Lohri 2021 : क्यों और कैसे मनाई जाती है लोहड़ी - Wikipedia Hindi


नमस्कार दोस्तों विकिपीडिया हिंदी में आपका स्वागत है। 13 जनवरी को लोहड़ी का पर्व है। इसलिए सबसे पहले सभी पाठकों को लोहड़ी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। आज के इस पोस्ट में हम आपको लोहड़ी पर्व का इतिहास बताने वाले हैं कि आखिर लोहड़ी क्यों और कैसे मनाई जाती है। इसलिए यह पोस्ट आपके ज्ञान को बढ़ाने का भी काम करने वाली है।

Happy Lohri 2021


दोस्तों लोहड़‍ी पर्व पर 13 जनवरी को पंजाबी समुदाय में परिवार के सदस्यों के साथ लोहड़ी पूजन की सामग्री जुटाकर शाम होते ही विशेष पूजन के साथ आग जलाकर लोहड़ी का जश्न मनाया जाएगा। इस दौरान लोहड़ी के भुग्गे पर मूंगवाली, रेवड़ी, तिल आदि डालकर मनोकामनाएं मांगी जाती है।

पंजाबी परिवारों में लोग लोहड़ी का बेसर्बी से इंतजार करते हैं क्योंकि लोहड़ी से पहले अगर किसी का विवाह होता है या फिर किसी के घर बच्चे का जन्म होता है तो परिवार उसकी लोहड़ी बांटते हैं। पहले सिर्फ लड़कों की लोहड़ी बांटी जाती थी, लेकिन आजकल लड़कियों की भी लोहड़ी बांटी जाती है। इसलिए लोग लोहड़ी को मिलन का पर्व भी समझते हैं।
 

क्या होती है लोहड़ी?


मकर संक्रांति से पहले वाली रात को सूर्यास्त के बाद मनाया जाने वाला पंजाब प्रांत का पर्व है लोहड़ी। जिसका का अर्थ है-
                                      ल (लकड़ी)+ ओह (गोहा यानी सूखे उपले)+ ड़ी (रेवड़ी)
इस पर्व के 20-25 दिन पहले ही बच्चे 'लोहड़ी' के लोकगीत गा-गाकर लक्कड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं। फिर इकट्‍ठी की गई सामग्री को ‍चौराहे/मुहले के किसी खुले स्थान पर आग जलाते हैं। इस उत्सव को पंजाबी समाज बहुत ही जोशो-खरोश से मनाता है। गोबर के उपलों की माला बनाकर मन्नत पूरी होने की खुशी में लोहड़ी के समय जलती हुई अग्नि में उन्हें भेंट किया जाता है। इसे 'चर्खा चढ़ाना' कहते हैं। 

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लेकिन आजकल पहले वाली लोहड़ी नहीं रही है। आजकल बच्चे घरों में लोहड़ी मांगने नहीं आते हैं और न ही लड़कियां और महिलाएं मोहल्लों में लोहड़ी मांगने निकलती है। धीरे-धीरे भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण यह पर्व भी लुप्त होता जा रहा है। आज लोग अपने घर में इकट्‌ठा होकर चूल्हे में ही तिल-रेवड़ियां डालकर लोहड़ी पर्व मना लेते हैं। जिसके कारण हमारे युवा पीढ़ी को इस पर्व के बारे में बहुत कम जानकारी है।

कैसे मनाई जाती है लोहड़ी?


