घर खंडहर में तब्दील हो गए। इन्हीं पांच पीरों और उनकी पत्नियों की मजारें यहां लोगों की श्रद्धा का केंद्र हैं।
ये हैं पांच पीरों के नाम
1. दाता बख्श
2. शेख बाबा फरीद शकरगंज
3. बाहा उद्दीन जकारिया
4. लाल शहबाज कलंदर
5. सैय्यद जलालुद्दीन भूखड़ी
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