प्रेमचंद (जनता का सच्चा लेखक)

 प्रेमचंद (जनता का सच्चा लेखक)

प्रेमचंद जनता के सच्चा लेखक


इस पोस्ट में आप लोगों को भारत के लेखक प्रेमचंद जी के बारे में पूरी जानकारी दी जाएगी मेरा आप लोगों से अनुरोध है कि आप लोग इस पोस्ट को पूरा पढ़ें और कमेंट में बताएं कि यह पोस्ट आप लोगों को कैसी लगी।


प्रेमचंद हिंदी के उन महान् लेखकों में से हैं जिनका यश पूरी दुनिया में फैला है । संसार की सभी प्रमुख भाषाओं में उनकी रचनाओं के अनुवाद हुए हैं । उन्हें भारत के ऐसे तेजस्वी सपूत के रूप में याद किया जाता है , जिनकी रचनाओं में धरती का दर्द और भारत की जनता का हृदय बोलता है सच तो यह है कि प्रेमचंद ने अपने सादा , निरभिमानी जीवन और रचनाओं में एक सच्चे लेखक का बहुत ऊँचा आदर्श प्रस्तुत किया । उन्होंने अपनी रचनाओं को भारत की विशाल जनता के सुख दु : ख और आकांक्षाओं से जोड़ा था । प्रेमचंद की कहानी और उपन्यासों में बहुत गहराई से भारत का दु : ख , गरीबी , गुलामी की पीड़ा और हाहाकार का चित्रण है । भारत की गरीब जनता और किसानों का दर्द है । इसलिए वे भारत के महानतम लेखक माने जाते हैं । हालाँकि इतने बड़े लेखक होने के बावजूद प्रेमचंद का जीवन बहुत सादा था । वे घोर गरीबी में जिए । इसीलिए उन्हें " कलम का सिपाही ' भी कहा जाता है । इस कलम के सिपाही ने ' गोदान ' , ' रंगभूमि ' , ' कर्मभूमि ' , ' प्रेमानम ' , ' सेवासदन ' ' निला ' और ' गबन ' जैसे महान् उपन्यास लिखे जिनमें भारत के अंधविश्वासों पर चोट है तथा गुलामी की बेड़ियों पर तीखा प्रहार । इसलिए प्रेमचंद के उपन्यासों ने भारत की तसवीर बदल दी । उन्होंने पूरे भारत में नई चेतना और जागृति की लहर पैदा कर दी । भारत की जनता ने इतने प्रेम और आदर से उन्हें अपनाया कि देखते ही - देखते प्रेमचंद हिंदी के उपन्यास - सम्राट ही नहीं , भारत के हृदय सम्राट भी बन गए । उनके जाने के इतने वर्षों बाद भी उनकी ये रचनाएँ हमें अपनी , बिल्कुल अपनी लगती हैं । प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई , 1880 को बनारस के पास लमही नाम गाँव में हुआ था । उनके बचपन का नाम था धनपत राय । पिता डाकखाने में क्लर्क थे । प्रेमचंद का जीवन सीधे - सादे ढंग से बीत रहा था कि आठ साल की अवस्था में माँ का साया सिर से उठ गया । पिता का दूसरा विवाह हो गया । घर में नई माँ आ गईं । प्रेमचंद का अकेलापन थोड़ा बढ़ गया । वे चुपचाप या तो भालू - बंदर नचाने वाले मदारी के पीछे - पीछे घूमकर दिन काट देते थे या फिर दोस्तों के साथ खेल - कूद में । खासकर गुल्ली - डंडा तो उन्हें बेहद प्रिय था । पढ़ाई इतनी ज्यादा अच्छी नहीं लगती थी । इसके बजाय कहानी - किस्से की किताबें अच्छी लगती थीं । धीरे - धीरे कहानी - किस्सों का चाव इतना बढ़ गया कि अपने दोस्तों से किताबें उधार माँगकर लाते थे । दो - तीन वर्षों में उन्होंने सैकड़ों उपन्यास पढ़ डाले । यहीं से प्रेमचंद ने कहानी कहने की कला या किस्सागोई का गुर सीखा । प्रेमचंद की कोई भी रचना आप उठा लीजिए , उसे