भक्ति : तात्त्विक बोध और विश्लेषण

 भक्ति : तात्त्विक बोध और विश्लेषण




'भक्ति' के लिये शब्द कोशों में 'अनुराग', 'पूजा' और 'उपासना' आदि कई प्रार्यायवाची शब्दों का
प्रयोग किया गया है, हालाँकि इन सबके अर्थ में थोड़ी भिन्नता है। श्रीमद्भागवत्कार ने भक्ति का अर्थ
मन और बुद्धि से अपने को ईश्वर को अर्पित कर देना किया है। "मय्यर्पित मनोबुद्धिर्योमदभक्तः स मे
प्रियः।" पराशर ने 'पूजा दिष्वनुराग इति पाराशर्यः" कहकर भक्ति का तात्पर्य पूजादि में अनुराग बताया
है। शाण्डिल्य और नारद ने क्रमशः 'सा परानुरक्तिरीश्वरे' (ईश्वर के प्रति परम अनुराग रूपा) और 'सा
त्वस्मिन परम प्रेम-रूपा, अमृतस्वरूपा च' (भक्ति ईश्वर के प्रति परम प्रेम रूपा और अमृत स्वरूपा है)
कहकर भक्ति की व्याख्या की है। श्री वल्लभाचार्य ने भगवान में माहात्म्यपूर्वक सुदृढ़ और सतत स्नेह को
ही भक्ति माना है। उनके अनुसार मुक्ति का इससे सरल उपाय और कुछ नहीं है-"माहात्म्य ज्ञानपूर्वस्तु
सुदृढ़ः सर्वतोऽधिकः । स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तया मुक्तिर्न चान्यथा"। भक्ति के सम्बन्ध में कहे गये
उपर्युक्त सभी मतों पर यदि विचार करें तो ऐसा लगेगा कि हृदय और बुद्धि-अनुराग और ज्ञान की स्वीकृति
प्रायः सभी आचार्यों ने दी है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने श्रद्धा और प्रेम' शीर्षक लेख में क्रमश:
'श्रद्धा और प्रेम' कहा है। आचार्य शुक्ल ने एक समाहार प्रस्तुत करते हुए कहा है कि "श्रद्धा ओर प्रेम
के योग का ही नाम भक्ति है। "श्रद्धा और प्रेम में से किसी एक के अभाव में भक्ति नहीं हो सकती।
व्युत्पत्ति के लिहाज से 'भज्' धातु से इसकी उत्पत्ति हुई है, जिसका अर्थ होता भजना। इसीलिये
नारद के अनुसार वह 'परम प्रेमरूपा' और अमृत स्वरूप है, जिसे प्राप्त कर मनुष्य सिद्ध, अमर और तृप्त
हो जाता है। 'भक्ति सूत्र' में वह कहते हैं-"सा त्वस्मिन परम प्रेमरूपा, अमृत स्वरूपा च", तथा
'यल्लब्वा पुमान् सिद्धो भवति अमृतो भवति अमृतो भवति"। पाराशर-पुत्र व्यास ने पूजादि म अनुराग तथा
गर्ग ने कथादि में अनुरक्ति को भक्ति कहा है। 'भक्ति सूत्र' में ही कहा गया है―

                     "पूजादिष्वनुराग इति पाराशर्यः । कथादिष्विति गर्गः।"

