ऊष्मा ( Heat )( Physics ) part-6

 ऊष्मा ( Heat ) 

  •  गर्मी या ठण्डे पन के अनुभव होने को ऊष्मा कहते हैं । 
  • ऊष्मा एक प्रकार की ऊर्जा है जो किसी गर्म वस्तु में अधिक और ठण्डी वस्तु में कम होती है ।
  • जब कभी कार्य ऊष्मा में बदलता है या ऊष्मा कार्य में बदलती है तो किये गये कार्य व उत्पन्न ऊष्मा का अनुपात एक नियतांक होता है जिसे ऊष्मा यांत्रिक तुल्यांक कहते हैं । 
  • इसे J से प्रदर्शित करते है ।
  •  ऊष्मा का SI मात्रक जूल और C.G.S मात्रक कैलोरी है । 

ऊष्मा के मात्रक ( Units of Heat ) : 

  • ऊष्मा के विभिन्न मात्रक निम्नलिखित हैं-

कैलोरी ( Calorie ) : 

  • एक ग्राम जल का ताप 1 ° C बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को कैलोरी ' कहते हैं । 
अंतर्राष्ट्रीय कैलोरी ( International Calorie ) : 
  • एक ग्राम पानी का ताप 14.5 ° C से 15.5 ° C तक बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को अंतर्राष्ट्रीय कैलोरी कहते हैं । 
ब्रिटिश थर्मल यूनिट : -

  • 1 पौंड पानी ताप 1 डिग्री फारेनहाइट बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को ब्रिटिश थर्मल यूनिट कहते हैं ।
  •  इसे B.Th.U से प्रदर्शित करते हैं ।

 मात्रकों के संबंध:-

  • 1 B.Th.U = 252 कैलोरी 
  • 1 कैलोरी =4.18 जूल 
  • 1 किलो कैलोरी = 4.18 x 10^3 जूल= 1000 कैलोरी 

तापमापी ( Thermometer )



  • ताप मापने वाले यंत्र को तापमापी कहते हैं ।
  • ताप मापने के लिए पदार्थ के किसी ऐसे गुण का प्रयोग किया जाता है जो ताप पर निर्भर करता है । 

 द्रव तापमापी ( Liquid Thermometer ) :-

  •  मुख्यतः एल्कोहल या पारे का प्रयोग किया जाता है । 
  • एल्कोहल का प्रयोग -40 ° C से नीचे के ताप को मापने के लिए किया जाता है क्योंकि एल्कोहल -115 ° C पर जमता है ।
  •  पारे को तापमापी के लिए प्रयोग -30 ° C से 350 ° C तक के ताप मापने के लिए किया जाता है क्योंकि पारा -39 ° C पर जम जाता है एवं 357 ° पर उबलने लगता है । 
  • मनुष्य के शरीर को ताप मापने वाले थर्मामीटर को क्लिनिकल थर्मामीटर कहते हैं ।
  •  इस थर्मामीटर में न्यूनतम बिन्दु 95 ° F ( 35 ° C ) और उच्चतम बिन्दु 110 ° F ( 43 ° C ) अंकित होता है ।
  • हाइड्रोजन गैस तापमापी से 500 ° C तक के ताप को मापा जा सकता है ।
  •  नाइट्रोजन गैस तापमापी से 1500 ° C तक के ताप को मापा जा सकता है। 
  • 200 ° C से 1200 ° C तक के ताप को मापने के लिए प्लैटिनम प्रतिरोध तापमापी का उपयोग किया जाता है ।
  •  तापयुग्म तापमापी से -200 ° C से 1600 ° C तक के ताप को मापा जा सकता है ।
  •  यह तापमापी सीवेक प्रभाव पर आधारित है । 
  • अत्यधिक ऊँचे एवं दूर स्थित वस्तुएँ , जैसे सूर्य इत्यादि के तापों को मापने के लिए पूर्ण विकिरण उप्तापमापी का प्रयोग किया जाता है । 
  • इसके द्वारा प्राय : 800 ° C से ऊँचे ताप ही इस तापमापी से मापे जाते हैं । यह तापमापी है।
  • स्टीफन के नियम पर आधारित कियाहै।

 तापमान के पैमाने ( Scales of Temperature ) सेल्सियस ( Celsius Scale ) :

