बचपन की यादो के कुछ सुलघते सौगात...

बचपन की यादो के कुछ सुलघते सौगात... बेफिक्र सी सुबह और गुनगुनाहट सी शामों, क्या खूब थी दोस्त अपनी बच्चपन की सौगाते...दोस्त अब तुझे न सोचू तो जिस्म टूटने सा लगता है,एक वक़्त गुजरा है तेरे नाम का नशा करते करते...ऐसे बीमार की दवा क्या है दोस्त,जो बताता ही नहीं की हुआ क्या है...किसी को न पाने से ज़िन्दगी खत्म नहीं होती,लेकिन किसी को पाकर खो देने से कुछ बाकी भी नहीं रहता दोस्त...रात का अंधेरा पूछ रहा है हमसे दोस्त,कहां गए वो रात भर बात करने वाले अपने...दिल में घाव सा कर जाती हैं उनकी निगाहें दोस्त,मुड़ मुड़ के देखने वाले जब देख कर मुड़ जाते हैं...तेरे सिवा ख़्वाब में भी कोई दिखाई ना दे,इस तरह अपने आंखों को मैने तेरा ग़ुलाम कर रखा है दोस्त...पता नहीं किस मिट्टी की बनीं हैं ये तमन्नाएं दोस्त,मरतीं हैं तड़पतीं हैं फ़िर भी रोज़ जन्म लेती हैं...दोस्त जरूरी नहीं हर ताल्लुक मोहब्बत का ही हो,कुछ रिश्ते इश़्क से ऊँचा मुकाम रखते हैं...जज्बातो में बहकर खुद को किसी के अधीन मत करना दोस्त, वैसे ही खुदा और खुद के अलावा किसी पर यकीन मत करना...थोड़ी बुराइयां भी शामिल किया करो अपनी शख्सियत में दोस्त, क्यूंकी शरीफ़ लोग अक्सर शक के दायरे में रहते हैं...ना हुस्न पे परदा मांगा ना नज़रो में हया मांगी दोस्त,हमने सौदा-ए-मौहब्बत में बस तुमसे दुुुआ और वफा मांगी...पहले रिश्तों का दूसरा नाम प्यार था आज रिश्तों का दूसरा नाम पैसा है दोस्त,पैसा है तो प्यार है और पैसा है तो रिश्ता है...तीर चुभने से भी ज्यादा दर्द होता है दोस्त,जब कोई सबसे करीबी इंसान चुभती बात कह देता है...थक जाते हैं हाथ मुहब्बत लिखते लिखते,बड़ी सस्ती हो गई दोस्त मुहब्बत बिकते बिकते...वो मुझसे पूछती है की ख्वाब किस-किस के देखते हो,बेखबर जानती ही नहीं की यादे उसकी सोने कहाँ देती हैं दोस्त...रोकने की कोशिश तो बहुत की पलकों ने दोस्त, मगर,इश्क में पागल थे आँसू ख़ुदकुशी करते चले गए...कभी-कभी यूं ही चले आया करो दिल की दहलीज पर दोस्त,अच्छा लगता है यूँ तन्हाइयों में तुम्हारा दस्तक देना...राज

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