पृष्ठ तनाव ( Surface Tension ) श्यानता एवं प्रत्यास्थता ( Viscosity and Elasticity ) Physics Chapter- 4
पृष्ठ तनाव ( Surface Tension )
केशिकत्व का उदाहरण
- ब्लॉटिंग पेपर स्याही को शीघ्र सोख लेता है , क्योंकि इसमें बने छोटे - छोटे छिद्र केशनली की तरह कार्य करते हैं ।
- लालटेन या लैम्प की बत्ती में केशिकत्व के कारण ही तेल ऊपर चढ़ता है ।
- पेड़ - पौधों की शाखाओं , तनों एवं पत्तियों तक जल और आवश्यक लवण केशिकत्व की क्रिया के द्वारा ही पहुँचते हैं ।
- कृत्रिम उपग्रह के अन्दर ( भारहीनता की अवस्था ) यदि किसी केशनली को जल में खड़ा किया जाए तो नली में चढ़ने वाले जलस्तम्भ का प्रभावी भार शून्य होने के कारण जल नली के दूसरे सिरे तक पहुँच जाएगा चाहे केशनली कितनी भी लम्बी क्यों न हों ।
- वर्षा के बाद किसान अपने खेतों की जुताई कर देते हैं , ताकि मिट्टी में बनी केशनलियाँ टूट जाएँ और पानी ऊपर न आ सके व मिट्टी में नमी बनी रहे । \
- पृष्ठ तनाव के कारण ही सुई पानी पर तैरती दिखाई पड़ती है ।
- साबुन के घोल से बुलबुले का बनना क्योंकि जल में साबुन घोलने पर इसका पृष्ठ तनाव कम हो जाता है ।
- साबुन या डिटर्जेण्ट से गंदे कपड़े आसानी से साफ हो जाते हैं क्योंकि वे जल के पृष्ठ तनाव को कम कर मैल में गहराई तक चले जाते हैं ।
- जल के सतह पर मच्छरों के लार्वा का तैरना पृष्ठ तनाव के कारण ही होता है ।
- गरम सूप पृष्ठ तनाव के कारण ही स्वादिष्ट लगता है , क्योंकि गरम सूप का पृष्ठ तनाव कम होने के कारण यह जीभ के ऊपर सभी भागों में फैल जाता है ।
- पृष्ठ तनाव के कारण ही शेविंग ब्रश को पानी से बाहर निकालने पर उसके बाल आपस में चिपक जाते हैं ।
- समुद्र की लहरों को शांत करने के लिए उनपर तेल डाल दिया जाता है , यह पृष्ठ तनाव का ही उदाहरण है ।
पृष्ठ तनाव :-
- प्रत्येक द्रव का स्वतंत्र पृष्ठ सिकुड़कर न्यूनतम क्षेत्रफल ग्रहण करने की प्रवृत्ति प्रदर्शित करता है ।
- द्रवों की इस प्रवृत्ति के कारण उनका स्वतंत्र पृष्ठ तनी हुई झिल्ली की भांति व्यवहार करता है ।
- द्रव के स्वतंत्र पृष्ठ पर विद्यमान इस तनाव को पृष्ठ तनाव कहते हैं ।
- किसी द्रव का पृष्ठ तनाव वह बल है जो उस द्रव के खींची गई कल्पित रेखा की एकांक लम्बाई पर रेखा के लंबवत तथा पृष्ठ के स्पर्श रेखावत् कार्य करता है ।
- इसका मात्रक न्यूटन ) मीटर^2 है ।
- द्रव का ताप बढ़ने पर पृष्ठ तनाव कम हो जाता है
- क्रांतिक ताप पर यह शून्य हो जाता है ।
ससंजक बल ( Cohesive Force ) :-
- एक ही पदार्थ के अणुओं के बीच कार्यकारी आकर्षण बलों को ससंजक बल कहते हैं ।
- जिन द्रवों के अणुओं के बीच ससंजक बल अधिक होता है
- वे बर्तन की दीवार को गीला नहीं करते हैं , जैसे - पारा पृष्ठ - तनाव का कारण ससंजक बल होता है ।
- भिन्न - भिन्न पदार्थों के अणुओं के बीच कार्यकारी बल को आसंजक बल कहते हैं ।
