GDP क्या है? किसी देश के लिए जीडीपी का क्या महत्व है? कैसे होती है गणना? - Wikipedia Hindi



नमस्कार दोस्तों, विकिपीडिया हिंदी में आपका स्वागत है। इन दिनों भारत में GDP के नाम पर काफी चर्चा हो रही है। कोरोना संकट के बीच जीडीपी आंकड़ा आने के बाद लोग भारत सरकार के खिलाफ काफी पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल कर रहे हैं और मोदी सरकार की तुलना प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार से कर रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये जीडीपी होती क्या है? तो आईए जानते हैं कि क्या होती है किसी देश का जीडीपी और इसकी गणना कैसे की जाती है?


क्या होती है GDP



GDP Kya Hai

किसी देश की सीमा में एक निर्धारित समय के भीतर तैयार सभी वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक या बाजार मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) कहते हैं। यह किसी देश के घरेलू उत्पादन का व्यापक मापन होता है और इससे किसी देश की अर्थव्यवस्था की सेहत पता चलती है। इसकी गणना आमतौर पर सालाना होती है, लेकिन भारत में इसे हर तीन महीने यानी तिमाही भी आंका जाता है। कुछ साल पहले इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग और कंप्यूटर जैसी अलग-अलग सेवाओं यानी सर्विस सेक्टर को भी जोड़ दिया गया।


दो तरह से मापी जाती है जीडीपी


जीडीपी दो तरह की होती है

1. नॉमिनल जीडीपी
2. रियल जीडीपी


नॉमिनल जीडीपी सभी आंकड़ों का मौजूदा कीमतों पर योग होता है, लेकिन रियल जीडीपी में महंगाई के असर को भी समायोजित कर लिया जाता है। यानी अगर किसी वस्तु के मूल्य में 10 रुपये की बढ़त हुई है और महंगाई 4 फीसदी है तो उसके रियल मूल्य में बढ़त 6 फीसदी ही मानी जाएगी। भारत में हर तिमाही जो आंकड़े जारी होते हैं वे रियल जीडीपी के होते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार अप्रैल 2019 तक भारत का कुल जीडीपी (नॉमिनल यानी मौजूदा कीमतों पर) 2.972 अरब डॉलर था। दुनिया के कुल जीडीपी में भारत का हिस्सा करीब 3.36 फीसदी है। इसी प्रकार भारत का रियल जीडीपी (2011-12 की स्थि‍र कीमतों पर) 140.78 लाख करोड़ रुपये था।


सबसे पहले कब आया था कॉन्सेप्ट


साल 1654 और 1676 के बीच चले डच और अंग्रेजों के बीच अनुचित टैक्स को लेकर हुई लड़ाई के दौरान सबसे पहले जमीदारों की आलोचना करते हुए विलियम पेट्टी ने जीडीपी जैसी अवधारणा पेश की। हालांकि जीडीपी की आधुनिक अवधारणा सबसे पहले 1934 में अमेरिकी कांग्रेस रिपोर्ट के लिए सिमोन कुनजेट ने पेश किया। कुनजेट ने कहा कि इसे कल्याणकारी कार्यों के मापन के रूप में नहीं इस्तेमाल किया जा सकता।

हालांकि, 1944 के ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के बाद ही देशों की अर्थव्यवस्था को मापने के लिए जीडीपी का इस्तेमाल किया जाने लगा। पहले जीडीपी में देश में रहने वाले और देश से बाहर रहने वाले सभी नागरिकों की आय को जोड़ा जाता था, जिसे अब ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट कहा जाता है।


जीडीपी का आम लोगों से क्‍या है कनेक्‍शन?


जीडीपी के आंकड़ों का आम लोगों पर भी असर पड़ता है। अगर जीडीपी के आंकड़े लगातार सुस्‍त होते हैं तो ये देश के लिए खतरे की घंटी मानी जाती है। जीडीपी कम होने की वजह से लोगों की औसत आय कम हो जाती है और लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। इसके अलावा नई नौकरियां पैदा होने की रफ्तार भी सुस्‍त पड़ जाती है। आर्थिक सुस्‍ती की वजह से छंटनी की आशंका बढ़ जाती है। वहीं लोगों का बचत और निवेश भी कम हो जाता है।

जीडीपी रेट में गिरावट का सबसे ज्यादा असर गरीब लोगों पर पड़ता है। भारत मे आर्थिक असमानता बहुत ज्यादा है। इसलिए आर्थिक वृद्धि दर घटने का ज्यादा असर गरीब तबके पर पड़ता है। इसकी वजह यह है कि लोगों की औसत आय घट जाती है। नई नौकरियां पैदा होने की रफ्तार घट जाती है। इसलिए किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए जीडीपी का अहम रोल होता है।


कैसे होती है जीडीपी की गणना


जीडीपी को मापने का अंतरराष्ट्रीय मानक बुक सिस्टम ऑफ नेशनल अकाउंट्स (1993) में तय किया गया है, जिसे SNA93 कहा जाता है। इसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), यूरोपीय संघ, आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD), संयुक्त राष्ट्र और वर्ल्ड बैंक के प्रतिनिधियों ने तैयार किया है।

भारत में जीडीपी की गणना तिमाही-दर-तिमाही होती है। भारत में कृषि, उद्योग और सेवा तीन अहम हिस्से हैं, जिनके आधार पर जीडीपी तय की जाती है। इसके लिए देश में जितना भी प्रोडक्शन होता है, जितना भी व्यक्तिगत उपभोग होता है, व्यवसाय में जितना निवेश होता है और सरकार देश के अंदर जितने पैसे खर्च करती है उसे जोड़ दिया जाता है। इसके अलावा कुल निर्यात (विदेश के लिए जो चीजें बेची गईं है) में से कुल आयात (विदेश से जो चीजें अपने देश के लिए मंगाई गई हैं) को घटा दिया जाता है। जो आंकड़ा सामने आता है, उसे भी ऊपर किए गए खर्च में जोड़ दिया जाता है। यही हमारे देश की जीडीपी होता है।

जब जीडीपी में राष्ट्रीय जनसंख्या से भाग दिया जाता है तो प्रति व्यक्ति जीडीपी निकलती है। सबसे पहले तय होता है बेस ईयर यानी आधार वर्ष। एक आधार वर्ष में देश का जो उत्पादन था, वो इस साल की तुलना में कितना घटा-बढ़ा है? इस घटाव-बढ़ाव का जो रेट होता है, उसे ही जीडीपी कहते हैं।



दोस्तों उम्मीद करते हैं कि अब आप लोग समझ गए होंगे कि जीडीपी क्या होती है और जीडीपी किसी देश के लिए क्या महत्व रखती है। अगर आपका कोई सवाल हो तो आप हमें कॉमेंट कर सकते हैं।

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