कोशिका किसे कहते है? | कोशिका की संरचना | सिद्धांत | खोज | संरचना | प्रकार | भाग | koshika | cell in hindi

कोशिका (Cell) - जीवन की इकाई

कोशिकीय जीवधारी स्वतंत्र अस्तित्व यापन व जीवन के सभी आवश्यक कार्य करने में सक्षम होते हैं। कोशिका के बिना किसी का भी स्वतंत्र जीवन अस्तित्व में नहीं हो सकता। इस कारण जीव के लिए कोशिका ही मूलभूत से संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई होती है। जिस प्रकार मकान छोटी-छोटी ईटों का बना होता हैं, उसी प्रकार प्रत्येक जीवधारी का शरीर भी एक या अनेक छोटी-छोटी रचनाओं का बना होता हैं, जिन्हें कोशिका (cell) कहते हैं।
सभी जीव, कोशिका या कोशिका समूह से बने होते हैं। कोशिकाएं आकार व आकृति तथा क्रियाएं/कार्य की दृष्टि से भिन्न होती हैं। झिल्लीयुक्त केंद्रक व अन्य अंगकों की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर कोशिका या जीव को प्रोकैरियोटिक या यूकैरियोटिक नाम से जानते हैं। एक प्रारूपी यूकैरियोटिक कोशिका, केंद्रक व कोशिकाद्रव्य से बना होता है। पादप कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली के बाहर कोशिका भित्ति पाई जाती है। जीवद्रव्यकला चयनित पारगम्य होती है और बहुत सारे अणुओं के परिवहन में भाग लेती है। अंत:झिल्लिकातंत्र के अंतर्गत अंतर्द्रव्यीजालिका, गॉल्जीकाय, व रसधानी होती है। सभी कोशिकीय अंगक विभिन्न एवं विशिष्ट प्रकार के कार्य करते हैं। पादप कोशिका में हरितलवक प्रकाश संश्लेषण के लिए आवश्यक प्रकाशीय उर्जा को संचित रखने का कार्य करते हैं। तारककाय व तारककेंद्र पक्ष्माभ व कशाभिका का आधारीयकाय बनाता है जो गति में सहायक है। जंतु कोशिकाओं में तारककेंद्र कोशिका विभाजन के दौरान तर्क उपकरण बनाते हैं। केंद्रक में केंद्रिक व क्रोमोटीन का तंत्र मिलता है। यह अंगों के कार्य को ही नियंत्रित नहीं करता, बल्कि आनुवंशिकी में प्रमुख भूमिका अदा करता है। इस प्रकार हम देखते है कि सपूर्ण कोशिकांग मिलकर शरीर की संरचना तो बनाते ही है साथ ही साथ सभी क्रिया भी सम्पादित करते हैं जो जीवन के मूलभूत लक्षण हैं। अतः कोशिका जीवन की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई होती है।
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कोशिका सिद्धांत (Cell Theory)

1. कोशिका सिद्धांत
पूर्व कल्पना के अनुसार- 'कोशिका जीवों की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक ईकाई है।' कोशिका सिद्धान्त जर्मन वनस्पतिज्ञ मैथियास श्लाइडेन ने सन् 1838 में पौधों के लिए तथा जर्मन प्राणी-विज्ञानी थियोडोर श्वान ने सन् 1839 मे जन्तुओं के लिए स्थापित किया था। श्वान के शब्दों में, प्रत्येक कोशिका एक जीव है तथा समस्त जन्तु तथा पेड़-पौधों इन जीवों का समूह है, जो एक निश्चित क्रम से बंधे होते हैं तथा ये जीव पूर्ववर्ती अर्थात् पहले से स्थित जीवों से बनते है।
सन् 1858 मे विरकोव ने बताया कि कोशिकाओं की उत्पत्ति पूर्ववर्ती कोशिकाओं से होती है- "Omnis Cellula e Cellula” रेमाक, नगेली पुरकिंजे (Purkinje) तथा वॉन मोहल (Von Mohl) जीव वैज्ञानिकों ने कोशिका सिद्धांत की अनेक कमियों को दूर किया तथा कोशिका- सिद्धांत की स्थिति को निम्नलिखित प्रकार से बताया-
  • समस्त जीव का शरीर कोशिकाओं का समूह है।
  • कोशिका जैविक क्रियाओं (Metabolic Activities) की इकाई को प्रदर्शित करती है।
  • नई कोशिका पूर्ववर्ती कोशिकाओं से ही बन सकती है।
  • कोशिकाएं आनुवांशिक ईकाई (Hereditary Units) भी है तथा इनमें आनुवांशिकता के गुण उपस्थित होते है।
  • किसी भी जीव मे होने वाली सभी क्रियाएं उसकी घटक कोशिकाओं में होने वाली विभिन्न जैव-क्रियाओं के कारण होती है।

2. प्रोटोप्लाज्म सिद्धांत
मैक्स शुल्ज (1861) द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त, जिसके अनुसार प्रत्येक जीव का सजीव भाग 'प्रोटोप्लाज्म' होता है। कोशिका, मात्र एक संग्रहक क्षेत्र है, जो कोशिका झिल्ली द्वारा प्रोटोप्लाज्म को चारों ओर से घेरे रखता है। केन्द्रक भी इसमें ही निहित होता है।

3. जीव सिद्धान्त
  1. सैक्स (1874) द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्तानुसार, प्रत्येक जीव एक इकाई की तरह कार्य करता है, जिसमें प्रोटोप्लाज्म की निरंतर संहति, अपूर्ण रूप से कोशिकाओं में विभक्त रहती है।
  2. आधुनिक शोधों के अनुसार, कोशिका एक 'उच्चस्तरीय व्यवस्थित आण्विक कारखाना' है।
वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में कोशिका सिद्धांत निम्नवत हैः
  • सभी जीव कोशिका व कोशिका उत्पाद से बने होते हैं।
  • सभी कोशिकाएं पूर्व स्थित कोशिकाओं से निर्मित होती हैं।