पूरा किए बगैर रख देना मुश्किल है । प्रेमचंद की कला में यह निखार बचपन में पढ़ी हुई किस्से - कहानी की ही इन किताबों से आया । पिता के गुजरने के बाद प्रेमचंद के जीवन में कठिनाइयाँ और बढ़ गईं । अभी वे नौवीं कक्षा में थे । घर में पैसा बिलकुल नहीं था , ऊपर से विमाता की जिम्मेदारी भी । खुद प्रेमचंद की हालत यह थी कि न पाँव में जूते थे और न देह पर साबुत कपड़े । हैडमास्टर ने दया करके फीस माफ कर दी थी । प्रेमचंद एक बच्चे को ट्यूशन पढ़ाते थे , साथ - ही - साथ अपनी पढ़ाई भी खुद करते थे । किसी तरह हाईस्कूल तो पास कर लिया लेकिन आगे पढ़ाई मुश्किल थी । गणित में वे कमजोर थे और बिना गणित के वे इंटरमीडिएट पास नहीं कर सकते थे । तभी संयोगवश चुनार के एक छोटे - से स्कूल के हैडमास्टर से उनकी मुलाकात हुई । हैडमास्टर के कहने से उन्होंने स्कूलमास्टरी शुरू कर दी । अट्ठारह रुपए महीना वेतन मिलता था । उस समय प्रेमचंद जिस हालत में थे , उसमें यह उनके लिए बहुत बड़ा सहारा था । पर कुछ समय बाद ही उन्हें यह नौकरी छोड़नी पड़ी । कारण यह था कि उस स्कूल की टीम और फौज की टीम में फुटबाल का मैच हो रहा था । स्कूल की टीम जीत रही थी । जीत के बाद लड़के खुशी के मारे नाचने - कूदने लगे । तभी एक गोरे फौजी ने एक बच्चे को बूट से ठोकर मारी । प्रेमचंद यह देख रहे थे । उन्होंने आव देखा न ताव , मैदान की सीमाओं पर गड़ी हुई एक झंडी उखाड़ी और उसकी डंडी लेकर उस पर पिल पड़े । फिर तो सभी लड़के गोरे फौजियों पर टूट पड़े और उनकी ऐसी मरम्मत हुई कि उन्हें छठी का दूध याद आ गया । कुछ समय बाद क्वींस कॉलेज के अंग्रेज प्रिंसिपल बेकन साहब की सिफारिश पर प्रेमचंद को एक सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई । कुछ वर्ष बाद इलाहाबाद , कानपुर , हमीरपुर , गोरखपुर कई जगहों पर इस नौकरी के सिलसिले में उनके तबादले हुए । इससे प्रेमचंद को जीवन को निकटता से और उसकी पूरी विविधता के साथ देखने का अवसर मिला । उन दिनों देश में स्वाधीनता आंदोलन तेजी से चल रहा था । बाल गंगाधर तिलक के तेजस्वी व्यक्तित्व ने पूरे देश में आत्मगौरव , स्वाधीनता और जागृति की लहर पैदा कर दी । गांधीजी के नाम का प्रभाव भी छाता जा रहा था । प्रेमचंद भी उनसे प्रभावित थे । उन्होंने देशभक्ति की कई कहानियाँ लिखीं । उर्दू में उन कहानियों का संग्रह ' सोजेवतन ' नाम से छपा । यह किताब जब जिलाधीश के पास पहुँची तो उन्होंने प्रेमचंद को मिलने के लिए बुलाया । जिलाधीश ने उन्हें कहा कि वे ' सोजेवतन ' की सारी प्रतियाँ सरकार के हवाले कर दें और उनकी अनुमति के बिना आगे कुछ न लिखें । प्रेमचंद उन दिनों नवावराय के नाम से लिखा करते थे । यह भी उनका एक घरेलू नाम ही था । उन्होंने ' सोजेवतन ' की सारी प्रतियाँ सरकार को सौंप दी । लेकिन यह उन्हें मंजूर नहीं था कि वे जो भी लिखें , वह सरकारी अधिकारियों से पूछकर लिखें । फिर भला वे भारत की जनता का दुःख - दर्द कैसे लिख पाएँगे ! उन्होंने अपने ढंग से लिखना तो नहीं छोड़ा , हाँ चुपचाप अपना