अकेली रात बोलती बहुत है दोस्त...

अकेली रात बोलती बहुत है दोस्त, पर सुन वही सकता है जो खुद भी अकेला हो...अकेले जीना भी आ ही जाता है दोस्त,जब मालूम होता है अब साथ चलने वाला कोई नहीं...दोस्त कुछ तकलीफें हमारा इम्तेहान लेने नहीं बल्कि,हमसे जुड़े लोगों की पहचान करवाने भी आती हैं...दोस्त ये व्यक्तित्व की ही गरिमा हैं कि फूल कुछ नहीं कहते,वरना कभी कांटों को मसलकर दिखाय कोई...राहत और चाहत में बस फर्क है इतना,राहत बस तुमसे थी और चाहत सिर्फ तुम्हारी...मुझे तेरा साथ जिंदगीभर नहीं चाहिये था,बल्कि जब तक तु साथ है तब तक जिंदगी चाहिये था दोस्त...अपनी जिंदगी का खेल शतरंज से भी मज़ेदार निकला दोस्त,राज हारा भी तो अपनी हीं रानी से...देख कर इंसान पहचानने की कला थी मुझमें,तकलीफ़ तो तब हुई जब इन्सानों के पास चेहरे बहुत थे दोस्त...हजारों महफिलें है,लाखों मेले है पर,जहाँ तुम नहीं वहाँ हम अकेले हैदोस्त ...दोस्त आंखों की दहलीज पे आके सपना बोला आंसू से,घर तो आखिर घर होता है तुम रह लो या मैं रह लूं...ये इश्क़ की नगरी भी क्या नगरी है दोस्त, यहाँ दिल मिलते भी हैं और दिल खो भी जाता है...गलतियाँ हम दोनों से हुई दोस्त,तुमने मुझे पड़ाव समझा और मैंने तुम्हें आपनी मंज़िल...संबंधों की कुल पांच सीढ़ियां हैं! देखना, अच्छा लगना, चाहना और पाना...यह चार बहुत सरल सीढ़ियां हैं सबसे कठिन पांचवीं सीढ़ी है निभाना दोस्त...some स्पेशल line...उल्फत बदल गई, कभी नियत बदल गई,खुदगर्ज जब हुए तो फिर सीरत बदल गई,अपना कुसूर दूसरों के सर पर डाल कर,कुछ लोग सोचते हैं हकीकत बदल गई दोस्त...छोंड़ गए हमको वो अकेले ही राहों में,चल दिए रहने वो गैर की पनाहों में,शायद मेरी चाहत उन्हें रास नहीं आयी,तभी तो सिमट गए वो औरों की बाँहों में दोस्त...राज

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