खारी आँखें

 मुझे ठंढ बहुत लगती है। बहुत। अभी बंगलोर में तापमान तेईस डिग्री है लेकिन हम हैं कि जैकेट पहन के बैठे हुए ख़ुद को कोस रहे हैं कि मोज़े धो देने चाहिए थे एक जोड़ी। पैर में बहुत ठंढ लगती है। हाथ में भी। टेबल पर एक कैंडिल जला ली है। कभी कभी उसपर हाथ सेंक लेते हैं। लैवेंडर कैंडिल है, काँच के जार में। तो हवा से बुझने का डर नहीं है। हाथ लौ के ऊपर रखने के बाद देखती हूँ कि हथेली से लैवेंडर की ख़ुशबू आने लगी है। इस छोटी सी बात से दिल्ली की कई साल पुरानी सुबह याद आती है। हम शायद नौ बजे ही सीपी पहुँच गए थे। उस वक़्त बस कैफ़े कॉफ़ी डे खुला हुआ था। हमने अपने लिए कॉफ़ी ऑर्डर की, वहाँ और कोई था भी नहीं। मैं हड़बड में पहुँची थी तो जाड़े के दिन होने पर भी बाल सुखाए बिना चली आयी थी। दिल्ली की सर्दियों में घर से निकलने के पहले बाल हेयर ड्रायर से सुखा लेती थी क्यूँकि अक्सर स्कार्फ़ या टोपी पहनने की ज़रूरत होती थी। उस रोज़ लेकिन तुमसे मिलना था और पहले से वक़्त डिसाइड नहीं किया था तो बस जैसे ही मेसेज आया नहा धो के सीधे निकल लिए। कैफ़े में बाल खोले बैठी थी। तुमने कॉफ़ी पी और नाश्ते में जो भी खाया होगा, उसके बाद हाथ धोने गए। वापसी में तुमने बाल हल्के से सहला दिए। उस साल के बाद कई कई दिन जब तुम्हारी बहुत याद आती तो दो चार सिगरेट पीती और बालों में उँगलियाँ उलझाती। सोचती कि मेरे हाथों से तुम्हारे हाथों जैसी ख़ुशबू नहीं आती है। बालों में धुएँ की गंध भर जाती। मैं काग़ज़ पर लिखती कुछ, सोचती तुम्हें। मेरे पास उन दिनों की गिनती नहीं है। पर ऐसी कई शामें थीं।

इन दिनों काग़ज़ की बहुत ज़रूरत लगती है। काग़ज़ अजीब क़िस्म से ज़िंदा होता है। ख़तों में ख़ास तौर से। A country without post-office, आगा शाहिद अली की कविताओं की छोटी सी किताब है जो इसी नाम की कविता पर रखी गयी है। इस कविता की आख़िरी पंक्ति है। “It rains as I write this. Mad heart, be brave.”। बहुत साल पहले एक लड़की ने इसका ट्रैन्स्लेशन करने को कहा था मुझसे। सिर्फ़ आख़िर के चार शब्द। मेरे पास कोई कॉंटेक्स्ट नहीं था। अब जब है, कहानी का, कविता का, लड़की का भी…मेरे पास शब्द नहीं हैं। कि टीस शायद हर भाषा में एक सी महसूस होती है। वे सारे लोग जो हमारे हिस्से के थे लेकिन हमें कभी नहीं मिले। जो मिले भी तो किसी दोराहे पर बिछड़ गए।
मेरी नोट्बुक में तुम्हारे लिखे कुछ शब्द हैं। उन्हें पढ़ते हुए रोना आ जाता है इसलिए उन शब्दों को आँख चूमने नहीं दे सकती। मैं सिर्फ़ कहानी लिख सकती हूँ जिसमें एक कैफ़े होता है और एक दरबान, कैफ़े में आगे नोटिस लगा होता है, यहाँ उदास आँखों वाली लड़कियों का बैठना मना है। तुम जानते हो, वो कैफ़े मेरा दिल है। और वो दरबान वक़्त है। कमज़र्फ़। जो कि चूम कर मेरी आँखें कहता है हर बार, इन आँखों का एक ही मिज़ाज है। उदासी।
तुम्हें तो मीठा पसंद है न मेरी जान। तुम भला क्यूँ चूमोगे मेरी खारी आँखें।

Comments

Popular posts from this blog

Gove confirms mandatory housebuilding targets for councils will be abolished in face of Tory rebellion – UK politics live

Kotak Mahindra Bank Recruitment 2022 Released for Graduate Candidates And Apply Online