लेखकीय नाम बदलकर प्रेमचंद कर लिया । और आश्चर्य ! प्रेमचंद नाम से उन्हें जो ख्याति और ऊँचाई मिली , उसे देखकर सारा साहित्यिक जगत् चकित रह गया । सन् 1921 में प्रेमचंद गोरखपुर में थे । तभी गांधीजी वहाँ आए और उन्होंने सरकारी नौकरी करने वालों को अपनी नौकरी छोड़ देने का आह्वान किया । उस समय प्रेमचंद पर एक भरे - पूरे परिवार का बोझ था । पत्नी शिवरानी देवी के अलावा दो बेटे और एक बेटी । सबको पढ़ाना - लिखाना था , घर का खर्च भी चलाना था । फिर 21 साल पुरानी नौकरी ! मन में द्वंद्व था छोड़ें , न छोड़ें ? उन्होंने शिवरानी देवी से पूछा , तो पत्नी ने हौसला बढ़ाया और प्रेमचंद ने निश्चय कर लिया कि वे अब सबकुछ छोड़ - छाड़कर सिर्फ लिखेंगे । और भले ही स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने सीधे - सीधे हिस्सा न लिया हो ; लेकिन उन्होंने जो कुछ लिखा , उससे स्वाधीनता आंदोलन की चिनगारियाँ घर - घर पहुँच गई । उनकी रचनाएँ पढ़कर हजारों लोग देश और समाज के लिए काम करने की प्रतिज्ञा लेकर आगे आए । उनके आगे बड़ी - से - बड़ी परेशानियाँ भी आई । लेकिन उनके साथ शिवरानी देवी जैसी दबंग महिला थीं , जिन्होंने उनका पूरा साथ दिया और प्रेमचंद अपने रास्ते पर आगे बढ़ते गए । बीच में अपना प्रेस खोलकर उन्होंने ' हंस ' और ' जागरण ' जैसे पत्र भी निकाले । लेकिन प्रेमचंद तो लेखक थे , व्यापार - बुद्धि उनमें नहीं थी इसलिए उन्हें बहुत घाटा उठाना पड़ा । इस घाटे को पूरा करने के लिए वे मुंबई के एक फिल्म - निर्माता के बुलाने पर वहाँ चले गए । साल भर वहाँ रहे । लेकिन फिल्मों की ऊपरी चकाचौंध वाली काल्पनिक दुनिया उन्हें रास नहीं आई । प्रेमचंद तो जीवन के यथार्थ के कलाकार थे । वे तो वास्तविक दुनिया में रहते थे और अपनी रचनाओं की चोट से उसे ही सुंदर बनाने के लिए हर क्षण सोचते रहते थे । फिल्मी दुनिया में उनका दम घुट रहा था । आखिर वे मुंबई से बनारस लौट आए और अपना महान् उपन्यास ' गोदान ' पूरा करने में जुट गए । गोदान को साहित्यिक जगत् ने हाथोंहाथ लिया और इसे उनकी महानतम कृति माना गया । प्रेमचंद की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे बड़ों में जितने लोकप्रिय हैं , बच्चे भी उतनी ही रुचि से उन्हें पढ़ते हैं । उनकी ' बड़े भाई साहब ' , ' गुल्ली - डंडा ' , ' दो बैलों की कथा ' , ' ईदगाह ' सरीखी कहानियाँ बच्चे भी बड़े शौक से पड़ते हैं । प्रेमचंद ने बच्चों के लिए ' कुत्ते की कहानी ' नाम से एक अनोखा मर्मस्पर्शी उपन्यास भी लिखा है , जिसे हिंदी का पहला बाल उपन्यास माना जाता है । इसी तरह ' जंगल की कहानियाँ ' नाम से उन्होंने बच्चों के लिए चीता , बनमानुष आदि वन्य जीवों को आधार बनाकर सुंदर और मार्मिक कहानियाँ लिखी । 8 अक्तूबर , 1936 को केवल 56 वर्ष की अवस्था में प्रेमचंद का देहांत हुआ । आज उनकी रचनाएँ टॉलस्टॉय , गोर्की और चेखव की रचनाओं की तरह विश्व साहित्य की अनुपम धरोहर मानी जाती हैं ।




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