लोहड़ी मनाने के लिए लकड़ियों की ढेरी पर सूखे उपले भी रखे जाते हैं। समूह के साथ लोहड़ी पूजन करने के बाद उसमें तिल, गुड़, रेवड़ी एवं मूंगफली का भोग लगाया जाता है। इस अवसर पर ढोल की थाप के साथ गिद्दा और भांगड़ा नृत्य विशेष आकर्षण का केंद्र होते हैं।
 
पंजाबी समाज में इस पर्व की तैयारी कई दिनों पहले ही शुरू हो जाती है। इसका संबंध मन्नत से जोड़ा गया है अर्थात जिस घर में नई बहू आई होती है या घर में संतान का जन्म हुआ होता है, तो उस परिवार की ओर से खुशी बांटते हुए लोहड़ी मनाई जाती है। सगे-संबंधी और रिश्तेदार उन्हें इस दिन विशेष सौगात के साथ बधाइयां भी देते हैं।

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लोहड़ी के दिन जहां शाम के वक्त लकड़ियों की ढेरी पर विशेष पूजा के साथ लोहड़ी जलाई जाएगी, वहीं अगले दिन प्रात: मकर संक्रांति का स्नान करने के बाद उस आग से हाथ सेंकते हुए लोग अपने घरों को आएंगे। इस प्रकार लोहड़ी पर जलाई जाने वाली आग सूर्य के उत्तरायन होने के दिन का पहला विराट एवं सार्वजनिक यज्ञ कहलाता है।
 
इस उत्सव का एक अनोखा ही नजारा होता है। लोगों ने अब समितियां बनाकर भी लोहड़ी मनाने का नया तरीका निकाल लिया है। ढोल-नगाड़ों वालों की पहले ही बुकिंग कर ली जाती है। अनेक प्रकार के वाद्य यंत्रों के साथ जब लोहड़ी के गीत शुरू होते हैं तो स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चे सभी स्वर में स्वर, ताल में ताल मिलाकर नाचने लगते हैं।

पंजाबी घरों में जब लोहड़ी जलाई जाती है तो भुग्गे पर तिल और रेवड़ियां आदि डालकर बोलते हैं कि 'इशर आ दलिद्दर जा, दलिद्दर दी जड़ चुल्ले पा' इस मतलब होता है कि नए वर्ष में ईश्वर का वास हो और हमारे अंदर बैठा दलिद्दर यानि काम, मोह, माया आदि चली जाए। ऐसे ओर भी कई गान प्रसिद्ध हैं, जो लोहड़ी पर्व के दौरान गाए जाते हैं।

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इस अवसर पर 'ओए, होए, होए, बारी बर्सी खटन गया सी, खडके लेआंदा रेवड़ी...', इस प्रकार के पंजाबी गाने लोहड़ी की खुशी में खूब गाए जाएंगे। लोहड़ी पर शाम को परिवार के लोगों के साथ अन्य रिश्तेदार भी इस उत्सव में शामिल होते हैं। यद्यपि बधाई के साथ अब तिल के लड्डू, मिठाई, ड्रायफूट्‍स आदि देने का रिवाज भी चल पड़ा है फिर भी रेवड़ी और मूंगफली का विशेष महत्व बना हुआ है। इसीलिए रेवड़ी और मूंगफली पहले से ही खरीदकर रख ली जाती है।

इस पर्व का एक यह भी महत्व है कि बड़े-बुजुर्गों के साथ उत्सव मनाते हुए नई पीढ़ी के बच्चे अपनी पुरानी मान्यताओं एवं रीति-रिवाजों का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं ताकि भविष्य में भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी उत्सव चलता ही रहे। ढोल की थाप के साथ गिद्दा नाच का यह उत्सव शाम होते ही शुरू हो जाता है और देर रात तक चलता ही रहता है। वहां सभी उपस्थित लोगों को यही चीजें प्रसाद के रूप में बांटी जाती हैं। इसके साथ ही पंजाबी समुदाय में घर लौटते समय 'लोहड़ी' में से 2-4 दहकते कोयले भी प्रसाद के रूप में घर लाने की प्रथा आज भी जारी है।  

दोस्तों अब तो आप समझ ही गए होंगे कि लोहड़ी क्यों और कैसे मनाई जाती है। अगर आपको किसी प्रकार की कोई जानकारी समझ न आई हो या कुछ गलत लिखा गया हो तो कृप्या हमें एक बार कॉमेंट करके जरूर लिखें ताकि उसे सुधार किया जा सके और अगर आपको जानकारी पसंद आए तो कृप्या आगे जरूर शेयर करें। 

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