राम-भक्ति का विकास और राम-काव्य का संक्षिप्त वृत्त

 राम-भक्ति का विकास और राम-काव्य का संक्षिप्त वृत्त



                राम-भक्ति का विकास और राम-काव्य का संक्षिप्त वृत्त


भारतीय भक्ति-भावना तथा वैष्णव धर्म में राम-भक्ति की व्यापकता देखकर इस तथ्य पर सहज
ही विश्वास नहीं होता कि भक्ति-मार्ग तथा वैष्णव धर्म की उत्पत्ति और विकास के बहुत
शताब्दियों बाद
राम-भक्ति का जन्म हुआ था। वैष्णव धर्म की उत्पत्ति के बाद भक्ति-भावना विष्णु नारायण वासुदेव कृष्ण
में केंद्रीभूत होकर उत्तरोत्तर विकसित होने लगी थी। ईसवीं सन् के प्रारंभ से ही राम भी विष्णु के अवतार
के रूप में स्वीकृत होने लगे थे, परन्तु यह तथ्य है कि कारण चाहे जो भी रहा हो, शताब्दियों तक
राम-भक्ति का कहीं कोई निर्देश नहीं मिलता। गोपाल भंडारकर का कहना है कि भक्ति के क्षेत्र में राम
की प्रतिष्ठा विशेष रूप से ग्यारहवीं शताब्दी ईसवीं के लगभग प्रारंभ हुई।
           वास्तव में राम-भक्ति की पहली अभिव्यक्ति काव्य में ही हुई थी। तमिल आलबार संतों की
नालियर प्रबंध' नामक रचना में भगवान विष्णु तथा उनके अवतारों के प्रति असीम भक्ति तथा पूर्ण
आत्म-समर्पण के उद्गार मिलते हैं। वैसे तो कृष्ण को उन पटों में अधिक महत्व दिया गया है, किंतु   पहले 
आलवारों से लेकर राम का भी निरंतर उल्लेख मिलता है। कुलशेखर के पदों में प्रौढ़ राम-भक्ति
संबंधी
काव्य-रचनाओं की संख्या बढ़ने लगी जिनमें स्रोतों का स्थान प्रमुख है। वैसे श्री रामसहस्रनामस्तोत्र
'राम स्तोत्र' आदि पंद्रहवीं शताब्दी से लेकर समस्त राम-काव्य भक्ति-भाव से ओत-प्रोत होने लगा।
वस्तुत: राम-भक्ति की काव्यात्मक अभिव्यक्ति के बाद ही इसका 'श्री संप्रदाय' में शास्त्रीय
प्रतिपादन भी किया गया। शास्त्र का ही सहारा पाकर राम-भक्ति की प्रतिष्ठा और इसके क्षेत्र का विस्तार
भी दिनों-दिन बढ़ने लगा । श्री संप्रदाय के प्रवर्तक रामानुज ने रामभक्ति के विषय में तो कुछ नहीं लिखा
है; उनकी भक्ति नारायण में केंद्रीभूत थी। फिर भी उन्होंने अपने श्री भाष्य में अवतारों में राम और कृष्ण
दोनों का उल्लेख किया है। बाद में उनके संप्रदाय में पहले पहल परम-पुरुष के अवतार राम तथा मूल
प्रकृति सीता की दास्य भक्ति का प्रतिपादन किया गया है। अगस्त्य संहिता, 'कतिराघव', 'वृहद राघव'
और 'राघवीय संहिता' नामक रामभक्ति संबंधी संहिताएँ मिलती हैं। इसके अतिरिक्त श्री संप्रदाय में तीन
उपनिषदों में राम-पूजा का भी निरुपण मिलता है। 'रामपूर्वतापनीय (11वी शती) तथा 'रामोत्तर तापनीय
एवं 'रामरहस्योपनिषद्' । सच तो यह है कि जन सामान्य में रामभक्ति की लोकप्रियता का श्रेय बहुत कुछ