कोशिका की खोज

कोशिका की खोज रॉबर्ट हुक (Robert Hooke) ने 1665 में बोतल के कॉर्क (Cork) के एक बारीक परिच्छेद का स्वनिर्मित सूक्ष्मदर्शी से अध्ययन करते हुए की। उसने कॉर्क की मृत कोशिकाओं से निर्मित प्रकोष्ठों को देखा और उनको सेल्यूली (Cellulae) कहा बाद में इन्हीं को कोशिका (Cell) नाम दिया।
जीवित कोशिका को सर्वप्रथम देखेने का श्रेय हॉलेण्ड निवासी एन्टॉन वान ल्यूवेनहॉक को है जिसने 1674 में सजीव कोशिकाओं जैसे बैक्टीरिया, प्रोटोजोआ तथा शुक्राणुओं को सूक्ष्मदर्शी से देखा तथा इनको एनीमलक्यूल (Animalcule) कहा।

कोशिका के प्रकार (Types of Cell)

कोशिकाएं माप, आकार व कार्य की दृष्टि से काफी भिन्न होती हैं। उदाहरणार्थ- सबसे छोटी कोशिका माइकोप्लाज्मा 0.3 μm (माइक्रोमीटर) लंबाई की, जबकि जीवाणु (बैक्टीरिया) में 3 से 5 μm (माइक्रोमीटर) की होती हैं। पृथक की गई सबसे बड़ी कोशिका शुतरमुर्ग के अंडे के समान है। बहुकोशिकीय जीवधारियों में मनुष्य की लाल रक्त कोशिका का व्यास लगभग 7.0 μm (माइक्रोमीटर) होता है। तंत्रिका कोशिकाएं सबसे लंबी कोशिकाओं में होती हैं। ये बिंबाकार बहुभुजी, स्तंभी, घनाभ, धागे की तरह या असमाकृति प्रकार की हो सकती हैं। कोशिकाओं का रूप उनके कार्य के अनुसार भिन्न हो सकता है।

विकास एवं केन्द्रक की संरचन के आधार पर कोशिकाएं दो प्रकार की होती हैं-
  1. प्रोकैरियोटिक कोशिकाएं (Prokaryotic Cells)
  2. यूकैरियोटिक कोशिकाएं (Eukaryotic Cell)

प्रोकैरियोटिक कोशिकाएं (Prokaryotic Cells)

  • ( Pro = प्रारम्भिक Primitive, Karyon = नाभिक Nucleus) नीलहरित शैवाल, जीवाणु एवं माइकोप्लाज्मा की कोशिकाओं में झिल्लीयुक्त सुसंगठित केन्द्रक तथा झिल्ली युक्त कोशिकांगों का अभाव होता है।
  • जीवाणु, नीलहरित शैवाल, माइकोप्लाज्मा और प्ल्यूरो निमोनिया सम जीव मिलते हैं। सामान्यतया ये यूकैरियोटिक कोशिकाओं से बहुत छोटी होती हैं और काफी तेजी से विभाजित होती हैं।
  • प्रोकैरियोटिक कोशिका का मूलभूत संगठन आकार व कार्य में विभिन्नता के बावजूद एक सा होता है। सभी प्रोकैरियोटिक में कोशिका भित्ति होती हैं जो कोशिका झिल्ली से घिरी होती है केवल माइकोप्लाज्मा को छोड़कर।
  • कोशिका में साइटोप्लाज्म एक तरल मैट्रिक्स के रूप में भरा रहता है। इसमें कोई स्पष्ट विभेदित केंद्रक नहीं पाया जाता है। आनुवंशिक पदार्थ मुख्य रूप से नग्न व केंद्रक झिल्ली द्वारा परिबद्ध नहीं होता है।
  • जिनोमिक डीएनए के अतिरिक्त (एकल गुणसूत्र / गोलाकार डीएनए) जीवाणु में सूक्ष्म डीएनए वृत्त जिनोमिक डीएनए के बाहर पाए जाते हैं। इन डीएनए वृत्तों को प्लाज्मिड कहते हैं। ये प्लाज्मिड डीएनए जीवाणुओं में विशिष्ट समलक्षणों को बताते हैं। उनमें से एक प्रतिजीवी के प्रतिरोधी होते हैं।

यूकैरियोटिक कोशिकाएं (Eukaryotic Cell)

  • (Eu= Well, Karyon = Nucleus सुगठित केन्द्रक) इस प्रकार की कोशिकाएं, जिनमें सुसंगठित केन्द्रक एवं द्विस्तरीय कोशिकांग जैसे हरितलवक, माइटोकॉन्ड्रिया, गॉज्लीकाय, अंत:र्दव्यी जालिका आदि पाये जाते हैं उन्हें यूकैरियोटिक या ससीमकेन्द्री कोशिकाएं कहते हैं।
  • सभी आद्यजीव, पादप, प्राणी व कवक में यूकैरियोटिक कोशिकाएं होती हैं। यूकैरियोटिक कोशिकाओं में झिल्लीदार अंगकों की उपस्थिति के कारण कोशिकाद्रव्य विस्तृत कक्षयुक्त प्रतीत होता है।
  • यूकैरियोटिक कोशिकाओं में झिल्लीमय केंद्रक आवरण युक्त व्यवस्थित केंद्रक मिलता है। इसके अतिरिक्त यूकैरियोटिक कोशिकाओं में विभिन्न प्रकार के जटिल गतिकीय एवं कोशिकीय कंकाल जैसी संरचना मिलती है।
  • इनमें आनुवंशिक पदार्थ गुणसूत्रों के रूप में व्यवस्थित रहते हैं।
  • सभी यूकैरियोटिक कोशिकाएं एक जैसी नहीं होती हैं। पादप व जंतु कोशिकाएं भिन्न होती हैं।
  • पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ति, लवक एवं एक बड़ी केंद्रीय रसधानी मिलती है, जबकि प्राणी कोशिकाओं में ये अनुपस्थित होती हैं दूसरी तरफ प्राणी कोशिकाओं में तारकाय मिलता है जो लगभग सभी पादप कोशिकाओं में अनुपस्थित होता है।

यूकैरियोटिक व प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में अंतर

यूकैरियोटिक व प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में अंतर

यूकैरियोटिक कोशिका

(eu = true, वास्तविक, Karyon = केंद्रक)

प्रोकैरियोटिक कोशिका

(pro = आरंभिक/आदि Karyon = केन्द्रक)

1. केन्द्रक सुस्पष्ट, उसके ऊपर सुनिर्मित केन्द्रक झिल्ली होती है।

1. केन्द्रक स्पष्ट नहीं होता, यह एक केन्द्रक क्षेत्र 'केन्द्रकाभ' (Nucleoid) के रूप में होता है। इसमें केन्द्रक झिल्ली नहीं होती।

