बाढ़ थमने की आहट हुई नहीं बकवास करने का मौसम आ जाता है

वैसे तो
सालों हो गये अब
कुछ नहीं लिखते लिखते
और ये कुछ नहीं अब
शामिल हो लिया है
आदतों में सुबह की
एक प्याली जरूरी चाय की तरह
फिर भी इधर कुछ दिनों
कागजों में बह रही
इधर उधर फैली हुई
बहुत कुछ की आई हुई बाढ़ से
बचने बचाने के चक्कर में
कुछ नहीं भी
पता नहीं चला कहाँ खो गया है
होते हुऐ पर कुछ लिखना
कहाँ आसान होता है
हमेशा
नहीं हुआ कहीं भी
ही आगे कहीं दिख रहा होता है
अब
दौड़ में शुरु होते समय पानी की
हौले हौले से कुछ बूँदें
नजर आ ही जाती हैँ
सालों हो गये अब
कुछ नहीं लिखते लिखते
और ये कुछ नहीं अब
शामिल हो लिया है
आदतों में सुबह की
एक प्याली जरूरी चाय की तरह
फिर भी इधर कुछ दिनों
कागजों में बह रही
इधर उधर फैली हुई
बहुत कुछ की आई हुई बाढ़ से
बचने बचाने के चक्कर में
कुछ नहीं भी
पता नहीं चला कहाँ खो गया है
होते हुऐ पर कुछ लिखना
कहाँ आसान होता है
हमेशा
नहीं हुआ कहीं भी
ही आगे कहीं दिख रहा होता है
अब
दौड़ में शुरु होते समय पानी की
हौले हौले से कुछ बूँदें
नजर आ ही जाती हैँ
देख लिया जाता है
इंद्रधनुष भी बनता हुआ कहीं
किसी कोने में छा सा जाता है
कुछ के होते होते बहुत कुछ
शुरु होता है ताँडव
बूंदों का जैसे ही
पानी ही
पता नहीं चलता है
कि है कहीं
सारा बहुत कुछ खो सा जाता है
जैसे नियाग्रा
जल प्रपात से गिरता हुआ जल
धुआँ धुआँ
होना शुरु हो जाता है
‘उलूक’ भी
गहरी साँस खींचता सा कहीं से
अपनी
देखी दिखाई सुनी सुनाई पर
बक बकाई ले कर
फिर से हाजिर होना
शुरु हो जाता है।
चित्र साभार: https://www.gettyimages.co.uk/
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