  •  सेल्सियस पैमाने का आविष्कार स्वीडन के वैज्ञानिक सेल्सियस ने किया था 
  • जिसके कारण उन्हीं के नाम पर इसे सेल्सियस पैमाना कहते हैं । 
  • सेल्सियस पैमाने में हिमांक को 0 ° C तथा भाप - बिन्दु को 100 ° C में अंकित किया जाता है 
  •  इनके बीच की दूरी को 100 बराबर भागों में बांट दिया जाता है तथा प्रत्येक भाग को 1 ° C कहते हैं । 

फॉरेनहाइट पैमाना ( Fahrenheir Scale ) : 

  • फॉरेनहाइट पैमाने का आविष्कार जर्मन वैज्ञानिक फॉरेनहाइट ने किया था ।
  • फॉरेनहाइट पैमाने में ताप को अंग्रेजी के बड़े अक्षर ' F ' से प्रदर्शित करते हैं ।
  •  इस पैमाने में हिमांक या निचले बिन्दु को 32 ° F तथा भाप बिन्दु या ऊपरी बिन्दु को 212 ° C पर अंकित किया जाता है 
  • इनके बीच की दूरी को 180 बराबर खानों में बांट दिया जाता है ।
  •  फॉरेनहाइट पैमाने का उपयोग वैज्ञानिक मौसम का अनुमान लगाने व चिकित्सा के क्षेत्र में करते हैं 
  • जिसके स्थान पर अब सेल्सियस पैमाने का उपयोग किया जाता है ।

रयूमर पैमाना ( Reaumur Seale ) : 

  • रयूमर पैमाने पर अधोबिन्दु या हिमांक को 0 ° तथा ऊर्ध्वबिन्दु या भाप बिन्दु को 80 ° पर अंकित किया जाता है । इन दोनों बिन्दुओं के बीच की दूरी को 80 बराबर भागों में बांट दिया जाता है
  •   इस पैमाने पर ताप को R से प्रदर्शित करते हैं । 

केल्विन पैमाना ( Kelvin Scale ) :

  •  केल्विन पैमाने पर हिमांक या अधोबिन्दु को 273 ° K तथा भाप बिन्दु को 373 ° पर अंकित किया जाता है ।
  •  इन दोनों बिन्दुओं के बीच की दूरी को समान 100 भागों में विभाजित कर दिया जाता है । 
  • केल्विन पैमाने पर ताप को केल्विन ( K ) से व्यक्त किया जाता है । 
  • इस पैमाने में अधोबिन्दु 0 ° K जल के हिमांक से 273 ° K नीचे होता है ।

विशिष्ट ऊष्मा ( Specific Heat ) :

  •  किसी पदार्थ के 1 ग्राम द्रव्यमान के ताप में 1 ° C वृद्धि करने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को उस पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा कहते हैं । 
  •  विशिष्ट ऊष्मा का मात्रक कैलोरी / ग्राम डिग्री सेल्सियस है ।
  •  1 ग्राम जल का ताप 1 ° C बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊष्मा की मात्रा को 1 कैलोरी कहते हैं । 
  • ऊष्मा का बड़ा मात्रक किलो कैलोरी है जो 1000 कैलोरी के बराबर होता है ।

परम ताप : 

  • परम ताप केल्विन मापक्रम पर आधारित है जिसके अनुसार दाब पर पानी का हिमांक 263 ° K और क्वथनांक 363K होता है । 
  • परम ताप का मान सेन्टीग्रेड ताप और 273 ° K के योग के बराबर होता है ।
  •  परम शून्य -273.15 ° C के बराबर होता है । सिद्धांततः परम शून्य ताप पर समस्त आण्विक गतियाँ शून्य हो जाती हैं । 

परम शून्य तापमान : 

  • वह तापमान जिस पर गैस का आयतन और दाब शून्य हो जाता है , परम शून्य तापमान कहलाता है । 
  • यह -273.15 ° C के बराबर होता है । -

दाब का नियम ( Pressure Law ) :