2. दोहरी झिल्ली वाले कोशिकांगक जैसे माइटोकॉन्ड्रिया, एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम, गाल्जी बॉडी मौजूद होते हैं।

2. एक झिल्ली वाले कोशिका पिंड जैसे-मीसोसोम मौजूद होते हैं। एंडोप्लाज्मिक रेटिकुलम जालक, माइटोकॉन्ड्रिया, लवक, लायोसोम जैसे सूक्ष्मकाय और गाल्जी काय नहीं होते हैं।

3. राइबोसोम- 80 S

3. राइबोसोम- 70 S

4. कोशिका में दो स्पष्ट क्षेत्र, अर्थात् कोशिकाद्रव्य और केन्द्रक होते हैं।

4. ऐसे कोई क्षेत्र नहीं होते।

5. स्पीशीज के अनुसार प्रति केंद्रक में गुणसूत्रों की संख्या दो तथा उससे बहुत अधिक हो सकती है।

5. प्रत्येक कोशिका में केवल एक गुणसूत्र होता है।

6. हर एक गुणसूत्र रैखिक होते हैं और इनके दोनों सिरे मुक्त होते हैं।

6. गुणसूत्र वृत्तीय होता है और एक बिंदु पर कोशिका झिल्ली से जुड़ा रहता है।

7. प्रत्येक गुणसूत्र में एक रैखिक दोहरी रज्जुकी (स्ट्रांडेड) DNA हिस्टोनों से युक्त होता है।

7. गुणसूत्र में एकल दोहरा रज्जुकी (स्ट्रांडेड) वृत्ताकार DNA अणु होता है पर इसके हिस्टोन नहीं होता।

8. प्रत्येक गुणसूत्र में एक सेंटोमियर होता है। जो गुणसूत्र को दो भुजाओं में बांटता है। फिर भी यदि सेन्ट्रोमियर अंत्यक होता है तो गुणसूत्र में केवल एक भुजा होगी।

8. गुणसूत्र में सेंट्रोमियर नहीं होता।


स्वेडबर्ग इकाई (Svedberg unit)

जब एक कोशिका को अल्ट्रासेंट्रीफ्यूज में घुमाकर इसके अवयवों को तोड़ा या विखंडित किया जाता है तो यूकैरियोटिक व प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं के अवसादों के राइबोसोम अलग-अलग गति पर नीचे बैठ जाते हैं। अवसाद गुणांक (coeffient of sedimentation) को स्वेडबर्ग इकाई के रूप में निरूपित किया जाता है व द्वारा दर्शाया जाता है।


पादप कोशिका तथा जंतु कोशिका में अन्तर

पादप कोशिका तथा जंतु कोशिका में अन्तर

पादप कोशिका

जंतु कोशिका

1. कोशिका झिल्ली के चारों ओर सेलुलोज की बनी कोशिका भित्ति होती है।

1. कोई कोशिका भित्ति नहीं होती। बाहरी संरचना कोशिका झिल्ली या प्लाज्मा झिल्ली है।

2. रसधानियाँ आम तौर पर बड़े आकार की होती है।

2. रसधानियाँ आमतौर पर नहीं होती यदि होती भी हैं तो सामान्यतया छोटे आकार की होती हैं।

3. प्लास्टिड मौजूद होते हैं।

3. प्लास्टिड नहीं होते।

4. गाल्जीकाय जालिकाय (डिक्टिओसोम-dictyo-somes) नामक इकाइयों के रूप में होती हैं।

4. गाल्जीकाय सुविकसित और दो सिस्टरनीयुक्त होती है।

5. तारककेंद्र (सेंट्रिओल) नहीं होते।

5. तारककेंद्र (सेंट्रिओल) मौजूद होते हैं।

6. कोशिका विभाजन के समय मध्य पट का निर्माण होता है।

6. कोशिका विभाजन के समय मध्य पट का निर्माण नहीं होता है।

7. क्लोरोप्लास्ट पाया जाता हैजिसकी सहायता से पौधे प्रकाश संश्लेषण कर अपना भोजन (कार्बोहाइड्रेट) बनाते हैं।

7. क्लोरोप्लास्ट का अभाव होता है।

8. लाइसोसोम अनुपस्थित होता है।

8. लाइसोसोम उपस्थित होता है।

9. सेन्ट्रोसोम अनुपस्थित होता है।

9. सेन्ट्रोसोम उपस्थित होता है तथा कोशिका विभाजन में सहायता करता है।

10. पूर्ण विकसित रिक्तिका पायी जाती है।

10. रिक्तिका या तो अनुपस्थित होती है या उपस्थित होने पर बहुत छोटी होती है।

11. इसमें संचित भोजन स्टार्च होता है।

11. इसमें संचित भोजन ग्लाइकोजनन एवं वसा के रूप में होता है।

12. प्लाज्मोड़ेस्मेटा उपस्थित होता है।

12. प्लाज्मोड़ेस्मेटा अनुपस्थित होता है।

पादप कोशिका

जंतु कोशिका'

कोशिका की संरचना एवं कार्य

कोशिका झिल्ली (Cell membrane or Plasma membrane)

सभी कोशिकाओं के चारों ओर एक अत्यंत पतली, पारदर्शक एवं लचीली झिल्ली पायी जाती है, जिसे कोशिका झिल्ली: या प्लाज्मा झिल्ली कहते है। जो मुख्यतः वसा एवं प्रोटीन से बनी होती है, जिसे सी. क्रेमर एवं नेगेली (1855) ने कोशिका कला एवं प्लोव ने जीवद्रव्य कला कहा।
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जीवद्रव्य कला की संरचना के बारे में विभिन्न मत प्रचलित हैं जिनमें सर्वप्रथम डेनीयली एवं डॉवसन (1938) ने इसकी संरचना सेंडविच समान बतायी थी जिसमें दो सघन प्रोटीन परतों के बीच वसा का स्तर पाया जाता है। इसके पश्चात् रॉबर्ट सन् (1958) ने जीवद्रव्यकला की संरचना के बारे में एकक या इकाई कला प्रतिरूप (Unit Membrane Model) दिया। जिसके अनुसार यह वसा एवं प्रोटीन से बनी 70-80A मोटी इकाई कला या एकक झिल्ली होती है।