     भगवान को प्राप्त करने के साधनों में कर्म, ज्ञान, योग तथा भक्ति मार्ग की गणना की गयी है।
सहज साध्य होने के कारण आचार्य ने भक्तिमार्ग को प्रमुखता दी है-“अन्यस्मात् सौलभ्यं भक्तौ ।"
(भक्ति-सूत्र: 58) भक्तिमार्ग का प्रमुख संप्रदाय भागवत धर्म है; जिसका उदय ईसा के लगभग 1400 वर्ष
पूर्व माना जाता है। इससे पूर्व ऋग्वेद के वरुण-सूक्त तथा अन्य ऋचाओं में भी भक्ति की कल्पना का
स्पष्ट आभास मिलता है। ब्राह्मण-काल में कर्मकांड के प्राबल्य के कारण भक्ति का प्रवाह कुठित हो गया
था। उपनिषद्-काल में निर्गुण ब्रह्मकी अनुभूति के लिये मन, आकाश, सूर्य अग्नि, यज्ञ आदि सगुण प्रतीकों
की उपासना के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। 'मैञ्युपनिषद्' 'छांदोग्योपनिषद्' 'मुण्डकोपनिषद्' 'श्वेताश्वतरोपनिषद्'
आदि में शिव, रुद्र, विष्णु, अच्युत, नारायण आदि को परमात्मा के रूप कहकर उनकी उपासना का
निर्देश है।
   उपनिषद् काल के बाद 'महाभारत' में प्रवृत्तिमय भक्ति का रूप परिलक्षित होता है। पाणिनीय सूत्रों
में 'वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन' से प्रतीत होता है कि पाणिनि के पूर्व बासुदेव भक्ति का प्रचार हो गया था ।
भक्ति-मार्य में वासुदेव-भक्ति का ही प्राधान्य था। बुद्धोत्तर काल में भक्ति का स्वरुप विस्तार पा गया।
भिन्न-भिन्न देवताओं और विभूतियों की उपासना प्रारंभ हो गयी। निर्गुण निराकार ब्रह्म की प्रतीकोपासना,
जिसे उपनिषदकारों ने प्रचलित करना चाहा था, सगुणोपासना होते हुए भी अव्यक्त थी। इसी कारण व्यक्त
मानवदेहधारी की उपासना की कल्पना अस्तित्व में आई क्योंकि निर्गुण या अव्यक्त रूप सामान्य जन के
लिये कष्टकर तथा अग्राह्य था। यही प्रत्यक्ष नामरूपात्मक उपासना भक्ति-मार्ग कहलाई। भक्ति को भागवत
धर्म का बल मिला। श्रीकृष्णावतार के पूर्व इसको ऐकान्तिक, नारायण, पांचरात्र, सात्वत् आदि नाम रूढ़ थे।
महाभारत के शान्ति पर्व में ऐकान्तिक धर्म की उत्पत्ति की कथा है। श्रीकृष्ण के पश्चात् ही इसे भागवत
धर्म कहा जाने लगा। हमें पता है कि श्रीकृष्ण का काल ईसा के लगभग 1400 वर्षों पूर्व माना जाता है।
'भागवतधर्म' और 'भक्ति' के ग्रंथों में 'श्रीमद्भगवद्गीता' 'महाभारत' का 'शान्तिपर्व', 'पांचरात्र
संहिता', 'सात्वत-संहिता', 'शाण्डिल्य सूत्र' 'भागवत् पुराण' 'हरि वंश पुराण' नारदीय भक्तिसूत्र' 'नारद्
पांचरात्र', रामानुजाचार्य आदि आचार्यों के ग्रंथ प्रमुख हैं। वास्तव में देव विषयक रति ही भक्ति का दूसरा
नाम है। साहित्य संदर्भ की दृष्टि से वल्लभ संप्रदायी ग्रंथ हरिभक्तिरसामृत सिन्धु' (श्री रूपगोस्वामी द्वारा
विरचित) 'भक्ति' को रस भी माना गया है और इस रस का शास्त्रीय विवेचन भी किया गया है।
                 जाहिर हैं 'सगुण-साकार' भगवान के प्रति विश्वास और स्नेह का संबंध ही भक्ति है।
श्रीमद्भगवदगीता में दुर्बल और दीन, निरक्षर और अज्ञ सभी के द्वारा संभव होने के कारण सगुण साकार
भगवान की उपासना को सरल कहा गया है। प्रेममूलक त्याग उतना कठिन नहीं है, जितना कठिन भगवान
संकल्प के अनुरूप इच्छा-शक्ति का निर्माण या कठोर तपस्साधन अथवा विचार-ज्ञान की कठोर पद्धति
अपनाना। कहा गया है कि सर्वोपरि सत्ता वह ईश्वर है जो प्रेममय और रक्षक है और जिसका भक्तगण
इस रूप में विश्वास और अनुभव करते हैं और वे भगवान उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं, जो उनपर विश्वास
करते हैं। ‘भज' धातु से उत्पन्न भक्ति शब्द का अर्थ ही होता है भगवान की सेवा। इस तरह भगवान
की कृपा पर स्वीकृतिपूर्वक विश्वास करते हुए आत्म-समर्पण का नाम ही भक्ति है। 'योगसूत्र' का यही
ईश्वर-प्रणिधान' है, जिसका अर्थ 'वृत्तिकार' भोज के अनुसार वह प्रेम है, जिसमें विषय-सुख की प्राप्ति
में किसी फल की कामना नहीं है। प्रेम की यह एक ऐसी गम्भीर अनुभूति है जो सम्पूर्ण कामनाओं का
अभाव करके हृदय को प्रभु-प्रेम से भर देती है। इसीलिये श्रीमद्भागवत भक्ति के नौ स्तरों का वर्णन
आया है―
                        "श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
                          अर्चनं वन्दनं दास्य सख्यामात्मनिवेदनम् ।।