  •  स्थिर आयतन पर किसी गैस के निश्चित द्रव्यमान का दाब ( P ) उसके ताप ( T ) के अनुक्रमानुपाती होता है अर्थात् P  T ( स्थिर आयतन पर ) P नियतांक T - चार्ल्स का नियम ( Charle's Law ) : 
  • स्थिर दाब पर किसी गैस के निश्चित द्रव्यमान का आयतन ( V ) उसके परम ताप ( TK ) के समानुपाती होता है । 
  • V  T दोनों नियमों को मिलाने पर PV = RT मिलता है जहाँ R स्थिरांक है । PV = RT आदर्श गैस समीकरण कहलाता है । 
  • जो गैस इसका पूर्णरूपेण पालन करता है , वह आदर्श गैस कहलाती है ।
  •  अर्थात् V T ( स्थिर दाब पर ) 
  • जहाँ T परम ताप = ( t° सेंटीग्रेड + 273.15 ° ) केल्विन 

बॉयल का नियम ( Boyle's Law ) :

  • स्थिर ताप पर किसी गैस के निश्चित द्रव्यमान का आयतन ( V ) उसके दाब ( P ) के व्युत्क्रमानुपाती होता है । 

 एवोगाड्रो का नियम ( Avogadro's Law ) : 

  • समान ताप और दाब पर सभी गैसों के समान आयतन में अणुओं की संख्या भी समान होती है , अर्थात् V « N ( स्थिर ताप और दाब पर ) । 

  • जहाँ N = गैस के अणुओं की संख्या तथा V = आयतन । 
  • सामान्य ताप एवं दाब पर विभिन्न गैसों के एक ग्राम अणु का आयतन 22.4 लीटर होता है तथा इस 22.4 लीटर 6.02 x 102 अणु होते हैं ,
  •  यही संख्या एवोगाड्रो संख्या कहलाती है । 

ऊर्ध्वपातन : 

  • जब किसी ठोस को गर्म किया जाता है तो वह पहले द्रव में फिर गैस में परिवर्तित होते हैं , लेकिन जब कोई पदार्थ गर्म करने पर ठोस अवस्था से सीधे गैस अवस्था में परिवर्तित हो जाता है तो इस क्रिया को उर्ध्वपातन कहते हैं ।
  •  जैसे - कपूर को गर्म करने पर वह बिना द्रव में बदले सीधे गैस में बदल जाता है । 

 गुप्त ऊष्मा ( Latent Heat ) : 

  • ताप की वह मात्रा जो तापक्रम में परिवर्तन लाए बिना एक ग्राम पदार्थ के अवस्था परिवर्तन के लिए अपेक्षित हो , गुप्त ऊष्मा कहलाती है ।
  •  इसे जूल / किग्रा . या कैलोरी / ग्राम में मापा जाता उबलते जल की अपेक्षा भाप से जलने पर अधिक कष्ट होता है क्योंकि 100 ° C के जल की अपेक्षा 100 ° C के भाप की गुप्त ऊष्मा का मान अधिक होता है , इसलिए जल की अपेक्षा भाप से जलने पर अधिक कष्ट होता है । 

 गलन तथा गलनांक ( Melting and Melting Point ) : 

  • पदार्थों के ठोस अवस्था से द्रव अवस्था में परिवर्तित होने को गलन कहते हैं तथा वह स्थिर ताप जिस पर पदार्थ ठोस अवस्था से द्रव अवस्था में परिवर्तित होता है , ठोस का गलनांक कहलाता है । 

वाष्पीकरण ( Evaporation ) :

  •  किसी भी ताप पर पदार्थों की द्रव अवस्था के वाष्प में परिवर्तित होने की क्रिया को वाष्पीकरण ' कहते हैं ।
  •  वाष्पीकरण द्रव की सतह से प्रारंभ होता है । 
  • वाष्पीकरण में द्रव के अणु , जिनकी ऊर्जा सामान्य से अधिक होती है , वे द्रव की सतह को छोड़कर चले जाते हैं जिससे द्रव का ताप गिर जाता है ।
  • वाष्पीकरण के कारण ही कूलर ठंडक प्रदान करता है एवं सुराही का पानी ठण्डा हो जाता है । 
  •  वाष्पीकरण के कारण ही हमारे शरीर से पसीने सूखने पर हमें ठण्डा महसूस होता है । 
  •  प्रशीतक ( Refrigerator ) भी वाष्पीकरण के कारण ठंडक उत्पन्न करती है क्योंकि प्रशीतक में तांबे की एक वाष्पक कुण्डली में द्रव फ्रीऑन भरा रहता है जो वाष्पीकृत होकर ठण्डक उत्पन्न करती है । 

