चीनी ऐप बैन करने के बाद 'दीर्घकालीन पॉलिसी' का निर्माण हो!
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- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.
Web Title: Long Term Policy Required, After Chinese Apps Ban
देश में कार्य करने वाले 59 चीनी ऐप्स को प्रतिबंधित करने के बाद भारत सरकार ने चीनी गवर्नमेंट और कंपनियों को एक तरह से सख्त संदेश दे दिया है कि विस्तारवाद और व्यापार दोनों साथ - साथ चलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन भी है.
यह कुछ ऐसा ही है, जैसा पाकिस्तान के साथ भारत की पॉलिसी बन चुकी है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते. मतलब, जब तक पाकिस्तान आतंक फैलाने की नीति का त्याग नहीं करता है, तब तक उससे गंभीर बातचीत की संभावना नहीं पनपेगी!
सबसे बड़ा आश्चर्य इस बात का है कि आखिर अब तक चीन के संबंध में इस तरह का संदेश क्यों नहीं दिया गया?
जिस प्रकार से वह भारत के साथ लगी लंबी सीमा पर गाहे बगाहे विवाद करता रहता है, उसने हम भारतीयों के सामने हमेशा ही संकट खड़ा किया है.'
अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए भारत के साथ वह बेवजह विवादों को बढ़ावा देता रहा है. 1962 में जबरन उसने हमारी हजारों वर्ग किलोमीटर ज़मीन हथिया ली और उसके बाद भी उसको चैन नहीं आया!
ऐसे में हमारे नीति-निर्माताओं को आखिर किस बात की कन्फ्यूजन रही है जो कोई हिंदी चीनी भाई भाई का नारा देता है तो कोई निवेश की खातिर दर्जनों बाद चीनी प्रशासकों के सामने हाथ फैलाने चला जाता है?
हमें समझना ही होगा कि एक तरफ दुनिया जहां लोकतान्त्रिक ढंग से आगे की तरफ बढ़ रही है, वहीं चीन अपनी सैन्य शक्ति को किसी अंतरराष्ट्रीय ब्लैकमेलर की तरह इस्तेमाल कर रहा है! कभी भारतीय सीमा पर तो कभी साउथ चाइना सी में तो कभी अफ्रीका के जिबूती में...
सिर्फ सैन्य शक्ति ही नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक स्थिति भी दुनिया को ब्लैकमेलिंग के रास्ते पर ले जा रही है. चीन द्वारा दिया गया क़र्ज़ छोटे और कमजोर देशों के गले की फांस बनता जा रहा है और कई देश तो चीन के आर्थिक उपनिवेश बनने को ओर अग्रसर हो चुके हैं.
बड़े आश्चर्य की बात है कि तमाम अंतरराष्ट्रीय मजबूरियों के बावजूद भी भारत, चीन के प्रति इतना उदार कैसे बना रहा? चाहे वह पाकिस्तान के किसी आतंकवादी का संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने वीटो पॉवर से समर्थन करना हो, चाहे भारत के अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर पर लिए गए फैसले का सम्बन्ध हो, चीन ने हमेशा नकारात्मक रुख ही दिखाया है.
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर पाकिस्तान से हम राष्ट्र हित की खातिर क्रिकेट और दूसरे आर्थिक संबंधों की तिलांजलि दे सकते हैं तो चीन को अब तक रियायत क्यों मिली है?
आखिर क्यों भारत उसका मजबूत व्यापारिक साझेदार बनने के रास्ते पर आगे ही बढे?
उसने अब तक दूसरे विकल्पों की तलाश क्यों नहीं किया?
पहले की सरकारों की बात छोड़ भी दें तो नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 6 सालों से एक बेहद मजबूत सरकार केंद्र में है और ऐसा कहीं भी प्रतीत नहीं हुआ कि चीन को लेकर व्यापार और दूसरे मुद्दों पर सजगता दिखलाई गई है या उसका विकल्प तलाशने की कोशिश की गई है. बल्कि इसकी बजाय वर्तमान सरकार चीन की तरफ कुछ ज्यादा ही झुकी नजर आई.
मीडिया में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चीनी राष्ट्रपति शी' चिनफिंग से सर्वाधिक बार मिलने की ख़बरों का रोज ही विश्लेषण किया जाता है कि आखिर इन सबसे देश को क्या मिला?
आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि खुद चीन ने तमाम अंतरराष्ट्रीय दबावों और दूसरे देशों से द्विपक्षीय संबंधों के बावजूद भी अपने देश में गूगल, ट्विटर फेसबुक जैसे तमाम कंपनियों को पैर नहीं पसारने दिया. उसने ऐसी पॉलिसी का मजबूत निर्माण किया जिससे तमाम अमेरिकी कंपनियां कंफर्टेबल नहीं हुईं और चीन ने इसकी जरा भी परवाह नहीं की.
आज चीन में गूगल के कंपैरिजन में बैदू है तो ट्विटर की बजाय वहां विवो चलता है. हर चीज पर चीन कड़ाई' से पेश आया, जिसने महाशक्ति बनने के उसके सपने को साकार कर दिया है.
आखिर, इसी प्रकार से सख्त पॉलिसी का निर्माण भारत ने क्यों नहीं किया?
आज बेशक टिक टॉक समेत कुछ चाइनीस ऐप प्रतिबंधित कर दिए गए हैं, लेकिन दीर्घकालीन रणनीति के बगैर राष्ट्र हित का लक्ष्य हम हासिल कर लेंगे, इसमें बड़ा प्रश्न चिन्ह है!
भारत को तमाम तकनीकी विशेषज्ञों के साथ मिलकर ऐसी नीति बनानी चाहिए जिसमें राष्ट्र प्रथम नजर आए और उसे सख्ती से लागू भी करना चाहिए. बेशक वह कोई चीनी ऐप हो कोई अमेरिका का ही ऐप क्यों ना हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए.
इसी प्रकार व्यापार और निवेश को लेकर भी अगले 30 सालों यानी 2050 तक को ध्यान में रखकर नियम बनाए जाने की आवश्यकता है. दीर्घकालीन रणनीति ही हमें स्थाई ताकत दे सकती है, इस बात में दो राय नहीं!
चीनी ऐप प्रतिबंधित करना एक संदेश जरूर दे रहा है, लेकिन संदेश प्रभावी और स्थाई कैसे होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हम देश को किस दिशा में लेकर जा रहे हैं. आत्मनिर्भर भारत का अभियान एक सजग और सटीक अभियान है, किंतु बात वहीं आकर रूकती है कि मेक इन इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, स्टार्टअप इंडिया जैसी कई दर्जन परियोजनाएं सफलता के झंडे क्यों नहीं गाड़ सकीं?
अगर इन प्रश्नों का उत्तर हम ढूंढ लेते हैं तो चीनी मुसीबत का विकल्प भी तलाश पाएंगे और पूरी दुनिया में अपनी ताकत का लोहा भी मनवा लेंगे!
आप इस सम्बन्ध में क्या कहते हैं, कमेन्ट-बॉक्स में ज़रूर बताएं.
- मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.
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