ये सब कार्य उनकी सेवा के भाव से करने से मनुष्य की आत्मा भगवान के समीप पहुँच जाती है।
भक्त अपने संपूर्ण अस्तित्व को भगवान की ओर मोड़ देता है। भजन ही धर्म का सार है। भक्ति में
आराधक और आराध्य का द्वैत बना रहता है। भगवान तो सबमें अनुस्यूत हैं। स्रष्टा और सृष्ट का भेद
ही भक्ति-पथ का दार्शनिक आधार है। शाण्डिल्य कहते हैं कि ज्ञान के बिना भी भक्ति आध्यात्मिक शांति
प्रदान करती है जैसे गोपियों को मिली। भक्तों में अत्यंत दैन्य का भाव होता है। आराध्य की संनिधि में
वह अपने को नगण्य अनुभव करता है। भगवान को दैन्य और अहंकार पूर्ण दमन ही प्रिय होता है। 'नारद
भक्ति-सूत्र' में कहा गया है–"ईश्वरस्याभिमानद्वेषित्वाद् दैन्य प्रयत्वाच्च।"
    भक्ति से संबंधित गुण-स्नेह, श्रद्धा, करुणा, मृदुता-पुरूष की अपेक्षा नारी में अधिक पाये जाते हैं।
भक्ति-पथ में दैन्य अनुगतता, सेवा-प्रवणता, दयालुता एवं प्रणय का महत्त्व है ओर भक्त आत्म समर्पण,
अपने संकल्प के त्याग में उपरामता की चेतना-चाहना करता है; इसीलिये भक्ति को नारी रूप में चित्रित
किया गया है। तभी तो श्रीकृष्ण को पतिरूप में प्राप्त करने के लिये गोपियों ने महाशक्ति कात्यायनी की
उपासना की थी―
                         "कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि ।
                             नंदगोपसुतं देवि पति में कुरू ते नमः ।।
                                                                               ― श्रीमद्भागवत्