 क्वथनांक Boiling Point ) :

  •  किसी द्रव का क्वथनांक वह ताप है जिस पर उस द्रव का संतृप्त वाष्प दाब बाहरी - वायु दाब के बराबर हो जाता है ।
  •  उदाहरणार्थ - सामान्य वायुमंडलीय दाब पर जल का क्वथनांक 100 ° C होता है ।
  • बाह्य दाब अधिक होने से क्वथनांक बढ़ जाता है , जैसे - पहाड़ों पर प्रेशर कुकर में वायुदाब कम हो जाने से क्वथनांक कम हो जाता है ।

आर्द्रता ( Humidity ) :

  •  वायुमण्डल में उपस्थित नमी को आर्द्रता कहते हैं ।
  • वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा प्रत्येक स्थान पर समान नहीं होती ।
  •  प्रायः समुद्रतटीय स्थान में जलवाष्प की मात्रा यानी आर्द्रता अधिक होती है । 

 परम आर्द्रता ( Absolute Humidity ) : 

  • वायुमण्डल के एकांक आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को परम आर्द्रता  कहते हैं

 आपेक्षिक आर्द्रता ( Relative Humidity ) : 

  • किसी ताप वायुमण्डल के एकांक आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा व उसी ताप पर एकांक आयतन में उपस्थित संतृप्त जलवाष्प की मात्रा के अनुपात को वायुमण्डल की आपेक्षित आर्द्रता कहते हैं ।
  •  इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है ।
  •  आपेक्षित आर्द्रता की माप हाइग्रोमीटर ( Hygrometer ) से करते हैं । 
  • ताप के बढ़ने पर आपेक्षिक आद्रता बढ़ जाती है । 
  •  जल का असामान्य प्रसार : प्रायः सभी द्रव गर्म किए जाने पर आयतन में बढ़ते हैं , परंतु जल 0 ° C से 4 ° C तक गर्म करने आयतन में घटता है तथा 4 ° C के बाद बढ़ना आरंभ करता इसे जल का असामान्य प्रसार कहते हैं । चूंकि जल 4 ° C के बाद गर्म करने पर बढ़ना शुरू करता है , इसका अर्थ यह है कि जल का घनत्व 4 ° C पर सबसे अधिक होता है । 


चालन ( Conduction ) 


  • चालन के द्वारा ऊष्मा पदार्थों के कणों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक अपने स्थान का परित्याग किये बिना पहुँचती है । 
  • जब किसी धातु की छड़ के एक सिरे को गर्म किया जाता है तो शीघ्र ही दूसरा सिरा भी गर्म हो जाता है । 
  • ऊष्मा का यह संचरण पदार्थ के अणुओं के द्वारा होता है , जब छड़ के सिरे को गर्म किया जाता है तो इस सिरे पर स्थित अणुओं में कम्पन बढ़ जाता है ।
  •  कम्पन करने वाले ये अणु अपने से आगे वाले अणुओं से लगातार टकराते हैं तथा अपनी बढ़ी हुई ऊर्जा उन्हें स्थानान्तरित करते जाते हैं । 
  • इस प्रकार ऊष्मा का संचार एक सिरे से दूसरे सिरे की ओर होता रहता है ।

  •  ठोस में ऊष्मा का संचरण इसी विधि से होता है । 
  • पदार्थ में चालन के द्वारा अणुओं का संचरण ' ऊष्मा चालकता ' कहलाता है । 
  • ऊष्मा चालकता पदार्थ की प्रवृत्ति पर निर्भर करती है तथा जिन पदार्थों में ऊष्मा का चालन जितना अधिक होता है , उनकी ऊष्मा चालकता भी उतनी ही अधिक होती है । 