रामानंद को है। श्री संप्रदाय में दीक्षित होकर उन्होंने रामभक्ति को एक नया रूप देकर 'रामावत संप्रदाय'
बनाया। उन्होंने राम को ही अपना इष्ट माना और राम-नाम को अपनी साधना का मूलमंत्र बनाया। इससे
राम-भक्ति को बहुत प्रोत्साहन मिला और यह समस्त उत्तर भारत में फैल गया। शायद यही कारण है कि
रामानंद को राम-भक्ति साहित्य के मूल प्रेरक के रूप में माना जाने लगा
         इसी आधार पर बहुत-सी सांप्रदायिक रामायणें भी बनीं जिनमें 'अध्यात्म रामायण' 'आनंद रामायण',
अद्भुत रामायण' तथा 'मुशुंडी रामायण' प्रमुख हैं। अध्यात्म रामायण ही बाद में रामचरित मानस (तुलसी)
जैसे प्रबंध-काव्य का आधार ग्रंथ भी बन गयी। इस प्रकर राम-भक्ति जन साधारण में अत्यंत लोकप्रिय
होने लगी।
आदि कवि वाल्मीकि के अनेक शताब्दियों पूर्व राम-कथा को लेकर आख्यान काव्य की सृष्टि होने
लगी थी किंतु वाल्मीकि रामायण ही प्राचीनतम उपलब्ध राम भक्ति काव्य है। इसकी रचना संभवत: चौथी
शताब्दी पूर्व के अंत में हुई थी। नाटक तो काव्य के पूर्व ही लिखे जाने लगे थे। हरिवंश पुराण में लिखा
है कि बहुत पहले से ही राम के जीवन-वृत्त को लेकर लोग नाटक खेला करते थे। राम-चरित को लेकर
धार्मिक ग्रंथों के अतिरिक्त संस्कृत में जिन विशुद्ध साहित्यिक काव्यों का निर्माण हुआ इनमें कालिदास का
रघुवंश' अपेक्षया प्राचीन है। इसके बाद की रचनाओं में भट्टिकाव्य कुमारदास का जानकी-हरण',
अभिनन्दन का 'रामचरित' क्षेमेन्द्र का 'रामायण-मंजरी' साकल्यमल्ल का 'उदार राघव' आदि हैं। नाटकों
में भासकृत 'प्रतिमा' और 'अभिषेक' भवभूति के उत्तर रामचरित और 'महावीर चरित', राजशेखरकृत
'बाल-रामायण', 'महानाटक', या 'हनुमान नाटक' तथा जयदेवकृत 'प्रसन्न राघव' आदि प्रसिद्ध रचनाएँ
हैं।' कथा-साहित्य में राम-वृत्त कम है। हाँ, सोमदेव कृत 'कथासरित-सागर' में इसका उल्लेख कई
स्थलों पर है।
           संस्कृत के अलावा तमिल में 'कंबन रामायण' कनाटी भाषा में नरहरि की रचना, मराठी में एकनाथ
की रचना, उड़िया में बलरामदास की रचना सामने आई। इसी क्रम में गोस्वामी तुलसीदास की भी रचना
आई। बंगला में कृतिवास रामायण और असमिया में दुर्गावारकृत 'गीतिरामायण' तो काफी प्रसिद्ध हैं। तेलुगु
में 'रंगनाथ रामायण' बारहवीं शती में 'छिपदा' छंद में रचित तथा रंगनाथ नामक सामंत को समर्पित
'भास्कर रामायण', 'मोल्ला रामायण' है। मलयालम् भाषा में 'राम चरित' मौलिक काव्य तथा वाल्मीकि
रामायण के दो अनुवाद-कण्णश्श रामायण' तथा 'केरल-वर्मा-रामायण है। एजुत्त चन का अध्यात्म रामायण
का अनुवाद भी है। ब्राह्मण राम सहित्य की प्रसिद्ध रचना 'तोखेरामायण' है। एक काव्य 'मैरावण काव्य'