तरल मोजेक प्रतिरूप (Fluid Mosaic model) कोशिका झिल्ली या जीवद्रव्य कला की क्रियाविधि को आधार बनाकर सिंगर एवं निकॉलसन (1972) ने तरल मोजेक प्रतिरूप (Fluid Mosaic model) प्रस्तुत किया। जिसमें उन्होने बताया कि जीवद्रव्य कला 75°A मोटी लिपिड एवं प्रोटीन से बनी झिल्ली होती है। झिल्ली के भीतरी भाग में लिपिड के दो स्तर होते हैं। प्रत्येक स्तर के बाहर की तरफ जलस्नेही (हाइड्रोफिलिक) भाग एवं बीच में जलविरागी (हाइड्रोफोबिक) भाग होता है। इसकी मोटाई 35°A होती है। कला में प्रोटीन दो प्रकार से लगे रहते हैं। एक बाह्य या परिधीय प्रोटीन (Extrinsic Proteins) जो दोनों सतहों पर एक अणु मोटी तह बनाते हैं तथा दूसरे कुछ आंतरिक या समाकल प्रोटीन (Intrinsic Proteins) जो वसीय परत के बीच में धंसे होते हैं एवं छिद्र युक्त दीवार बनाते हैं। इन्ही प्रोटीनों व वसा अणुओं की सहायता से कोशिका झिल्ली पदार्थों के आवागमन को नियन्त्रित करती हैं।

कार्य :
  • कोशिका को निश्चित आकृति एवं आकार प्रदान करती है।
  • यह झिल्ली एक अर्द्ध पारगम्य झिल्ली होती है अतः इसका मुख्य कार्य कोशिका और उसके बाहर के माध्यम के बीच आण्विक गतिविधि को नियन्त्रित करना है।
  • कोशिकांगां की सुरक्षा करती है।
  • कोशिका द्वारा अनावश्यक पदार्थों को कोशिका झिल्ली के माध्यम के बाहर निकाले जाने की क्रिया को बहिर्कोशिकालयन (एक्सोसाइटोसिस) कहा जाता है।

कोशिका भित्ति (Cell Wall)

पादप कोशिकाओं का सुनिश्चित आकार दृढ़ बाह्य आवरण के कारण होता है। इस आवरण को कोशिका भित्ति कहते हैं। इसका संगठन एवं प्रकृति इसके कार्य के अनुरूप अलग-अलग होती है। कवको, शैवालों एवं विकसित हरे पौधों की भित्ति 'सैल्यूलोज की बनी होती हैं, जबकि जीवाणुओं एवं कुछ अन्य कवकों की भित्ति कार्बोहाइड्रेट (-NAM - NAG - Polymer of मोनोसैकेराइड) की।
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कार्य:
  • कोशिका को निश्चित आकृति एवं आकार प्रदान करना।
  • कोशिका को यांत्रिक शक्ति प्रदान करना।
  • जीवद्रव्य एवं कोशिकाओं की प्रतिकूल स्थिति में सुरक्षा करना।
  • अन्तरकोशिकीय पदार्थों का संवहन प्लाज्मोडेस्मैटा द्वारा होता है।
  • कोशिकाओं के मध्य जीवद्रव्यीतन्तु की सहायता से परासरणीय दाब का सन्तुलन बनाये रखती है।

केन्द्रक (Nucleus)

कोशिका द्रव्य में एक गोल एवं चपटी या अण्डाकार संरचना पायी जाती हैं, जिसे केन्द्रक कहते हैं। यह कोशिका में होने वाली समस्त जैविक क्रियाओं का नियन्त्रण करता हैं, अतः इसे "कोशिका का नियन्त्रण कक्ष" भी कहते हैं। केन्द्रक की खोज 1831 में रोबर्ट ब्राउन ने की थी। केन्द्रक यूकैरियोटिक कोशिका का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंगक है। इसमें स्थित DNA पदार्थ विभिन्न प्रकार के माध्यम से कोशिका की समस्त उपापचयी क्रियाओं का नियंत्रण करता है।
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केन्द्रक की संरचना में साधारणतया चार भाग होते हैं-
  • (i) केन्द्रकीय झिल्ली (Nuclear Membrane) केन्द्रक के चारों ओर पायी जाती है जिसे कैरियोथीका कहते हैं। यह झिल्ली छिद्रयुक्त होती है। जो अंतः प्रद्रव्य जालिका से सम्बन्ध रहती है।
  • (ii) केन्द्रक द्रव्य (Nucleoplasm) झिल्ली के अन्दर एक पारदर्शक, कणिकायुक्त द्रव भरा रहता है। जिसे केन्द्रक द्रव्य या कैरियोलिम्फ कहते हैं। इसमें न्यूक्लिक अम्ल, प्रोटीन, एन्जाइम, फास्फोरस एवं खनिज लवण पाये जाते हैं जो Cell division में भाग लेते हैं।
  • (iii) केन्द्रिक (Nucleolus) केन्द्रक में एक बड़ा गोलाकार कण पाया जाता है, जिसे केन्द्रिका कहते हैं। इसकी खोज फोन्टाना (1781) ने की तथा नाम बोमन (1840) ने दिया। यह कोशिका विभाजन की पूर्वावस्था (Prophase) में लुप्त हो जाती है एवं अंत्यावस्था (Telophase) में पुनः प्रकट हो जाती है।
  • क्रोमैटिन जाल (Chromatin Network) केन्द्रक के केन्द्रकीय द्रव्य में पतली-पतली धागे के समान रचनाये दिखाई देती हैं, जिन्हें क्रोमैटिन जाल कहते हैं।

कार्य
  • इसको कोशिका का नियंत्रण केन्द्र (Controlling Centre) कहा जाता है। कोशिका की समस्त उपापचयी क्रियाओं का नियंत्रण केन्द्रक द्वारा किया जाता है। हैमरलिंग (1934) ने एसीटाबुलेरिया (Acetabularia) नामक एककोशिका शैवाल पर प्रयोग करके केन्द्रक के महत्त्व को स्पष्ट किया।
  • इसमें पाये जाने वाले गुणसूत्र आनुवांशिक लक्षणों के वाहक होते हैं।
  • केन्द्रिक के द्वारा राइबोसोमों का निर्माण होता है।
  • कोशिका विभाजन की क्रिया केन्द्रक के द्वारा ही नियन्त्रित की जाती है।
  • DNA पुनरावृत्ति (Replication) एवं अनुलेखन क्रियायें केन्द्रक में ही होती है।

कोशिका द्रव्य (Cytoplasma) या (Protoplasma)