- यदि किसी द्रव के अणुओं के बीच कार्यकारी ससंजक बल का मान द्रव व किसी बर्तन के अणुओं के बीच कार्यकारी आसंजक बल से कम होता है , तो वह द्रव बर्तन में डाले जाने पर उसकी दीवारों को गीला करता है । जैसे - पानी किसी बर्तन में डाले जाने पर उसकी दीवारों को गीला कर देता है
- एक जैसे अणुओं में परस्पर आकर्षण को संसजन ( Cohesion ) तथा भिन्न अणुओं में आकर्षण को आसंजन ( adhesion ) कहते हैं ।
- द्रव का वह गुण जिसके कारण द्रव केशनली में अपनी सतह ऊपर चढ़ जाता है
- नीचे उतर जाता है , केशिकत्व कहलाता है ।
- केशनली में कोई द्रव किस त सीमा तक ऊपर चढ़ेगा या केशनली की त्रिज्या पर निर्भर करता है।
- सामान्यतः काँच भिगोने वाला द्रव केशनली में ऊपर चढ़ जाता है एवं जो द्रव काँच को नहीं भिगोता है , वह केशनली में नीचे दब जाता है ।
- केशिका में जल के ऊपर चढ़ने का कारण जल के अणुओं का एक - दूसरे के प्रति आकर्षण से अधिक आकर्षण जल के अणुओं का काँच के अणुओं के प्रति आकर्षण है ।
- यदि केशिका नली को पारे में खड़ा करें तो नली के अन्दर पारे का स्तर बाहर के स्तर से कम होगा , क्योंकि पारे के अणु काँच की अपेक्षा एक दूसरे से अधिक आकर्षित होते हैं ।
- जलती हुई मोमबत्ती में पिघला हुआ मोम या लालटेन की बत्ती में तेल का सतह से ऊपर चढ़ जाना केशिकत्व का उदाहरण है ।
- केशिकत्व को h से प्रदर्शित करते हैं ।
- जहां T पृष्ठ तनाव ,
- 0 स्पर्श कोण , r केशनली की त्रिज्या , d द्रव का घनत्व , g गुरुत्वीय त्वरण है।
h=2Tcosθ/rdg
श्यानता एवं प्रत्यास्थता ( Viscosity and Elasticity )
श्यानता ( Viscosity ) : -
- श्यानता द्रवों का वह गुण है जिसके कारण वह अपनी भिन्न - भिन्न परतों में होने वाली आपेक्षिक गति का विरोध करता है ।
- जब कोई असम्पीड्य एवं अश्यान द्रव धारा रेखी प्रवाह में बहता है , तो इसके मार्ग के प्रत्येक बिन्दु पर एकांक आयतन के लिए दाब ऊर्जा , गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा का योग एक नियतांक होता है , अर्थात्
द्रवों के बहने की अविरलता का सिद्धांत ( Principle Continuity ) :-
- जब कोई असम्पीड्य ( Incompressible ) तथा अश्यान ( Non - Viscous द्रव किसी असमान परिच्छेद की नली में धारारेखी ( Streamline ) प्रवाह में बहता है तो प्रत्येक स्थान पर नली के अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल तथा द्रव के वेग का गुणनफल नियत रहता है . इसे अवितरता का सिद्धांत कहते हैं । द्रव की विभिन्न परतों के बीच आन्तरिक स्पर्श रेखीय बल कार्य करते हैं
- जो पर्तों के बीच होने वाली आपेक्षिक गति को नष्ट करने का प्रयास करते हैं । इन बलों को श्यान बल कहा जाता है ।
- द्रवों में श्यानता अणुओं के मध्य लगने वाले ससंजक बलों के कारण होती है ।