चालन के उदाहरण ( Examples of Conduction ) :-

  • एस्किमो लोग बर्फ की दोहरी दीवारों के मकान में रहते हैं क्योंकि इनके मध्य हवा की परत जमा हो जाती है , जो ऊष्मा की कुचालक होती है जिसके कारण अंदर की उष्मा बाहर नहीं जा पाती है ।
  •  फलस्वरूप कमरे का ताप बाहर की अपेक्षा अधिक बना रहता है । 
  •  शीत ऋतु में समान ताप पर लोहे की कुर्सियाँ , लकड़ी की कुर्सियों की अपेक्षा छूने में अधिक ठंडी लगती हैं क्योंकि लोहा ऊष्मा का सुचालक है , जबकि लकड़ी ऊष्मा की कुचालक है । फलतः जब हम लोहे की कुर्सी को छूते हैं तो हमारे हाथ से ऊष्मा तापान्तर के कारण लोहे की कुर्सी में शीघ्रता से प्रवाहित होने लगती है , जबकि लकड़ी की कुर्सी में ऐसा नहीं होता । 
  •  धातु के प्याले की अपेक्षा चीनी मिट्टी के प्याले में चाय पीना अधिक आसान होता है क्योंकि धातु ऊष्मा का सुचालक होता है , जबकि चीनी मिट्टी ऊष्मा की कुचालक होती है । 

चालक ( Conductor ) : 

  • जिन पदार्थों से होकर ऊष्मा का चालन सरलता से हो जाता है , उन्हें चालक कहते हैं । 
  • सभी धातु , अम्लीय जल , मानव शरीर आदि चालक हैं । 

 कुचालक ( Bad Conductor ) :

  •  जिन पदार्थों से ऊष्मा का चालन सरलता से नहीं होता या बहुत कम होता है , उन्हें कुचालक कहते हैं ।
  •  लकड़ी , कांच , सिलिका , वायु , गैसें , रबड़ आदि ऊष्मा के कुचालक पदार्थ हैं ।

 ऊष्मारोधी ( Thermal Insulator ) :

  •  जिन पदार्थों से ऊष्मा का चालन बिल्कुल नहीं होता , उन्हें ऊष्मारोधी पदार्थ कहते हैं । 
  • जैसे - एबोनाइट , एस्बेस्टस आदि ।

संवहन ( Convection ) :

  •  संवहन विधि में ऊष्मा का चालन पदार्थ के कणों के स्थानान्तरण के द्वारा होता है । 
  • जिसमें पदार्थ के कणों के स्थानान्तरण से धारायें बहती हैं , उन्हें संवहन धारायें कहते हैं।
  •  गैसों व द्रवों में ऊष्मा का संचरण संवहन द्वारा ही होता है । 
  • ठोसों के कण चूंकि अपना स्थान नहीं छोड़ते , अतः उन्हें इस विधि से गर्म नहीं किया जा सकता । 
  •  वायु तथा द्रवों में संवहन धारायें ऊपर की ओर चलती हैं । 
  • जब बर्तन में किसी द्रव को गर्म किया जाता है तो तली का द्रव गर्म होने के कारण हल्का होकर ऊपर उठता है और इस प्रकार संवहन धारायें बनती हैं । 
  • यदि हम द्रव को बर्तन की तली से गर्म न करके द्रव के ऊपरी स्वतंत्र तल को गर्म करें तो संवहन धारायें नहीं बनेंगी क्योंकि इस अवस्था में द्रव हल्का होकर ऊपर ही तैरता रहेगा । 
  • पृथ्वी का वायुमंडल संवहन विधि से ही गर्म होता है
  • रेफ्रिजरेटर में फ्रीजर पेटिका को ऊपर रखा जाता है क्योंकि नीचे की गरम वायु हल्की होने के कारण ऊपर उठती है तथा फ्रीजर पेटिका से टकराकर ठण्डी हो जाती है । ऊपर की ठंडी हवा भारी होने के कारण नीचे आती है तथा रेफ्रिजरेटर में रखी वस्तुओं को ठंडा कर देती है । 
  •  बिजली के बल्बों में निर्वात् के स्थान पर निष्क्रिय गैस , जैसे - आर्गन भरी जाती है क्योंकि बल्ब में निष्क्रिय गैस भरने की ऊष्मा संवहन धाराओं द्वारा चारों ओर फैल जाती है ये तन्तु जिससे तन्तु का ताप उसके गलनांक तक नहीं बढ़ पाता है । 

 न्यूटन का शीतलन नियम ( Newton's Law of Cooling ) :

