उजाले पीटने के दिन थोड़ा अंधेरा भी लिखना जरूरी था बस लिखने चला आया था

 


कल दूरभाष पर
बात हुई थी
उसने बताया था वो बहुत रोया था
क्या करूँ
समझ नहीं बस पाया था
घर के लोगों से साझा करने का साहस नहीं कर पाया था

दिया मानता रहा था हमेशा
बस लौ की रोशनी ही समझ पाया था

सकारात्मक रहने फैलाने बाँटने दिखाने के दिन के पहले दिन
वो अपनी सारी यँत्रणाये सुनाने के लिये कुछ सोच कर यूँ ही चला आया था

बहुत सारा अँधेरा दिये के नीचे का
दिया भी कहाँ किसी से कभी बाँट पाया था
वो जो कह रहा था सारा सब तो बहुत ही साफ और खुला था
पहले से पता था
जमाना और जमाने के आज का शिक्षक
बहुत कुछ नया सीख चुका था
धोती झोले की सोच बहुत पीछे कहीं छोड़ आया था

शोध करने की प्रबल इच्छा और मेहनत से प्राप्त कर चुका उपाधियाँ निर्धारित
एक छोटे से गाँव से निकल कर बहुत दूर चकाचौँध भरे शहर तक पहुँच पाया था
उसे कहाँ पता था पहला मील का पत्थर
शिक्षक की महत्वाकाँक्षाओं ने ही
किसी एक दल की सदस्यता की पर्ची को उसके हाथ में थमाया था

बहुत कुछ जरूरत से ज्यादा मिलने के बावजूद भी
पैसे की भूख की बीमारी से ग्रसित हो जाना भी
वो नहीं देख और समझ पाया था

दिया लेकिन देखना शुरु कर चुका था
रोशनी अपने सामने के दिये की
और उसके नीचे के अंधेरे में
एक एक करके जाते कई दिये भविष्य के
यंत्रणायें झेलने के लिये बस सालों साल

उलझते निपटते लगते निखर कर निकलते
कोई भी कहाँ समझ पाया था

तेरे ही एक दिन के पहले दिन ‘उलूक’
तेरा ही प्रिय तेरी ही एक दास्ताँ लेकर तेरे पास आया था

पुरुस्कारों की बारिशों के मेले के बीच उसके रोने को सुनकर
तू भी कहाँ जरा सा भी रो पाया था

उजाले पीटने के दिन थोड़ा अंधेरा भी लिखना जरूरी था
बस लिखने चला आया था।

चित्र साभार: https://www.thestatesman.com/

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