- गैसों में श्यानता एक पर्त से दूसरी पर्त में अणुओं के स्थानान्तरण के कारण होती है ।
- श्यानता केवल गैसों तथा द्रवों का गुण है ,
- ठोसों में श्यानता नहीं होती है , क्योंकि उसकी विभिन्न पर्तो में आपेक्षिक गति नहीं होती है
- गैसों में श्यानता द्रवों की तुलना में बहुत कम होती है ।
- जल की श्यानता वायु से अधिक होने के कारण ही हम जल की तुलना में वायु में अधिक तेजी से दौड़ पाते हैं ।
- श्यानता गाढ़ेपन पर भी निर्भर करता है , जो द्रव जितने अधिक गाढ़े होते हैं , वे उतने ही अधिक श्यान होते हैं ।
- शहद और ग्लिसरीन की श्यानता पानी की तुलना अधिक होती है ।
- वायु की श्यानता के कारण ही बादल के कण बहुत धीरे - धीरे नीचे आ पाते हैं तथा बादल आकाश में तैरते प्रतीत होते हैं ।
- ताप बढ़ने पर द्रव की श्यानता घट जाती है , यद्यपि गैस की श्यानता बढ़ जाती है ।
- जब कोई वस्तु किसी श्यान द्रव में गिरती है तो प्रारम्भ में उसका वेग बढ़ता जाता है , किन्तु कुछ समय के बाद वह नियत वेग से गिरने लगती है जिसे वस्तु का सीमान्त वेग कहते हैं ।
- सीमान्त वेग वस्तु की त्रिज्या के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होता है , जिसके कारण बड़ी वस्तु अधिक वेग से और छोटी वस्तु कम वेग से गिरती है ।
- पैराशूट की सहायता से नीचे उतरता व्यक्ति सीमान्त वेग के कारण ही पृथ्वी पर उतरता है ।
- जब श्यान बल गुरुत्वाकर्षण बल के बराबर हो जाता है और गिरती हुई वस्तु पर शुद्ध बल शून्य हो जाता है , तब वस्तु का त्वरण रूक जाता है और वह स्थिर वेग से गिरने लगती है । इस वेग को क्रांतिक वेग ( critical velocity ) कहते हैं ।
- क्रांतिक वेग आकार पर भी निर्भर करता है , यह छोटे आकार की वस्तु पर ज्यादा होता है ।
- प्रत्यास्थता किसी पदार्थ का वह गुण जिसके कारण वस्तु किसी विरूपक बल के द्वारा उत्पन्न आकार अथवा रूप के परिवर्तन का विरोध करती है तथा विरूपक बल हटा लिए जाने पर अपनी पूर्व अवस्था को प्राप्त करने का प्रयत्न करती है ।
विकृति ( Strain ) : -
- आरोपित विरूपक बल के कारण वस्तु में होने वाले भिन्नात्मक परिवर्तन को विकृति कहते हैं ।
- विकृति एक शुद्ध अनुपात है जिसका कोई मात्रक नहीं होता ।
प्रतिबल ( Stress ) :-
- बाह्य बल के कारण वस्तु के काट के एकांक क्षेत्रफल पर कार्य करने वाले आंतरिक प्रतिक्रिया बल को प्रतिबल कहते हैं ।
- प्रतिबल का मात्रक न्यूटन / मीटर^2 तथा इसका विमीय सूत्र [ ML^ -1T^2 ] है ।
प्रत्यास्थता की सीमा ( Limits of Elasticity ) :-
- पदार्थ की वह सीमा जिसके परे उसकी प्रत्यास्थता का गुण समाप्त हो जाता है , प्रत्यास्थता की सीमा कहते हैं ।
हुक का नियम ( Hooke's Law ) :-
- प्रत्यास्थता की सीमा के अन्दर प्रतिबल सदैव विकृति के अनुक्रमानुपाती होता है , इसे हुक का नियम कहते हैं ।