नाम से भी मिलता है।
     आधुनिक आर्यभाषाओं का राम-काव्य राम-भक्ति के पूर्ण विकास के पश्चात् ही सामने आया,
जिनपर राम-भक्ति की गहरी छाप है। इनमें उत्तरभारत में तुलसीकृत 'रामचरित मानस' तथा 'कृत्तिवासीय
रामायण' दोनों अपने-अपने भाषा-क्षेत्र में अत्यंत लोकप्रिय हैं। बंगला में फिर अनेक रचनाएँ आई, जैसे
चंद्रावतीकृत 'रामायण' (सोलहवीं शती); रामानंदकृत 'रामलीला' (सत्रहवीं शती) कविचंद्रकृत 'अंगद रैबट'
(अठारहवीं शती) रघुनन्दन गोस्वामी कृत 'रामरसायन' (अठारहवीं शती) आदि । गुजराती में भालण का
"सीता स्वयंवर' एवं राम-विवाह' प्राचीनतम काव्यग्रंथ हैं। हाल में आशासन की 'राम-लीला विषयक
पदावली प्रकाश में आई है जो चौदहवीं शती की रचना है। मराठी में सबसे प्राचीन तथा सबसे प्रचलित
रामकाव्य 'भावार्थ रामायण' है। उड़िया में सबसे प्रसिद्ध रामायण के तीन नाम मिलते हैं : 'जगमोहन
रामायण' बलरामदास रामायण और 'दण्डिरामायण' कश्मीरी में दिवाकर प्रकाश भट्ट कृत 'कश्मीरी रामायण'
तथा नेपाली भाषा में अनूदित भानुभट्ट की 'अपना रामायण' प्रसिद्ध हैं।
         विदेशों में राम-कथा का प्रसार पहले-पहल बौद्धों द्वारा हुआ। 'अनाम जातक' तथा 'दशरथ
कथानम्' का तीसरी और पाँचवीं शती में चीनी भाषा में अनुवाद हुआ था। आठवीं शती में तिब्बती भाषा
में तिब्बती रामायण' लिखी गयी। पूर्वी तुर्किस्तान में नवीं शती में 'खोतानी रामायण' लिखी गयी। ऐसे
ही हिंदेसिया तथा हिंदचीन में भी राम-काव्य मिलते हैं।
       हिंदी में तो आदिकाल में ही रामानंद द्वारा राम-भक्ति के प्रचार ने राम-काव्य लिखने की एक
अविच्छिन धारा बहायी थी। गोस्वामी तुलसी के पूर्व हिंदी में राम-साहित्य बहुत विस्तृत नहीं हैं। रामानंद
के कुछ भक्ति विषयक पदों तथा सूर के 'सूरसागर' में राम-कथा के कुछ मार्मिक स्थलों के सिवा लगभग
कुछ नहीं हैं। 'पृथ्वी राज रासो में 'देशावतार-कथा' के अंतर्गत राम-कथा विषयक लगभग एक सा छंद
मिलते हैं। ईश्वरदास की रचना में 'रामचरित मानस' का पूर्वाभास मिलता है ईश्वरदासकृत 'रामजन्म' तथा
'अंगद पैज' नामक कृतियाँ सुरक्षित हैं। तुलसी के समकालीन कवियों में केवल 'अग्रदास' तथा उनके शिष्य
'नाभादास' ने राम-काव्य की सष्टि की है। अग्रदासकृत पदावली तथा ध्यान मंजरी एवं नाभादासकृत,
'रामचरित के पद' प्राप्त होते हैं। इनके अलावा तुलसी के समकालीन काव्य ग्रंथ हैं : 'राम प्रकाश'
(सुतिलाल) 'रामधंद्रका' (केशवदास) आदि रामायण (सोढी मेहरबान) रामायण महा नाटक (प्राणचंद
चौहान) 'हनुमन्नाटक' (हृदयराम) 'लक्ष्मणायन' (रामानन्द) 'राम रासौ' (माधौदास) आदि । तुलसी के