  •  न्यूटन के शीतलन नियम के अनुसार किसी वस्तु के ठण्डे होने की दर वस्तु तथा उसके चारों ओर के माध्यम के तापान्तर के अनुक्रमानुपाती होती है । अत : वस्तु जैसे - जैसे ठण्डी होती  जायेगी 
  • उसके ठण्डे होने की दर कम होती जायेगी । 
  • उदाहरणार्थ - गर्म पानी को 80 ° C से 70 ° C तक ठण्डा होने में लिया गया अपेक्षा बात कम होता है ।

 विकिरण ( Radintion ) : 

  • समय 40 ° C से 30 ° C तक ठण्डा होने में लिये गये समय की ऊष्मा अपने स्रोत से किसी धरातल तक मध्यवर्ती माध्यम को बिना प्रभावित किए गमन कर करता है । 
  • तो ऊष्मा संचरण की इस विधि को विकिरण कहा जाता है । 
  • इस विधि में माध्यम की आवश्यकता नहीं होती ।
  •  सूर्य की ऊष्मा पृथ्वी तक एवं एक अंगीठी की ऊष्मा मानव - शरीर तक विकिरण विधि द्वारा ही पहुंचती है ।

 विकिरण के उदाहरण ( Examples of Radiation ) 

  • बादलों वाली रात स्वच्छ आकाश वाली रात की अपेक्षा गर्म होती है , क्योंकि बादलों वाली रात में पृथ्वी द्वारा छोड़ी गयी विकिरण की ऊष्मा आकाश की ओर जाने के बजाय पृथ्वी की ओर लौट जाती है , जिससे पृथ्वी गरम बनी रहती है । 
  • रेत ऊष्मा की सुचालक होने के कारण दिन में सूर्य की ऊष्मा को अवशोषित करके गर्म हो जाती है , वहीं रात में वह अपनी उष्मा को विकिरण द्वारा खोकर ठण्डी हो जाती है । 
  •  चाय की केतली की बाहरी सतह चमकदार इसलिए बनाई जाती है क्योंकि चमकदार सतह न तो बाहर से ऊष्मा का अवशोषण करती है और न भीतर की ऊष्मा बाहर जाने देती है । 

उत्सर्जन ( Emission ) : 

  • सभी वस्तुएँ सभी ताप पर विकिरण
  •  द्वारा ऊर्जा का उत्सर्जन करती हैं ।
  •  इस ऊर्जा को ' विकिरण ऊर्जा ' या ऊष्मीय विकिरण कहते हैं । 
  • यह ऊर्जा विद्युत चुम्बकीय तरंगों के रूप में प्रकाश की चाल से चलती हैं ।
  •  वस्तुओं का ताप बढ़ाने पर उनसे निकलने वाली विकिरण ऊर्जा बढ़ती जाती है तथा यह उत्सर्जन वस्तु के तल की प्रकृति , क्षेत्रफल , ताप आदि पर निर्भर 

अवशोषण ( Absorption ) :

  •  जब ऊष्मीय विकिरण किसी पृष्ठ पर गिरता है , तो उसका कुछ भाग तो परावर्तित हो जाता है , कुछ भाग पृष्ठ से संचरित होकर निकल जाता है ।
  •  इस अवशोषित विकिरण द्वारा पृष्ठ का ताप बढ़ जाता है । 
  • पिण्ड द्वारा इस प्रकार की विकिरण के अवशोषित होने की क्रिया को अवशोषण तथा इस प्रकार के पिण्ड को अवशोषक पिण्ड कहते हैं । 

 कृष्ण पिण्ड ( Black Body ) : 

  • जो वस्तु अपने पृष्ठ पर आपतित सम्पूर्ण विकिरण को पूर्णत : अवशोषित कर लेती है उसे कृष्ण - पिण्ड कहते हैं । 
  • काली वस्तु ऊष्मा का अच्छा अवशोषक होती है , इसलिए सर्दियों में काले एवं गहरे रंग के कपड़े पहने जाते हैं । 

ग्रीन हाउस प्रभाव ( Green House Effect ) : 

