hindi kahani नजरअंदाज | story book

नजरअंदाज

कभी भी कोई किसी के मन की बात को पूरा समझ नही सकता कि उसके मन मे क्या चल रहा है?

ये एक बहुत छोटी सी hindi kahani जो किसी व्यक्ति को अपने फायदे के लिए कैसे जल बिछाते है। एक छोटा सा गाँव था उस गाँव मे ही एक छोटा सा बाजार था वह पर बहुत दूर दूर से लोग अपनी जरूरत का सामान लेने आते थे।

low light trees in the valley
(Photo credit: Lisa from Pexels) 

उस बाजार में रासन की तो कई दुकानें थी मगर वह पे दो दुकाने जो सबसे अच्छा चलती वह का सामना सबसे अच्छा होता अधिकतर लोगों की भीड़ के बावजूद इन दुकानों पे लोग अपना नंबर आने पर समान लेते।
एक लालमन सेठ और दूसरा धनराज की दुकान।

धनराज की दुकान लालमन के दुकान से छोटी दुकान थी इस लिए उसकी इनकम भी आधी होती थी। धनराज को इस बात की चीड़ हमेशा रहता था। एक दिन लालमन सेठ की अचानक मृत्यु हो गई लालमन सेठ की एक बेटी और दो बेटे थे।

बेटी बड़ी थी और उसका शादी भी हो चुका था। बेटों की शादी बाकी था। एक दिन धनराज सेठ जी के घर पहुँचा बोला बेटा क्या करने का इरादा है छोटा भाई तो पढ़ रहा है तुम भी कही नोकरी करलो आगे तो कुछ करना है ही तुम लोगों का भी तो अपना खर्च है। उसका इंतेजाम करो नही जरूरत पे कोई काम नही आता।

एक दुकान है तो इसको में ख़रीद लूंगा आखिर तुम लोग भी तो अपने घर के ही बच्चे हो। बड़ा बेटा उसकी बातों में आगया बोला आप ठीक कह रहे है चाचा मे भाई से पूछ कर बताता हूँ।

इनकी माँ तो कई साल पहले ही गुजर चुकी थी अब ये दो भाई बचे थे। धनराज ये जनता था कि छोटा बेटा बहुत चालाक है वह चाल समझ जायगा। उससे क्या पूछते हो वो तो छोटा है। बोलो तुम्हारे दुकान के कितने रुपये दे दु बेटा बोलो बीस हजार रुपए देदुगा । इतना कोई नही देगा।

बड़ा बेटा बोला में बताता हूं। शाम हुआ छोटा बेटा घर आया। बड़े बेटे ने बताया कि धनराज चाचा आये थे वो अपना दुकान ख़रीदने को कह रहे थे बीस हजार रुपए देने को बोल रहे थे मेने कुछ नही कहा बोला बाद में बताउगा, वो कल फिर आएंगे।

छोटा बोला भईया पहले आप को पता भी है हमारे दुकान में चलिश से पचास हजार के समान पहले ही होंगे आप घबराइए मत कल मैं बात करूंगा आने दो धनराज चाचा को। दूसरे दिन दोपहर में धनराज चाचा सेठ जी के घर पहुचे और छोटे बेट को देख कर इनका दिमाग खराब होगया तब उधर से बड़ा बेटा आया ।

बोले क्या हुआ बेटे में कुछ रुपये पेसगी लाया हूं लेलो। तब छोटा बेटा भी वह पहुंचा उसने इनकी बात सुन ली वो बोला चाचा हम लोगों को दुकान नही बेचनी है। अरे बेटा क्या हुआ एक दो हजार बड़ा दूँगा। दुकान हम लोग खोलेगें।

धनराज बोला चलो पचीस हजार लेलो दुकान की चाबी दो। तब छोटे ने कहा में सुबह दुकान गया और सब हिसाब लगाया सिर्फ दुकान में ही साठ से सत्तर हजार का सामान रक्खा है। हम और भाई दोनों मिलाकर दुकान खोलेगें। धनराज बड़ बड़ाता हुआ चला गया।

दूसरे दिन इन्होंने दुकान की पूजा अर्चना करने के बाद दुकान खोला लोग का तांता लग गया अब दुकान में पहले से भी ज्यादा भीड़ लगाने लगी।

हद से ज्यादा तारीफ करे तो उस व्यक्ति से दुरी बना ले क्योकि तारीफों के पुल के निचे लालच किंग नदी बहती है ।

writed by - श्लोक कुमार

story book - panchtantra moral story in hindi jadui chakki

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