हक्सले (1868) ने जीवद्रव्य को जीवन का भौतिक आधार (Physical Basis of life) बताया है। इस कथन से स्पष्ट हो गया कि जीवद्रव्य एक भौतिक धरातल या माध्यम की तरह कार्य करता है। इसमें जीवन के गुण मौजूद होते हैं एवं इसकी जटिलता में जीवत्य का गुण होने के कारण इसे जीवित द्रव्य या जीवद्रव्य कहते हैं। कोशिका के समस्त जीवित भाग को प्रोटोप्लाज्म कहा। कोशिका द्रव्य को सर्वप्रथम "कोर्टी" ने देखा बाद में “दुजार्डिन" ने इसका नाम 'सारकोड' रखा अंततः पुरकिन्जे ने इसे जीवद्रव्य की संज्ञा दी। जीवद्रव्य एक कोलाइडी विलयन है, जिसमें प्रोटीन (7.9%), जल (75 से 85%), लिपिड (1 से 1.590%) एवं अन्य दीर्घ अणु पाये जाते हैं जिसे हाइलोप्लाज्म/मैट्रिक्स कहते हैं। कोशिका द्रव्य में बिखरी हुयी विभिन्न जीवित व्यवस्थित रचनाओं को अलग-अलग रूप से कोशिकांग (Cell organelles) तथा सम्मिलित रूप से ट्रोफोप्लाज्म कहते हैं।

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कोशिकांग में साधारणतया निम्न संरचनायें पायी जाती हैं-

माइट्रोकॉन्ड्रिया (MITOCHONDRIA)

माइटोकॉन्ड्रिया एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कोशिकांग हैं। यह कणिका या सूत्र या श्लाका की तरह होते हैं तथा सभी यूकैरियोटिक कोशिकाओं में पाये जाते हैं इसे सर्वप्रथम कोलीकर ने 1880 में कीटो की रेखित पेशीयों में कण के रूप में देखा बाद में फ्लेमिंग ने इसे Fila नाम दिया लेकिन इसका अविष्कारक Altman (1886) को कहा जाता है। 
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ये गोलाकार, छड़ीनुमा अथवा धागेनुमा संरचनायें होती हैं। माइटोकॉन्ड्रिया एक दोहरी झिल्ली से परिबद्ध कोशिकांग है। बाह्यकला सपाट जबकि अंतः कला में कई अंगुली के समान उभार पाये जाते हैं जो किरीटी, शिखी या क्रिस्टी (Cristae] Crista) कहलाते हैं। अंतः कला एवं बाह्यकला के बीच 6-8nm की दूरी होती हैं। क्रिस्टी के कारण माइटोकॉन्ड्रिया की अंत:कला के बीच के स्थान को परिकला अवकाश या परिसूत्रकणिकीय अवकाश (Perimitochondrial Space) कहते हैं। जिसमें विभिन्न प्रकार के श्वसन एंजाइम पाये जाते हैं। जबकि अन्दर की ओर जैल समान, प्रोटीन युक्त व समांगी पदार्थ भरा रहता है जिसे मैट्रिक्स या आधात्री कहते हैं। क्रिस्टी की सतह पर 85°A व्यास के कण 100°A की दूरी पर स्थित होते हैं जिनका आकार टेनिस के रैकेटनुमा होता है जिनको प्रारम्भिक कण या ऑक्सीसोम (Oxysome) या F1 कण कहते हैं। ऑक्सीसोम आधार, वृत एवं सिर तीन भागों से मिलकर बनते है। ये फास्फोलिपिड एवं प्रोटीन से बने होते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया में अपने समान नये माइटोकॉन्ड्रिया बनाने अर्थात् स्वत: जनन की क्षमता होती है। यह क्षमता केवल कोशिकाद्रव्य के अन्दर रहकर ही है, स्वतंत्र रूप से संभव नहीं हैं। अत: इनको अर्धस्वायत्तशासी (Semiautonomous) कोशिकांग कहा जाता है। इनके रासायनिक संगठन में प्रोटीन 65-70 प्रतिशत, फॉस्फोलिपिड 25 प्रतिशत आरएनए, 0.5 प्रतिशत कुछ मात्रा में डीनएन पाया जाता है।

माइटोकॉन्ड्रिया के कार्य

माइटोकॉन्ड्रिया को कोशिका का 'पॉवर हाऊस' या 'ऊर्जा घर' कहा जाता है। इसमें ऑक्सीश्वसन के दौरान निकलने वाली ऊर्जा एडिनोसीन ट्राईफॉस्फेट (ATP) के रूप में संचित रहती है। जब कोशिका को विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती हैं तो यह एडिनोसीन ट्राई फॉस्फेट (ATP) एडिनोसीन डाइफॉस्फेट फॉस्फेट अणु एवं ऊर्जा में टूट जाती है।
क्रेब्स चक्र- ग्लाइकोलाइसिस के द्वारा ग्लूकोज अणु दो पाइरूविक अणुओं में टूट जाता हैं जिनका ऑक्सीकरण एक चक्रिय पथ के रूप में मैट्रिक्स में उपस्थित विभिन्न श्वसन एंजाइमों के द्वारा होता है।
ऑक्सीफॉस्फोरिलेशन- यह क्रिया ऑक्सीसोम कणों में होती हैं जो माइकट्रोकॉन्ड्रिया की भीतरी झिल्ली पर स्थित होते हैं। इस क्रिया में NADPH2NADH2 एवं FADHका ऑक्सीकरण होकर ATP का निर्माण होता है। माइटोकॉन्ड्रिया प्रकाशीय श्वसन (Photorespiration) की क्रिया में भाग लेने वाला एक प्रमुख कोशिकांग है।

लवक (Plastid)

केवल पादप कोशिकाओं में पाये जाते हैं। ये रंगहीन अथवा रंगीन हो सकते हैं। इस तथ्य के आधार पर, तीन प्रकार के प्लास्टिड हो सकते हैं :
  • (i) श्वेतलवक (ल्यूकोप्लास्ट) (Leucoplast)- सफेद अथवा रंगहीन
  • (ii) वर्णलवक (क्रोमोप्लास्ट) (Chromoplast)- नीले, लाल, पीले इत्यादि
  • (iii) हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) (Chloroplast)- हरे

हरितलवक (Chloroplast)

यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। यह सभी पौधों में पाया जाता हैं। हरे पौधे इसी के सहायता से प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन (कार्बोहाइड्रेट) बनाते हैं। हरितलवक में ही पर्णहरिम (Chlorophyl) संश्लेषण के लिये उत्तरदायी होता है। पर्णहरिम की उपस्थिति के कारण ही पत्तियाँ का रंग हरा दिखाई देते हैं। हरितलवक में पर्णहरिम के अलावा कैरोटिन एवं जैन्थोफिल नामक सहायक वर्णक भी पाये जाते हैं। जिससे पत्तियों में पीला रंग दिखाई देने लगता है। चूँकि यह प्रकाश संश्लेषण द्वारा भोज्य पदार्थ बनाता है। अतः इसे "कोशिका रसोई घर" कहते है।
  • नोट- टमाटर का लाल रंग "लाइपोकेन" वर्णक के कारण व गाजर का हल्का लाल रंग "कैरोटिन" वर्णक के कारण होता है।
  1. सभी हरे पादप कोशिकाओं के कोशिका द्रव्य में पाए जाते हैं।
  2. इनकी संख्या 1 से 1008 तक कुछ भी हो सकती है।
  3. सामान्यतः डिस्क जैसे या गोलाकार (जैसे कि सामान्य पौधों की कोशिकाओं में), कुछ पौधों में जैसे स्पाइरोगाइरा में, रिबन जैसे, अथवा अन्य शैवाल, क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas) में प्यालेनुमा,
  4. संरचना एकल हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) की संरचना की सामान्य रूपरेखा चित्र में दर्शाई गई है।
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कार्य
  • क्लोरोप्लास्ट ही वह स्थल है जहाँ प्रकाश-संश्लेषण (Photosynthesis) (सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में जल व कार्बन डाइऑक्साइड के जरिये शर्करा का बनना) की क्रिया सम्पन्न होती है।
माइटोकॉड्रिया और क्लोरोप्लास्ट में समानताएँ
दोनों में ही अपना-अपना DNA (आनुवंशिक पदार्थ) और साथ ही अपना-अपना RNA (प्रोटीन संश्लेषण के लिये) होते हैं। इस प्रकार वे केंद्रक की सहायता के बिना ही अपने ही किस्म के कोशिकांगक अधिक संख्या में बना सकते हैं।
चूँकि क्लोरोप्लास्टों व माइटोकॉण्ड्रिया में अपना DNA (आनुवंशिक पदार्थ) व स्वयं के राइबोसोम होते हैं उन्हें अर्ध स्वतन्त्र अथवा अर्धस्वायत कहते हैं क्योंकि कोशिका द्रव्य के बाहर लंबे समय तक इनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है। चूंकि उनके अधिकतर प्रोटीन न्यूक्लीय क्छ। की सहायता से बनते हैं।

गॉल्जीकाय (Golgi body of Golgi apparatus)

रक्त कोशिकाओं को छोड़कर सभी यूकैरियोटिक कोशिकाओं में गुच्छे के रूप में गॉल्जीकाय पाये जाते हैं। इसकी खोज कैमिलोगॉल्जी नामक वैज्ञानिक ने की थी। गॉल्जीकाय का निर्माण मुख्यतः चपटी, थैलेनुमा, रचनाओं से होता है जो एक के ऊपर एक चट्टे के रूप में व्यवस्थित होती है। इनको कुण्डिकायें (Cisternae) कहते है। एक गॉल्जीकाय में इनकी संख्या 3 से 12 तक होती हैं। इनके अतिरिक्त पुटिकायें (Vesicles) तथा नलिकाएं (Tubules) भी होती हैं।
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गॉल्जीकॉय के कार्य
  • ये उपास्थियों के आधार पदार्थ का स्त्रावण करते हैं तथा कार्बोहाइड्रेट की दीर्घ अणुओं का संश्लेषण करते है। इस प्रकार गाल्जीकाय को कोशिका के अणुओं का 'यातायात प्रबंधक' भी कहा जाता है।
  • गॉल्जीकॉय का मुख्य कार्य स्रवण है।
  • लाइसोसोम का निर्माण करना।
  • गॉल्जीकाय के वेसीकल में वसा व प्रोटीन का संचय होता है।
  • कोशिका विभाजन के समय ये कोशिका पट्टी बनाती है।
  • शुक्र जनन के समय शुक्राणु के एक्रोसॉम का निर्माण गॉल्जीकाय से होता है।

अंतःप्रद्रव्यी जालिका (Endoplasmic reticulum ER)

ER की खोज 1945 में पोर्टर नामक वैज्ञानिक ने की थी। ER विषाणु, जीवाणु, नीले-हरे शेवाल तथा RBCs में नहीं पाया जाता हैं। इनके अलावा सभी कोशिकाओं में पायी जाती है।

कार्य
  • कोशिका को यांत्रिक सहारा देता है व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक व संचयन करना।
  • कोशिका के अन्दर पदार्थों का आदान-प्रदान में भाग लेती है। साथ ही आनुवांशिक पदार्थों को कोशिका के अन्य अंग तक पहुँचाती है।
  • चिकनी जालिका कोशिका को विषैले पदार्थों के आविषालु (Toxic) प्रभाव से बचाती है।
  • कोशिका भित्ति एवं प्लाज्मोडेस्मैटा के निर्माण में सहायता करती है।

लाइसोसोम

ये इकाई झिल्ली की बनी अण्डाकार या गोलाकार रचनाये है, जिनमें पाचक एन्जाइम भरे होते है।
लाइसोसोम्स की खोज डी डुवे (De Duve) नामक वैज्ञानिक ने की थी। लाइसोसोम में 24 प्रकार के एन्जाइम पाये जाते है। इसका मुख्य कार्य “बाहरी पदार्थों का भक्षण एवं पाचन करना हैं। ये कोशिका में प्रवेश करने वाले हानिकारक सूक्ष्म जावी एव कणों का पाचन करते हैं। पाचन के समय य स्वयं फटकर पदार्थों का पाचन कर देते हैं। इसलिए इसे "आत्महत्या थैली (Suicide Vesicle / Bag) कहते है।

