Bakrid 2020 : बकरीद कब है? क्यों मनाई जाती है? बकरीद पर कुर्बानी का क्या महत्व है? - Wikipedia Hindi

Eid Ul Adha Bakrid 2020

Eid Ul Adha (Bakrid 2020) : मुसलमानों के दो मुख्य त्यौहार ईद-उल-अजहा और ईद-उल फितर है। जहां ईद-उल-अजहा बकरीद को कहा जाता है। वहीं, ईद-उल फितर मीठी ईद को कहा जाता है। ईद-उल फितर के करीब 70 दिन बाद बकरीद को मनाया जाता है। मुसलमान यह त्यौहार कुर्बानी के पर्व के तौर पर मनाते हैं। इस्लाम में बकरीद का विशेष महत्व है। इस दिन लोग नमाज अदा करने के बाद बकरे की कुर्बानी देते हैं। यह त्यौहार लोगों को सच्चाई की राह पर सबकुछ कुर्बान करने का संदेश देता है। तो चलिए जानते हैं कि ईद-उल-अजहा यानी बकरीद कब है? बकरीद क्यों मनाई जाती है? बकरीद पर कुर्बानी का क्या महत्व है?



इस्लामिक चंद्र कैलेंडर के मुताबिक, बारहवें महीने जु-अल-हज्जा की पहली तारीख को चांद दिखाई देता है। ऐसे में इस महीने के दसवें दिन ईद-उल-अजहा (बड़ी ईद) मनाई जाएगी। वहीं, ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार, हर वर्ष तारीख में बदलाव होता है। पिछली तारीख से इस बार 11 दिन पहले यह पर्व मनाया जाएगा। बता दें कि उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस साल बकरीद का त्योहार 31 जुलाई से शुरु होकर 1 अगस्त की शाम को चलेगी।


बकरीद का महत्‍व



Eid Mubarak

बकरीद का दिन फर्ज-ए-कुर्बान का दिन होता है।  इस्लाम में गरीबों और मजलूमों का खास ध्यान रखने की परंपरा है। इसी वजह से बकरीद पर भी गरीबों का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस दिन कुर्बानी के बाद गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं, इन तीनों हिस्सों में से एक हिस्सा खुद के लिए और शेष दो हिस्से समाज के गरीब और जरूरतमंद लोगों में बांट दिए जाते हैं। ऐसा करके मुस्लिम इस बात का पैगाम देते हैं कि अपने दिल की करीबी चीज़ भी हम दूसरों की बेहतरी के लिए अल्लाह की राह में कुर्बान कर देते हैं।


क्याें मनाई जाती है बकरीद?


इस्लामिक मान्यताओं में हजरत इब्राहिम को अल्लाह का पैगंबर बताया जाता है। इब्राहिम ताउम्र दुनिया की भलाई के कार्यों में जुटे रहे। उनका जीवन जनसेवा और समाजसेवा में ही बीता। लेकिन करीब 90 साल की उम्र तक उनके कोई संतान नहीं हुई। तब उन्होंने खुदा की इबादत की और उन्हें चांद-सा बेटा इस्माइल मिला।


इब्राहिम के सपने में खुदा का आदेश आया कि अपनी सबसे प्‍यारी चीज को कुर्बान कर दो। तो उन्‍होंने अपने सभी प्रिय जानवरों को कुर्बान कर दिया। फिर से उन्‍हें य‍ह सपना आया तो उन्‍होंने अपने बेटे को कुर्बान करने का प्रण लिया। तब उन्‍होंने खुद की आंख पर पट्टी बांधकर बेटे की कुर्बानी दी और बाद में पट्टी हटाकर देखा तो उनका बेटा खेल रहा था और अल्‍लाह के करम से उसके स्‍थान पर उनके बकरी की कुर्बानी हो गई। तभी से मान्‍यता है कि बकरे की कुर्बानी देने की परंपरा चली आ रही है। यह त्‍योहार इंसानियत पर अपने सबसे अजीत चीज कुर्बान कर देने का संदेश देता है।


कुछ मुस्लिम परिवारों में कुर्बानी के लिए बकरे को पाल पोसकर बड़ा किया जाता है और फिर बकरीद पर उसकी कुर्बानी दी जाती है। वहीं जो लोग बकरे को नहीं पालते हैं और फिर भी उन्‍हें कुर्बानी देनी होती है उन्हें कुछ दिन पहले बकरा खरीदकर लाना होता है ताकि उस बकरे से उन्हें लगाव हो जाए।

