जमाने को पागल बनाओ
दूर कहीं आसमान में
उड़ती चील दिखाओ
कुछ हवा की बातें करो
कुछ बादलों की चाल बताओ
कुछ पुराने सिक्के घर के
मिट्टी के तेल से साफ कर चमकाओ
कुछ फूल कुछ पौंधे
कुछ पेंड़ के संग खींची गयी फोटो
जंगल हैंं बतलाओ
तुम तब तक ही लोगों के
समझ में आओगे
जब तक तुम्हारी बातें
तुम्हें खुद ही समझ में नहीं आयेंगी
ये अब तो समझ जाओ
जिस दिन करोगे बातें
किताब में लिखी
और
सामने दिख रहे पहाड़ की
समझ लो कोई कहने लगेगा
आप के ही घर का
क्या फालतू में लगे हो
जरा पन्ने तो पलटाओ
कुछ रंगीन सा दिखाओ
कुछ संगीत तो सुनाओ
नहीं कर पा रहे हो अगर
एक कनिस्तर खींच कर
पत्थर से ही बजा कर टनटनाओ
जरूरी नहीं है
बात समझ में ही आये समझने वाली भी
पढ़ने सुनने वाले को
जन गण मन साथ में जरूर गुनगुनाओ
जरूरी नहीं है
उत्तर मिलेंं नक्कारखाने की दीवारों से
जरूरी प्रश्नों के
कुछ उत्तर कभी
अपने भी बना कर भीड़ में फैलाओ
लिखना कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है
नजर रखा करो लिखे पर
कुछ नोट खर्च करो
किताब के कुछ पन्ने ही हो जाओ
‘उलूक’
चैन की बंसी बजानी है
अगर इस जमाने में
पागल हो गया है की खबर बनाओ
जमाने को पागल बनाओ।
चित्र साभार: http://www.caipublishing.net/yeknod/introduction.html

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