पता नहीं कैसे कम बोला इस साल बमबोला बदजुबान

मेहरबान कद्रदान
बनी रहे
आन बान और शान

खुदा
मुआफ करे
किसी तरह छूटे
छूटे तो सही
गधे सी हो चुकी
ये लम्बी जुबान

काम की ना काज की
दुश्मन कलम दवात की

किसलिये
फिर फिर खोल बैठती है
पाँच दस दिन छोड़ कर
बन्द होती होती नजर आ रही
कबाड़ से भर चुकी
एक दशक पुरानी
फटे हाल बिन किताब की
पुस्तकालय का घूँघट ओढ़ी हुई
ये दुकान

राम नाम सत्य है
मुर्दा मगर मस्त है
जैसी बन चुकी हो जिसकी
शहर दर शहर श्मशान दर श्मशान
भूत प्रेतों के बीच
एक जबरदस्त पहचान

देखते हुऐ

जाते हुऐ
साल दो हजार बीस के
बनाये गये मुर्गों का
भूलना बाँग देना
और
दिखाई देना उनका
सपनों में भी
टाँग के नीचे से चोंच डालकर
कहते चले जाना
खींचो जरा जोर से खींचो
दो गज की दूरी बनाकर
अपने ना सही
पड़ोसी के ही कान

समझ में
आ ही गयी
ढोल पीटती अपनी बड़बड़ाहट
खींचती हुई नाक को
समझ कर झंडा देश का

मान कर फुसफुसाती हवा
कान में डालती जैसे मंत्र

अब तो बोल ‘उलूक’
जोर लगा कर
जय जवान जय किसान

अर्ध शतक पूरा हुआ
घबड़ाहट का ही मान लो
हड़बड़ाहट के साथ
बड़ी मुश्किल से

पता नहीं
कैसे
कम बोला इस साल
बमबोला बदजुबान ।

चित्र साभार: https://memegenerator.net/

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