ताना भगत आंदोलन

ताना भगत आंदोलन



भाग-1, भाग -2 लिंक नीचे दिया गया है।ताना भगत आंदोलन भाग --2 यहां क्लिक कर पढ़ें। संघर्ष की वो दोस्ता जिसे जतरा भगत ने कैसे अंजम दिया।

संपूर्ण झारखंड में सरदारी लड़ाई और बिरसा आंदोलन की सफलता के कारण निराशा छाई हुई थी तब अवसर का लाभ उठाकर शोषक वर्ग और भी अधिक प्रबल हो उठा था भूमि विवाद बढ़ रहे थे सामान्य लोग सर उठाकर चल नहीं सकते थे बिगारी आम समस्या बन गई थी उन्हीं दिनों अंग्रेज गवर्नर के आरामगाह के रूप में पलामू जिले के नेतरहाट घाटी को विकसित किया जा रहा था पहाड़ों पर सड़क एवं बंगलों के निर्माण में आसपास के लोगों का उपयोग बलों तथा खतरों अर्थात पशुओं जैसा किया जा रहा था स्थानीय जमींदारों और पुलिस की सांठगांठ से आम आदमी के साथ मानवीय व्यवहार हो रहा था उसी कालखंड में देवी कृपा से जत्रा उड़ान का उदय हुआ।

1) जतरा (ताना) भगत का परिचय-:
झारखंड में सुविख्यात ताना भगत आंदोलन के जनक जतरा भगत का जन्म अट्ठारह सौ अट्ठासी ईस्वी में गुमला जिले के बिशनपुर प्रखंड के अंतर्गत चिंगरी नावटोला में हुआ था। इनके पिता का नाम कोहरा भगत और माता का नाम लिवरी भगत तथा इनकी पत्नी बुधनी भगत थी। यद्यपि जतरा भगत की जन्म तिथि ठीक ठाक ज्ञात नहीं है किंतु आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को सामान्य मान्यता मिलने के कारण प्रत्येक वर्ष गांधी जयंती के दिन ही चिंगरी ग्राम में इनकी जयंती मनाई जाती है। और भी अधिक लिंक से पढें--https://alltimesupehitknowledge.blogspot.com/2020/09/blog-post_8.html

2) जतरा भगत की शिक्षा दीक्षा-:
मान्यता है कि गुरु ग्राम, हेसराग के श्री तुरिया भगत से तंत्र मंत्र की विद्या सीखने के क्रम में जतरा भगत को 1914 ईस्वी में अचानक आत्मबोध हुआ। उन्होंने जाना कि यदि तंत्र मंत्र से बड़ी-बड़ी बीमारियां ठीक हो सकती है और लोगों का आत्मविश्वास लौट सकता है तो क्यों ना इसके माध्यम से समाज में व्याप्त अत्याचार रूपी बीमारी को भी ठीक किया जाए। जनजातियों पर अंग्रेजी राज के अत्याचार, जमींदारों द्वारा बेगारी, समाज में फैले अंधविश्वास एवं नाना प्रकार की कुरीतियों से पीड़ित आदिवासी समुदाय को सन्मार्ग दिखाने का संकल्प लेकर युवा जतरा उरांव जतरा भगत बन गया था।

3) ताना भगत आंदोलन का प्रारंभ-:
इस प्रकार ताना भगत आंदोलन की आरंभ अप्रैल 1914 ईस्वी में हुआ। वस्तुतः टाना भगत उरांवों की वह शाखा है , जिसमें कुडखों के मूल धर्म कुडुख धर्म को अपना लिया था। 'ताना' शब्द का अर्थ तनना या खींचना है। ताना भगत अपनी गिरी हुई स्थिति से खिन्न थे और इस में परिवर्तन लाना चाहते थे। उन्होंने भली प्रकार समझ लिया था कि अपनी स्थिति सुधारने का एकमात्र तरीका ईश्वर की आज्ञा मानना और उससे तादात्म्य स्थापित करना था। ईश्वर से तादात्म्य स्थापित करने का सही मार्ग सभी अपवित्र वस्तुओं का परित्याग करना और जीवन की शुद्धता था। इसलिए उन्होंने उन सभी वस्तुओं का परित्याग कर दिया, जिन्हें वे अशुद्ध समझते थे और जादू टोना का भी विरोध किया। उनका विश्वास था कि धर्मेश(ईश्वर) समान रूप से देखता है कि लोग उनकी आज्ञा का पालन कर रहे हैं और वह उन वस्तुओं का भी वह विनाश करता है जो लोगों को हानि पहुंचाती है। ताना भक्तों की अधिकांश आबादी झारखंड के बिशुनपुर घाघरा, गुमला, रायडीह, चैनपुर, पालकोट, सिसई, लापुंग तथा मांडर आदि में स्थित है। इनकी कुल संख्या लगभग 10,000 है जो प्राय: 150 परिवारों में विभाजित है। उस समय जब जतरा भगत ने इस आंदोलन को शुरू किया था तब वह मती (ओझा) का प्रशिक्षण ले रहा था। मान्यता है कि वह एक रात जब प्रशिक्षण लेकर लौट रहा था तब धर्मेश(ईश्वर) ने दर्शन दिया और कहा कि वह मतिभाव सीखना बंद कर दें और भूत प्रेत तथा बलि इत्यादि में विश्वास करना त्याग दें। इसके अतिरिक्त वह मांस मदिरा का भी परित्याग कर दें और खेतों में हल चलाना बंद कर दें क्योंकि इससे गायों - बैलों को केवल तकलीफ होती है और अकाल एवं गरीबी से भी छुटकारा नहीं मिलता है।

4) जतरा की शिक्षाएं-:
जतरा ने लोगों से कहना आरंभ किया कि ईश्वर यह नहीं चाहता कि लोग अब जमींदारों एवं धर्मावलंबियों तथा गैर आदिवासियों की यहां कुलियों एवं मजदूरों का काम करें। उसने यह भी घोषणा की कि ईश्वर ने उसे जनजातियों का नेतृत्व सौंपा है और उसे उन्हें समझाने को कहा है कि वे धर्मेश अर्थात ईश्वर की पूजा करें क्योंकि तभी उनकी इच्छाएं पूर्ण होंगी।
         इस प्रकार ताना भगत ने ना उन विचारों को व्यक्त किया जो आदिवासियों के मानस को काफी समय से उद्वेलित कर रहे थे अन्य शब्दों में उसने एक निश्चित जनजातीय धर्म स्थापित करने में लोगों की सहायता की। वस्तुतः इस प्रक्रिया की शुरुआत बिरसा मुंडा के समय में ही हो गई थी अब केवल जतरा तथा अन्य परवर्ती जनजातियां मसीहा उन्हें उस परिकल्पना को मूर्त रूप प्रदान किया था।

5) आंदोलन का प्रचार-:
!)-हनुमान उरांव द्वारा प्रचार -:भाग दो क्रमशः आगे यहां क्लिक कर पढ़ें----

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