यंग प्रत्यास्थता गुणांक ( Young's Modulus ) :-
- प्रत्यास्थता की सीमा के अन्दर अनुदैर्ध्य तथा अनुदैर्ध्य विकृति के अनुपात को वस्तु के पदार्थ का यंग प्रत्यास्थता गुणांक कहते हैं ।
दाब ( Pressure ) :-
- तल के किसी बिन्दु पर दाब उस बल के बराबर होता है जो उस बिन्दु के चारों ओर लिए गए मात्रक क्षेत्रफल पर लम्बवत् कार्य करता है ।
- इस प्रकार , = बल का क्षेत्रफल या P = F / A
- दाब का मात्रक न्यूटन / मीटर है ।
- दाब एक अदिश ( Scalar ) राशि है।
- इसका विमीय सूत्र [ ML^ - 1T^ - 2 ] है ।
- द्रवों के दाब को पास्कल ( Pascal ) नामक मात्रक में भी नापते हैं
- 1 पास्कल = 1 न्यूटन / मीटर^2
- किसी बर्तन में बन्द द्रव के किसी भाग पर आरोपित दाब द्रव द्वारा सभी दिशाओं में समान परिमाण में संचरित कर दिया जाता है ।
- ब्रह्माण्ड का द्रव दाब गैस इसी सिद्धान्त पर कार्य करता है ।
द्रव का उत्क्षेप ( Upthrust of a Liquid ) :-
- जब कोई वस्तु किसी द्रव में डुबोई जाती है तो द्रव उस पर एक बल ऊपर की ओर लगाता है जिसे उस द्रव का उत्क्षेप ( उछाल ) कहते है।
- यह उत्क्षेप वस्तु द्वारा हटाए गए द्रव के भार के बराबर होता है ,
- तथा हटाए गए द्रव के गुरुत्व केन्द्र से होकर ऊर्ध्वाधर ऊपर की दिशा में कार्य करता है ।
- इस बिन्दु को द्रव के भार में कमी प्रतीत होती है ।
- द्रव के उत्क्षेप के कारण ही पानी में डूबी गई वस्तु के भार में कमी प्रतीत होती है ।
आर्कमिडीज का सिद्धान्त ( Principle of Archimedes :-
- जब कोई वस्तु किसी द्रव में पूर्ण या आंशिक रूप से डुबाई जाती है तो उसके भार में कुछ कमी प्रतीत होती है तथा भार में यह आभासी कमी उस वस्तु के द्वारा हटाये गए द्रव के भार के बराबर होती है तो इसे आर्कमिडीज का सिद्धान्त कहते हैं ।
प्लवन का सिद्धान्त ( Principle of Floatation ) :-
- इस सिद्धान्त के अनुसार प्लवन करने वाली वस्तु का भार उस वस्तु द्वारा हटाए गये भार के बराबर होता है ।
- प्लवन करती हुई वस्तु का आभासी भार शून्य होता है ।
- प्लवन करती हुई वस्तु के सन्तुलन के लिए गुरुत्व केन्द्र ( G तथा उत्प्लावन केन्द्र ( B ) एक ऊर्ध्व रेखा में स्थित होने चाहिए ।
बॉयल का नियम ( Boyle's Law ) :-
- स्थिर ताप पर किसी गैस के निश्चित द्रव्यमान का दाब उसके आयतन का व्युत्क्रमानुपाती होता है , अर्थात् Px V = नियतांक
- किसी वस्तु के इकाई आयतन में वस्तु का जितना द्रव्यमान रहता है , वह उसका घनत्व कहलाता है , जिन वस्तुओं का घनत्व कम होता है , वह हल्की तथा जिनका घनत्व अधिक होता है , वह भारी होती है ।
- किन्हीं दो वस्तुओं के घनत्वों के अनुपात को वस्तु का आपेक्षित घनत्व कहते हैं ।
- आपेक्षिक घनत्व एक शुद्ध संख्या है , इसका कोई मात्रक नहीं होता है ।
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