Nag Panchami 2020 / जानिए क्यों मनाई जाती है नागपंचमी - Wikipedia Hindi

Nag Panchami 2020



नमस्कार दोस्तों, विकिपीडिया हिंदी में आपको स्वागत है। सावन का महीना पूर्ण रूप से शिवजी महाराज को समर्पित होता है और सावन के महीने का प्रमुख त्योहार है नाग पंचमी। नाग पंचमी 2020 इस बार 25 जुलाई को शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जा रही है। नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से शिवजी महाराज भी प्रसन्न होते हैं। सावन के महीने के कृष्ण पक्ष की पंचमी और शुक्ल पक्ष की पंचमी दोनों दिन नागपंचमी मनाई जाती है। बिहार, बंगाल, राजस्थान और पूर्वांचल क्षेत्र के कुछ भागों में 10 जुलाई को कृष्ण पक्ष में नाग पंचमी मनाई जा रही है। जबकि अन्य कई क्षेत्रों में 25 जुलाई को शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी मनाई जाएगी।


नाग पंचमी को लगभग पूरे भारत में मनाया जाता है क्योंकि भगवान शिव की अराधना करने वाले आपको पूरे भारत में मिल जाएंगे। नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा की जाती है। घर में गोबर से नाग बनाकर और मंदिर में जाकर भी उनकी पूजा की जाती है। माना जाता है कि इससे सर्पदंश का भय दूर होता है साथ ही धन-धान्य भी प्राप्त होता है। आज हम नागपंचमी क्यों मनाते हैं और इससे जुड़ी कथाओं के बारे में जानेंगे।


कब है नागपंचमी?

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Nag Panchami 2020 Date : हर साल नाग पंचमी का पर्व सावन माह के शुक्ल की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस साल यह तिथि 25 जुलाई को है। इसलिए नाग पंचमी का पर्व 25 जुलाई को शनिवार के दिन मनाया जाएगा। खास संयोग की बात करें तो, इस नाग पंचमी में मंगल वृश्चिक लग्न में होंगे। इसी दिन कल्कि भगवान की जयंती भी है और विनायक चतुर्थी व्रत का पारण भी है।


नाग पंचमी का मुहूर्त


पंचमी तिथि प्रारंभ - 14:33 (24 जुलाई 2020)
पंचमी तिथि समाप्ति - 12:01 (25 जुलाई 2020) 
नाग पंचमी पूजा मुहूर्त - 05:38:42 बजे से 08:22:11 बजे तक
अवधि - 2 घंटे 43 मिनट




नाग पंचमी से जुड़ी भविष्यपुराण


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नाग पंचमी की कथा का जिक्र करते हुए भविष्यपुराण के पंचमी कल्प में नाग पूजा, नागों की उत्पत्ति और उनके द्वारा पंचमी तिथि को खास बनाए जाने के कारण जिक्र किया गया है। दरअसल जब सागन मंथन हुआ था, तब माता की आज्ञा न मानने के कारण इन्हें शाप मिला की राजा जनमेजय के यज्ञ में जलकर तुम सभी भस्म हो जाओगे। तब घबराए हुए नाग ब्राह्माजी के पास पहुंचे।



ब्रह्माजी ने ने इन्हें बताया कि जब नागवंश में महात्मा जरत्कारू के पुत्र आस्तिक होंगे, वह आप सभी की रक्षा करेंगे। जिस ब्रह्मा जी ने नागों की रक्षा का उपाय बताया था, वह पंचमी तिथी थी। आस्तिक मुनि ने सावन की पंचमी को ही नागों को यज्ञ में जलने से बचाया और इनके ऊपर दूध डालकर जलते हुए शरीर को शीतलता प्रदान किया। इस समय ही नागों ने आस्तिक मुनि से कहा कि पंचमी को जो भी मेरी पूजा करेगा, उसे नागदंश का भय नहीं रहेगा। तक से पंचमी तिथि के दिन नागों की पूजा की जाती है।



एक ओर कथा जिस कारण बहनें भाई के रूप में करती हैं सर्प की पूजा


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प्राचीन काल में एक सेठ जी के 7 पुत्र थे। सातों के विवाह हो चुके थे। सबसे छोटे बेटे की पत्नी उत्तम विचारों की और सुशील थी। परंतु उसके भाई नहीं था। एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने को पीली मिट्‌टी लाने के लिए सभी बहओं को साथ चलने को कहा तो सभी डलिया और खुरपी लेकर मिट्‌टी खोदने लगी। तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी।



यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा मत मारो इसे। यह बेचारा निरपराध है। यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं माता। तक सर्प एक ओर जा बैठा। तो छोटी बहू ने उससे कहा, हम अभी लौट कर आती है, तुम यहां से जाना मत। यह कहकर वह सबके साथ मिट्‌टी लेकर घर चली गई और वहां कामकाज में फंसकर सर्प से किया वादा भूल गई।

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जब उसे दूसरे दिन वह बात याद आई तो सबको साथ लेकर वहां पहुंची। सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली, सर्प भैया नमस्कार, सर्प ने कहा, तू भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड देता हूं, नहीं तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता। वह बोली, भैया मुझसे भूल हो गई, उसकी क्षमा मांगती हूं, तब सर्प बोला- अच्छा, तू आज से मेरी बहन हुई और मैं तेरा भाई हुआ। तुझे जो मांगना हो, मांग ले। वह बोली- भैया, मेरा कोई भाई नहीं, अच्छा हुआ जो आप मेरा भाई बन गए।



कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप रखकर उसके घर आया और बोला कि मेरी बहन को भेज दो। सबने कहा कि इसके तो कोई भाई नहीं था तो सर्प बोला, मै दूर के रिश्ते में इसका भाई हूं, बचपन में ही बाहर चला गया था। उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया। उसने मार्ग में बताया कि मैं वहीं सर्प हूं, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो, वहां मेरी पूछ पकड़ लेना। उसके कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार से वह सर्प के घर पहुंच गई। वहां के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई।

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एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा कि मैं एक काम से बाहर जा रही हूं, तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना। उससे यह बात ध्यान न रही और उससे गर्म दूध सर्प को पिलाया गया। जिसमें सर्प का मुख बुरी तरह से जल गया। यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई। परंतु सर्प के समझाने पर चुप हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहन को अब उसके घर भेज देना चाहिए।



तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चांदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुंचा दिया। इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्षा से कहा कि भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे ओर भी धन लाना चाहिए। सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएं सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू ने कहा कि इन्हें झाड़ने की झाडू भी सोने की होनी चाहिए। तक सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी। सर्प ने छोटी बहू को हीरा-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था।


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उसकी प्रशंसा सनने के बाद उस देश की रानी ने राजा से कहा कि सेठ की छोटी बहू का हार यहां आना चाहिए। राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो। मंत्री ने सेठ जी से जाकर कहा कि महारानी छोटी बहू का हार पहनेंगी, वह उससे लेकर मुझे दे दो। सेठ जी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मंगाकर दे दिया। छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी। उसने अपने सर्प भाई को याद किया और आने पर प्रार्थना की, भैया रानी ने हार छीन लिया, मुछ कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक सर्प बन जाए और जब वह लौटा दे तब हीरों और मणियों का हो जाए।



सर्प ने वैसा ही किया, जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया। यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी। यह देखकर राजा ने सेठ जी के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो। सेठ जी डर गया कि राजा न जाने क्या करेगा। वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर महल में पहुंचा। राजा ने छोटी बहू से पूछा कि तूने क्या जादू किया है, मैं तुझे दंड दूंगा।



छोटी बहू बोली- राजन ! धृष्टता क्षमा कीजिए, सह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है। यह सुनकर राजा ने वह बना हार उसे देकर कहा कि अभी पहन कर दिखाओ। छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना वैसे ही हार हीरो-मणियों का हो गया। यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं। छोटी बहू वह अपने हार और मुद्राओं सहित घर लौट आई। उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्षा के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है।

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यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- ठीक-ठीक बता कि यह धन तुझे कौन देता है? तब वह सर्प को याद करने लगी। तो उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा कि यदि मेरी धर्म बहन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूंगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया। उसी दिन से नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियां सर्प को भाई मानकर उनकी पूजा करती है।


नाग पंचती का त्योहार श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन नागों की पूजा की जाती है। इसलिए इस पंचमी को नागपंचमी कहते हैं। ज्योतिष के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग है। पंचमी नागों की तिथि कही जाती है। पंचमी को नाग पूजा करने वाले व्यक्ति को उस दिन भूमि नहीं खोदते है। इस व्रत में चतुर्थी के दिन एक बार भोजन करने के बाद पंचमी के दिन उपवास करने के बाद शाम को भोजन करते हैं।


दोस्तों यह हैं, नाग पंचमी से जुडी कथाएं, जिस कारण पूरे भारत में मनाई जाती है नागपंचमी। अगर आपको हमारे द्वारा दी गई जानकारी पसंद आए तो कृप्या आगे जरूर शेयर करें।

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