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राइबोसोम

राइबोसोम झिल्ली विहीन, गोलाकार, प्रोटीन तथा आरएनए से निर्मित सूक्ष्म कोशिकीय होते हैं, जो यूकैरियोटिक कोशिका में खुरदरी अंतःद्रव्यी जालिका पर, कोशिकाद्रव्य, माइटोकॉन्डिया. केन्द्रक एवं हरितलवक में पाये जाते हैं। इनका व्यास 15A - 20A होता है। रोबिन्सन एवं ब्राउन (1953) ने सेम की जडों की कोशिकाओं में राइबोसोम्स की खोज की तथा पैलाडे (1953) ने जन्तु कोशिकाओं में राइबोसोम को देखा। इनके आकार का निर्धारण अवसादन गुणाक (Sedimetation) के आधार पर किया गया है। जिसके अनुसार ये दो प्रकार के होते है। 70s राइबोसोम, 80S राइबोसोम।
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कार्य
राइबोसोम का सबसे प्रमुख कार्य "प्रोटीन का संश्लेषण हैं, इसलिए इसे प्रोटीन की फैक्ट्री भी कहते है। अतः इसे माइक्रोसोम या राइबोन्यूक्लियो प्रोटीन के नाम से जाना जाता है।

सूक्ष्मकायें (Microbodies)

ये थैलीनुमा रचना है, जिनमें कुछ विशेष प्रकार के एन्जाइम से युक्त मैट्रिक्स भरा होता है।
उदाहरण:- परऑक्सीसोम, स्फेरोसोम, लोमासोम, ट्रान्सोसोम, ग्लाइऑक्सीसोम आदि।

तारककाय (Centrosome)

टी. बावेरी (1888) ने सर्वप्रथम 'सेन्ट्रोसोम' शब्द का प्रयोग किया। जन्तु कोशिकाओं, शैवालों व कवकों की कोशिकाओं में केन्द्रक के समीप एक या दो बिन्दुओं युक्त सघन अंगक पाया जाता है। उसे ताराककाय कहते है। सामान्यतः पादप कोशिकाओं में तारककाय अनुपस्थित होता है। इसमें दो सघन बिन्दु होते हैं, उनको तारककेन्द्र (Centriole) कहते है।

ताराककाय के कार्य (Function of Centrosome)
  • कोशिका विभाजन के समय तारककेन्द्र द्वारा तर्कुतन्तुओं का निर्माण होता है।
  • तारककेन्द्र तथा पक्षमाभिका एवं कशभिका की आधार कणिका का निर्माण किया जाता है। इन सभी की संरचना समान होती है।
  • शुक्रजनन में शुक्राणु की पूंछ का उद्गम तारककाय द्वारा होता है।

सूक्ष्म तंतु/सूक्ष्म नलिकाये

ये दोनो ही कोशिकांगो को निश्चित स्थान पर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। इसलिए इसे कोशिकीय कंकाल (Cytoskelton) भी कहते है। ये Filagella / cilia का निर्माण व कोशाद्रव्य चक्रण (Cyclosis) में मुख्य कार्य करते है।

रिक्तिकाएँ (Vacuole)

यह अर्द्ध पारगम्य झिल्लियों से घिरी होती हैं। इसका मुख्य कार्य भोज्य पदार्थों का संग्रहण है। रिक्तिका के कारण ही कोशिकाओं की स्फीति बनी रहती है। कोशिका रस में अधिकांश अपशिष्ट पदार्थों का संचय होता है जिसे अजैव पदार्थ या एरगास्टिक पदार्थ कहा जाता है।

गुणसूत्र (Chromosome)

संयुक्त सूक्ष्मदर्शी से देखने पर प्रत्येक गुणसूत्र में निम्नलिखित भाग दिखाई देते हैं:
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  • (i) पेलिकल (Pellicle) : यह गुणसूत्र के चारों ओर क्रोमेटिन पदार्थ की बनी पतली-सी झिल्ली के रूप में होती है।
  • (ii) मैट्रिक्स (Matrix): यह गुणसूत्र का आधारीय पदार्थ है, जिसमें दो धागेनुमा क्रोमोनिमेटा होते हैं।
  • (iii) क्रोमोनिमेटा (Chromonemata): गुणसूत्र के मैट्रिक्स में धागेनुमा दो क्रोमोनिमेटा या क्रोमिटिड्स होते हैं। दोनों क्रोमोनिमेटा कुण्डलित होकर लगभग 800A/ मोटे एक धागे जैसे दिखते हैं। क्रोमोनिमेटा पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर गहरे रंग के क्रोमोमीयर्स स्थित होते हैं। किसी एक गुणसूत्र में क्रोमोनिमेटा पर क्रोमोमीयर्स की संख्या व स्थिति सदैव निश्चित होती हैं। किसी एक गुणसूत्र में क्रोमोनिमेटा पर क्रोमोमीयर्स की संख्या व स्थिति सदैव निश्चित होती है।
  • गुणसूत्र बिन्दु या सेन्ट्रोमीयर (Centromere): प्राथमिक संकीर्णन में सेन्ट्रोमीयर स्थित होता है। इसके द्वारा यह माइटोसिस के तुर्क के साथ जुड़ा रहता है। सेन्ट्रोमीयर की स्थिति के आधार पर गुणसूत्र मध्यकेन्द्री (Metacentric), उपमध्यकेन्द्री (submetacentric), अग्रबिन्दुकी या अन्त:केन्द्री (acrocentric or telocentric) होती हैं।
  • द्वितीयक संकीर्णन (Secondary Constriction): प्राथमिक संकीर्णन के अतिरिक्त कुछ गुणसूत्रों पर द्वितीयक संकीर्णन भी मिलता है।
  • सैटेलाइट (Satellite) : गुणसूत्र के सिरे पर स्थित यह गोलाकार संरचना होती है। जिस गुणसूत्र में सैटेलाइट पाया जाता है, उसे सैट गुणसूत्र कहते हैं।
  • टीलोमीयर (Telomere): गुणसूत्र के छोरों अथवा सिरों को टीलोमीयर कहते हैं।


RNA - आर. एन. ए. (राइबोन्यूक्लिक अम्ल) मुख्य रूप से कोशिका द्रव्य व केन्द्रिक में पाया जाता है। कोशिकाद्रव्य में यह टी. आर. एन. ए. (tRNA) व एम. आर. एन. ए. (mRNA) के रूप में बिखरी अवस्था में पाया जाता है। माइटोकॉन्ड्रिया व हरितलवकों में अल्प मात्रा में आर. एन. ए. पाया जाता है। कई पादप वाइरसों जैसे TMV में आर. एन. ए. आनुवंशिक पदार्थ की तरह कार्य करता है।

आर. एन. ए. के प्रकार
  • आनुवांशिक आर. एन. ए. (Genetic RNA)
  • आनुवांशिक या नॉन जेनेटिक आर. एन. ए. (Non Genetic RNA)
  • संदेशवाहक आर. एन. ए. (Messenger RNA or m-RNA)
  • राइबोसोमल आर. एन. ए. (Ribosomal RNA or r-RNA)
  • स्थानान्तरण या ट्रांसफर आर. एन. ए. (Transfer RNA or t-RNA)