  • कार्बन डाईऑक्साइड , मीथेन , क्लोरोफ्लोरो कार्बन , जलवाष्प , नाइट्रस ऑक्साइड आदि ऊष्मारोधी गैसें पृथ्वी के चारों ओर आच्छादित होकर ऊष्मारोधी घेरा बनाती हैं , जिससे पृथ्वी पर सौर विकिरण आ  जाते हैं , लेकिन ये गैस इसके द्वारा उत्पन्न ऊष्मा को वापसअन्तरिक्ष में नहीं जाने देती , जिससे वायुमण्डल के ताप में निरन्तर वृद्धि हो रही है ।
  •  इसे ग्रीन हाउस प्रभाव कहते हैं । 
  •  यदि ग्रीन हाउस प्रभाव में 3.5 ° C की वृद्धि हो जाये तो ध्रुवों की बर्फ पिघलने लगेगी जिसके फलस्वरूप समुद्र के जल स्तर में वृद्धि होगी एवं हमारे कई तटीय नगर जल समाधि ले लेंगे । 

थर्मस फ्लास्क ( Thermos Flask ) : 

  • थर्मस फ्लास्क एक ऐसी विशेष प्रकार की बोतल है जिसकी दीवारें शीशे की दो परतों से बनी होती हैं तथा दोनों दीवारों के बीच की हवा निकाल कर वहाँ निर्वात् उत्पन्न कर दिया जाता है जिससे वस्तुएँ अधिक देर तक ठंडी व गर्म रह सकती हैं । 
  • इस बोतल का आविष्कार डेवर ने किया था , इसलिए इसे डेवर फ्लास्क के नाम से भी थर्मस फ्लास्क जाना जाता है । 

 ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ( First Law of Thermodynamics ) :

  •  ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊर्जा संरक्षण के नियम के समान है 
  • ऊर्जा न तो उत्पन्न की जा सकती है और न ही नष्ट की जा सकती है ।
  •  ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण ऊर्जा स्थिर है । अर्थात् यदि किसी निकाय को Q ऊष्मा दी जाये तो ऊष्मागतिकी के प्रथम नियमानुसार , 
  • Q = ∆U + W 
  • जहाँ ∆U आंतरिक ऊर्जा में वृद्धि है तथा W निकाय द्वारा किया गया बाह्य कार्य है । 
  • ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम ऊष्मा तथा ऊर्जा के अन्य रूपों के बीच संबंध बताता है । 

 ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम ( Second Law of Thermodynamics ) :

  •  ऊष्मागतिकी का प्रथम नियम यह बताता है कि किसी ऊष्मागतिकी निकाय की कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है , लेकिन यह नियम यह नहीं बताता है कि कोई प्रक्रम संभव है या नहीं ।
  •  उदाहरणार्थ - यदि हम एक ठण्डी व दूसरी गर्म वस्तु लें तो ऊष्मा गर्म वस्तु से ठण्डी वस्तु में प्रवाहित होगी लेकिन यदि हम कहें कि ऊष्मा ठण्डी वस्तु से गर्म वस्तु में प्रवाहित हो रही है , जो कि असंभव है तो इससे ऊष्मागतिकी के प्रथम नियम का उल्लंघन नहीं होता है अर्थात् प्रथम नियम यह नहीं वताता कि ऊष्मा गर्म वस्तु से ठण्डी वस्तु में प्रवाहित होती है या ठण्डी वस्तु से गर्म वस्तु में प्रवाहित होती है । अत : प्रथम नियम ऊष्मा प्रवाहित होने की दिशा नहीं बताता । 
  • ऊष्मागतिकी का द्वितीय नियम ऊष्मा के प्रवाहित होने की दिशा को व्यक्त करता है 

ऊष्मागतिकी का दूसरा नियम दो कथनों के रूप में व्यक्त किया जाता है जो निम्न है 

( 1) केल्विन के अनुसार " ऊष्मा का पूर्णतया कार्य में परिवर्तन असंभव है ।

 ( 2) क्लासियत के अनुसार " ऊष्मा कम ताप की वस्तु से अधिक ताप की वस्तु की ओर प्रवाहित नहीं हो सकती ।

Comments

Popular posts from this blog

Gove confirms mandatory housebuilding targets for councils will be abolished in face of Tory rebellion – UK politics live

Kotak Mahindra Bank Recruitment 2022 Released for Graduate Candidates And Apply Online