बाद के शेष काव्य यों हैं-हुनम्मचरित्र (रामल्ल पाण्डेय), अवधविलास (लालदास) कवित्त रत्नाकार
(सेनापति) अवतार चरित (नरहरिदास) आदि ।
      गोस्वामी तुलसीदास ने चार प्रबंध काव्य लिखे। उनका काल 1532 से 1623 माना जाता है।
'रामचरित मानस' तथा तीन खंडकाव्य-रामलला नहछू 'जानकी मंगल, और 'पार्वती मंगल'। उनके
मुक्तक
काव्य-ग्रंथों में 'रामाज्ञो प्रश्न', 'दोहावली सत्तसई', तथा 'बरवै रामायण' हैं। फिर विनय पत्रिका, गीतावली,
'कृष्णगीतावली' तथा 'कवितावली' और 'बाहुक' उपलब्ध हैं। इनमें अधिकतर रचनाओं का विषय
राम-कथा से संबंधित है।
रीतिकाल में भी राम-काव्य लिखे गये। 'रामचरित रामायण (भूपति)' गोविंद रामायण (गुरु
गोविंद सिंह) 'दशरथ राय' (सुखदेव मिश्र) बाल-चरित (केशव कवि) श्री रामायण (झामदास) 'राम
रसायन' (पद्माकर) सुप्रसिद्ध स्तोत्तम (रुद्र प्रताप सिंह) 'सीताहरण' (मैथिल कवि शिवदत्त) ये सब
उल्लेखनीय हैं। इनके अलावा इस काल में कृष्ण-काव्य की गहरी छाप लिये और संस्कृत काव्य से
पद्यानुवादपरक राम काव्य भी सामने आए। बाद में रामकवि का हनुम्मनाटक' विश्वनाथ सिंह का 'आनंद
रघुनंदन', ईश्वरीप्रसाद कृत रामायण', मधुकर कृत राम लीला-बिहार तथा हरिराम कृत 'जानकी रामचरित'
प्रमुख हैं।
 हिन्दी के आधुनिक काल में 'राम कहानी' (सुधाकर द्विवेदी) रामचर्चा-(प्रेमचंद) युग-पुरुष (अक्षय
कुमार जैन) सीता बनवास (छेदी) । इस काल में रामकथा विषयक नाटकों की भरमार-सी आई।
निम्नलिखित प्रबंधात्मक कृति भी महत्त्वपूर्ण हैं : राम-रसायन (रसिक बिहारी) विश्राम सागर (रघुनाथ
दास) अवध-विलास (बाघेली कुँवरि) कोशल-किशोर (बलदेव मिश्र) 'श्री रामावतार' (सिरस) राममडैया
(वंशीधर शुक्ल) तथा श्री रामचंद्रोदय (रामनाथ ज्योतिष) प्रमुख हैं।
  सन् 1920 के बाद का खड़ी बोली हिंदी का 'राम-काव्य' अपेक्षया समृद्ध है-'राम की शक्ति-पूजा
(निराला), 'दक्षिणा' और 'पंचवटी' (मैथिली शरण गुप्त) आदि छोटी-छोटी रचनाओं के अतिरिक्त
निम्नलिखित महाकाव्य (प्रबंध काव्य) भी अपना साहित्यिक मूल्य रखते हैं: "रामचरित चिंतामणि (
रामचरित उपाध्याय-सन् 1920) साकेत (मैथिली शरण गुप्त 1929 ई०) वैदेही बनवास (अयोध्या सिंह
उपाध्याय हरिऔध, सन् 1939) 'साकेतनंद (बलदेव प्रसाद मिश्र, सन् 1946) 'कैकेयी' (केदार नाथ मिश्र
प्रभात, सन् 1950) 'उर्मिला' (बालकृष्ण शर्मा नवीन, (अप्रकाशित)] ।
      निसर्गत: कहा जा सकता है कि हिंदी में राम-काव्य का प्रारंभ मूलतः भक्ति-काव्य के रूप में होता
है, परन्तु उपर्युक्त रचनाओं में अधिकांश विशुद्ध रूप से ललित साहित्य की रचनाएँ ही हैं

                                               ★★★

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