कुर्बानी का पूरा गोश्त नहीं रख सकते


इस्लाम में कुर्बानी के गोश्त को अकेला कोई परिवार अपने लिए नहीं रख सकता। कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं, जिसका पहला हिस्सा गरीबों के लिए होता है, दूसरा हिस्सा दोस्त और रिश्तेदारों के लिए और तीसरा हिस्सा अपने घर के लिए होता है। कुर्बानी को गोश्त को बांटकर ही खाना पड़ता है।

शैतान पर क्यों मारे जाते हैं पत्थर




इस्लाम में हज यात्रा के आखिरी दिन कुर्बानी देने के बाद रमीजमारात पहुंच कर शैतान को पत्थर मारने की भी एक अनोखी परंपरा है। कहा जाता है कि यह परंपरा हजरत इब्राहिम से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि जब हजरत इब्राहिम अल्लाह को अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए चले थे तो रास्ते में शैतान ने उन्हें बहकाने की कोशिश की थी। यही वजह है कि हजयात्री शैतान के प्रतीक उन तीन खंभों पर पत्थर की कंकडियां मारते हैं।

कुर्बानी का नियम


इस्लाम में कुर्बानी के नियम उस शख्स पर लागू होते हैं जिसकी हैसियत कुर्बानी देने की होती है, जो शख्स हैसियतमंद होते हुए भी अल्लाह की रजा में कुर्बानी नहीं करता है, वो गुनाहगारों में शुमार होता है। ऐसे में बकरीद के दिन हर मुस्लिम को कुर्बानी देनी पड़ती है।

कितने लोग मिलकर दे सकते हैं एक जानवर की कुर्बानी

Eid Mubarak

कुर्बानी के लिए जानवरों चुनते समय पर अलग-अलग हिस्से हैं, जहां बड़े जानवर ( भैंस ) पर सात हिस्से होते हैं तो वहीं बकरे जैसे छोटे जानवरों पर महज एक हिस्सा होता है। मतलब साफ है कि अगर कोई शख्स भैंस या ऊंट की कुर्बानी कराता है तो उसमें सात लोगों को शामिल किया जा सकता है, वहीं बकरे की कराता है तो वो सिर्फ एक शख्स के नाम पर होता है।

कैसे दी जाती है जानवर की कुर्बानी


इस्लाम में ऐसे जानवरों की कुर्बानी ही जायज मानी जाती है जो जानवर सेहतमंद होते हैं। अगर जानवर को किसी भी तरह की कोई बीमारी या तकलीफ हो तो अल्लाह ऐसे जानवर की कुर्बानी से राजी नहीं होता है।


कुछ खास जानकारी...


दोस्तों बकरीद पर मुस्लिम समाज के लोगों द्वारा अपने अजीज जानवर की कुर्बानी देकर खुदा को खुश किया जाता है। कुर्बानी किसी जानवर की होती हैं, जो प्यारा हो और उससे आपा लगाव हो। उसी जानवर की कुर्बानी अल्ला द्वारा मंजूर की जाती है। कहा जाता है कि मुस्लिम समाज के पैगंबर हजरत इब्राहिम द्वारा इस कुर्बानी की शुरूआत की गई।


खुदा एक है ये हजरत जी भी कहते थे, लेकिन क्या कुर्बानी से ही अल्ला कैसे खुश होते हैं, ये बात समझ से परे हैं। एक ऐसा त्यौहार जिसे मनाने के लिए सबसे ज्यादा जानवर कुर्बान किए जाते हैं। तो जाकर खुदा खुश होते हैं। क्या बकरीद पर कुर्बानी देना जायज है।


खुदा को खुश करने के लिए व्रत रखा जा सकता है या फिर ईद में भाईचारे को कायम रखते हुए गले मिलकर पैगंबर को खुश किया जा सकता है। क्या कुर्बानी देकर ही खुदा को खुशी मिलती है। अगर कुर्बानी देनी ही है तो खुद की दो, पता तो चले कि खुदा को खुश करने के लिए उसका बंदा क्या कर सकता है? जानवर की कुर्बानी देना मेरे हिसाब से तो गलत है। बाकी इतिहास को ठुकराया नहीं जा सकता और किसी धर्म की भावनाओं को ठेस पहुंचाना हमारा उद्देश्य नहीं है।

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