तभी भक्त अधिक अंश में प्रेयसी के समान होते हैं। परमेश्वर ही एकमात्र पुरुष है; ब्रह्मा से लेकर इतर
सभी नारी हैं, जो परमपुरूष से एकात्मता चाहती हैं।
इस तरह भक्ति केवल ‘एक का एक के प्रति अभिसार' या जीवात्मा की जगत से विरक्ति और
भगवान के प्रति आसक्तिमात्र नहीं है, अपितु उन भगवान के प्रति सक्रिय प्रेम है जो जगत का उद्धार
करने के लिये उसमें अवतीर्ण होते हैं। भक्ति में जहाँ केवल विश्वास और प्रेम की आवश्यकता होती
है, वहाँ प्रपत्ति में हम केवल भगवान के प्रति समर्पित हो जाते हैं, अपने आपको उसके हाथों में बिना
शर्त सौंप देते हैं। भक्ति और प्रपत्ति के अंतर को 'मर्कट-किशोर-न्याय' और 'मार्जार-किशोर-न्याय' से
अभिव्यक्त किया गया है। बंदर का बच्चा अपनी माँ को स्वयं जोर से पकड़े रहता है और उसकी रक्षा
हो जाती है। बंदर के बच्चों का उछलकर माँ को उछलकर पकड़ने में उसका प्रयास है जबकि बिल्ली
अपने बच्चे को स्वयं उठाकर अपने मुँह में रख लेती है। अपनी रक्षा के लिये बिल्ली के बच्चे को
कुछ नहीं करना पड़ता है। भक्ति में भगवत्कृपा का कुछ सीमा तक अधिकार प्राप्त हो जाता है ओर
प्रपत्ति में भगवत्कृपा का उन्मुक्त प्रदान होता है। प्रपत्ति में प्रपन्न की योग्यता या कृत सेवाओं पर ध्यान
नहीं दिया जाता।
        सो, श्रद्धा भक्ति का वास्तविक आधार है। इसीलिये देवताओं का जिनमें लोगों की श्रद्धा है,
अस्तित्व स्वीकार किया गया है जो सर्वोपरि भगवान का भक्त है, वही असीम आनंद को प्राप्त करता है।
भक्ति की परिभाषा बताते हुए मधुसूदन सरस्वती ने लिखा है-"यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है,
जिसमें चित्त प्रेमोन्मत्तता से द्रवीभूत होकर भगवदाकार बन जाता है।" "द्रवीभावपूर्विका हि मनसो
भगवदाकारता सविकल्पकवृत्तिरूपा भक्तिः"। भगवान के प्रति यह रागात्मिका आसक्ति जब अत्युन्माद में
परिणत हो जाती है, तब वह सच्चा प्रेमी अपने को भगवान में विलीन कर देता है। वास्तव में भक्ति ज्ञान
का सोपान है। आचार्य रामानुज की दृष्टि में वह स्मृति संतानरूपा है। जब भक्ति की ज्वाला जगती है,
अंतर्यामी भगवान भक्त के अंदर अपनी कृपा से ज्ञान का दीपक जला देते हैं। भक्त परमेश्वर के साथ
घनिष्ठ एकात्मयोग का अनुभव करता है और भगवान की अनुभूति उसे ऐसी सत्ता के रूप में होती है,
जिसमें सारे विरोधों का अभाव हो जाता है। वह भगवान को अपने अंदर और अपने को भगवान के अंदर
देखता है। भक्त प्रह्लाद की उक्ति है कि-"मनुष्य का सर्वोच्च ध्येय भगवान की एकातिक भक्ति और
उसकी सर्वव्यापकता की अनुभूति ही है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है-"एकांतभक्तिगोविन्दे यत्सर्वत्र
तदीक्षणम्।" भगवान से प्रेम करने वाली उस प्रेयसी के लिये इसमें कोई अंतर नहीं आता कि वह स्नेहावेग
में प्रेमास्पद भगवान के वक्ष पर बिहार करे अथवा वह स्नेहपूर्वक उनके चरणों का चुम्बन करे। इसी प्रकार
ज्ञानी के लिये एक ही बात है कि वह चेतना की सीमा से ऊपर उठकर रस में डूब जाय या भगवान का
प्रेमपूर्वक भजन करे-"प्रियतमहदये वा खेलतु प्रेमरीत्या पदयुगपरिचर्या प्रेयसी व विधताम । विहरतु विदितार्थो
निर्विकल्पे समाधौ ननु भजनविधौ वा तुल्यमेतद द्वयं स्यात् ।।"

                                                      ★★★

Comments

Popular posts from this blog

Gove confirms mandatory housebuilding targets for councils will be abolished in face of Tory rebellion – UK politics live

Kotak Mahindra Bank Recruitment 2022 Released for Graduate Candidates And Apply Online