कोशिका विभाजन (Cell Division)

उच्च श्रेणी का प्रत्येक जीव अपना जीवन एक कोशिका से प्रारम्भ करता है जिसे युग्मनज (Zygote) कहते हैं। इस द्विगुणित कोशिका का बार- बार विभाजन होता है। विभाजन की इस प्रक्रिया में यदि एक कोशिका दो समान पुत्री कोशिकाओं में विभाजित होती है तथा गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका के समान होती है उसे समसूत्री विभाजन (Mitosis) कहते हैं। यदि इस विभाजन में गुणसूत्रों की संख्या आधी हो जाये तथा दो बार कोशिका विभाजित हो तो उसे अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) कहते हैं।

कोशिका विभाजन के प्रकार

असूत्री कोशिका विभाजन (Amitosis Division)
यह कोशिका विभाजन अधिकांशतया प्रोकैरियोट्स जैसे जीवाणु, प्रोटोजोआ व निम्न श्रेणी के पादपों जैसे कुछ शैवालों एवं कवकों की कुछ कोशिकाओं में पाया जाता है। इस प्रकार में सर्वप्रथम दबाव के कारण केन्द्रकीय पदार्थ का विभाजन, फिर कोशिकाद्रव्य विभाजन एवं इसके बाद कोशिका झिल्ली का विभाजन होता हैं जिससे दो पुत्री कोशिकाएं बनती हैं। इसमें दो पुत्री कोशिकाओं में आनुवंशिक पदार्थ बराबर मात्रा में नहीं बंटता है अतः इसे असूत्री विभाजन कहते हैं।

समसूत्री विभाजन (Mitosis Division)
यह कायिक कोशिकाओं में होने वाला विभाजन है। इस विभाजन के फलस्वरूप दो समान प्रकार की पुत्री कोशिकाएं बनती हैं जिनमें गुणसूत्रों की संख्या मातृ कोशिका में पाये जाने वाले गुणसूत्रों की संख्या के समान होती है। सर्वप्रथम माइटोसिस शब्द डब्ल्यू. फ्लेमिंग (W. Fleming) ने 1882 में दिया।

समसूत्री विभाजन का अध्ययन निम्न बिन्दुओं के अन्तर्गत किया जा सकता है

(i) केन्द्रक विभाजन (Karyokinesis Division)
यह विभाजन निम्न अवस्थाओं में होता हैं। विभाजन की अन्त्यावस्था के अंत में केन्द्रिक फिर दिखाई देने लगती है तथा क्रोमेटिन तथा केन्द्रिक के चारों ओर स्पष्ट केन्द्रक झिल्ली बन जाती है इस प्रकार एक ही जनक कोशिका में दो केन्द्रक स्पष्ट दिखाई देने लगते है।
  • पूर्वावस्था (Prophase)
  • मध्यावस्था (Metaphase)
  • पश्चावस्था (Anaphase)
  • अन्त्यावस्था (Telophase)

(ii) कोशिकाद्रव्य विभाजन (Cytokinesis Division)
केन्द्रक विभाजन के पश्चात् कोशिकाद्रव्य का विभाजन आरम्भ होता है। विभाजित कोशिका के कोशिकाद्रव्य में होने वाला यह विभाजन कोशिकाद्रव्य विभाजन कहलाता है। पादप कोशिका व जन्तु कोशिका के कोशिकाद्रव्य विभाजन में अन्तर पाया जाता है। पादप कोशिका के कोशिकाद्रव्य का विभाजन एक कोशिका पट्टिा (Cell Plate) के निर्माण के द्वारा होता है जबकि जन्तु कोशिका में कोशिकाद्रव्य विभाजन कोशिका झिल्ली में खांच बनने के द्वारा होता है।

अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)

यह जनन ग्रंथि (गोनड-gonad ) में होता है और लैंगिक जनन द्वारा युग्मक (गैमीट) के निर्माण के लिए होता है। इसमें परिणामी कोशिकाएं (मादा में) अंडाणु तथा (नर में) शुक्राणु जनक कोशिका के आधी संख्या में गुणसूत्र धारण करती हैं। यह विभाजन केवल द्विगुणित कोशिओं में होता है जो अगुणित बीजाणुओं या युग्मकों के निर्माण के लिए उत्तरदायी है। इसे अर्धसूत्रण भी कहा जाता है।

समसूत्री व अर्धसत्री विभाजन में अन्तर

समसूत्री व अर्धसत्री विभाजन में अन्तर

समसूत्री विभाजन

अर्धसूत्री विभाजन

यह विभाजन कायिक कोशिकाओं में होता है।

यह प्रायः जनन कोशिकाओं में होता है।

इस विभाजन से कायिक वृद्धि होती है।

इससे युग्मकों का निर्माण होता है।

इसमें गुणसूत्रों का एक ही बार प्रतिकृतिकरण (Replication) तथा विभाजन होता है फलस्वरूप दो पुत्री कोशिकाएं बनती है।

इसमें गुणसूत्रों का प्रतिकृतिकरण तो एक बार होता है लेकिन कोशिका विभाजन दो बार होता है फलस्वरूप चार पुत्री कोशिकाएं बनती हैं।

पुत्री कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका के समान होती है।

पुत्री कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या जनक कोशिका के गुणसूत्रों की संख्या से आधी रह जाती है।

प्रोफेज अपेक्षाकृत छोटी अवधि की होती है।

प्रोफेज प्रथम लम्बी अवधि की होती है।

पूर्वावस्था साधारण होती है।

पूर्वावस्था प्रथम अत्यधिक जटिल तथा लेप्टोटिन जाइगोटीन, पेकाइटीन, डिप्लोटीन व डाइकाइनेसिस में विभाजित होती है।

कोशिका तथा गुणसूत्रों दोनों में एक बार विभाजन

गुणसूत्रों का विभाजन एक बार जबकि कोशिका विभाजन दो बार।

सूत्रयुग्मन या सिनेप्सिस नहीं होता है।

जाइगोटीन के दौरान सिनेप्सिस होता है।

इस विभाजन में जीन विनिमय नहीं होता है।

प्रोफेज प्रथम में पेकाइटिन के दौरान जीन विनियम होता है।


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