भक्ति-आंदोलन की विभिन्न धाराएँ

       भक्ति-आंदोलन की विभिन्न धाराएँ




                                           भक्ति-आंदोलन की विभिन्न धाराएँ


इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि भक्ति-आंदोलन के समय संपूर्ण भारतवर्ष अखंड था, एक था;
परस्पर प्रगाढ़ रूप से संबद्ध । यही कारण था कि देश के एक कोने से (दक्षिण से) उठा हुआ भक्ति का स्वर
संपूर्ण देश में परिव्याप्त हो गया । सुदूर दक्षिण में केरल के शंकराचार्य का अद्वैतवाद भारतवर्ष में विचार का
विषय बन गया। इसी तरह वहाँ के प्रबुद्ध चिंतकों द्वारा आरंभ किया गया भक्ति-आंदोलन भी समस्त भारत में
फैल गया। इस आंदोलन ने विभिन्न धर्मों, मतों, संप्रदायों में विभक्त भारतीय जन को पुनः एक सूत्र में बाँध
दिया था। यही इस आंदोलन की चरम सामाजिक और सांस्कृतिक उपलब्धि कही जा सकती है।
  भक्ति-काल के विकास के साथ ही उसमें अनेक तरह के दार्शनिक मतों के अलावा अनेक तरह की
विचारधाराओं का भी प्रभाव पड़ता रहा। पूर्व से चली आती हुई भक्ति-धारा की चेतना सिद्ध-नाथ पंथियों की
साधना तथा बौद्धों एवं अद्वैतवादियों की वैचारिक उपपत्तियां सबका प्रभाव इस आंदोलन पर पड़ा । समस्त
भारत में हमें इस भक्ति आंदोलन के दो रूप मिलते हैं एक प्रबुद्ध रिचारकों द्वारा प्रचारित रूप दूसरा अशिक्षित
निम्नवर्गीय साधकों द्वारा स्थापित रूप । बौद्धधर्म के परवर्ती सिद्ध-साधकों ने दूसरे रूप को जन्म दिया। इस रूप
में सामाजिक अन्याय के प्रति विरोध का उग्र और तीखा स्वर तो अवश्य रहा पर इनका धर्म या भक्ति का कोई
सुचिंतित रूप सामने नहीं आ सका । फलतः ये सामाजिक उच्छंखला के पर्याय बन गये। इसके विपरीत जो
विचारधारा प्रबुद्ध विचारकों द्वारा सामने आई उसके पीछे एक लम्बी, विस्तृत स्वस्थ वैचारिक परम्परा थी। यह
स्वस्थ निर्माण की प्रक्रिया थी। दक्षिण के भक्ति-आंदोलन ने समस्त देश को ऐसा ही दृढ़ और स्थायी आधार
प्रदान किया था। यही आंदोलन भक्तों की वैष्णव-भक्ति-धारा का आंदोलन था। बाद में यह धारा प्रधानतः
दो रूपों में प्रस्फुटित और पल्लवित हुई । ये दोनों धाराएँ थीं निर्गुण भक्ति-धारा और सगुण भक्ति-धारा । ये
दोनों धाराएँ ऊपर से तो नितांत अलग-अलग दिखाई पड़ती थीं परंतु गहराई से देखने पर लगता है दोनों परस्पर
घुल मिलकर एक हो गये हों। यही कारण है कि जिन दो प्रमुख धाराओं में यह भक्ति मार्ग बँटा था बाद में
उनकी भी दो-दो शाखाएँ हो गयीं। इस निर्गुण शाखा की दो उपशाखाएँ- ज्ञानमार्गी और प्रेममार्गी तथा सगुण
की दो उपशाखाएँ–कृष्ण भक्ति-शाखा एवं राम भक्ति शाखा । इस तरह भक्ति काल में मुख्यत: चार धाराएँ
अवश्य बनीं परंतु उनमें कुछ ऐसी समान भावनाएँ और प्रवृत्त्यिाँ थीं जिनके कारण ये सब एक सम्मिलित नाम
से पुकारी जाती हैं―
(1) निर्गुण पंथ की ज्ञानाश्रयी शाखा—यह हिंदुओं की ओर से हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने
की इच्छा का परिणाम थी। संत कवियों ने निर्गुणवाद में हिंदुओं और मुसलमानों को एक-दूसरे से अधिक निकट
लाने की संभावना देखी । मुसलमान एकेश्वरवाद के माननेवाले थे। उनका मूल मंत्र था—'ला इलाह लिल
इल्लाह, मुहम्मद रसूल अल्लाह'-अर्थात् अल्लाह के सिवा दूसरा कोई नहीं है और मुहम्मद खुदा का रसूल
या दूत है। वे लोग देवी-देवताओं की पूजा में हिंदुओं का साथ नहीं दे सकते थे। वे बहुईश्वरवाद के विरुद्ध
थे। हिंदू भी बहुईश्वरवादी नहीं थे। ये सब देवी-देवताओं को एक परमात्मा का ही रूप मानते थे―"एक :
सत् विप्राः बहुधा वदन्ति" । हिंदुओं का निर्गुणवाद खुदावाद के बहुत निकट था। निर्गुणवाद में खुदा की एकता
और निराकारता सम्मिलित है। संत कवियों ने निर्गुणवाद के आधार पर ही राम और रहीम की एकता का समर्थन
एवं हिंदू-मुसलमानों की निरर्थक रूढ़ियों का विरोध कर, दोनों जातियों में अविरोध-भाव उत्पन्न करने का उपाय
किया। महात्मा कबीर इस धारा के प्रमुख प्रवर्तक थे। उनका पालन-पोषण यद्यपि मुसलमान के घर में हुआ
था, तथापि रामानंद का शिष्यत्व ग्रहण करने के कारण उन्हें हिंदू ही कहा जायगा । इनकी चलाई शाखा को
हिंदुओं ने ही चलाया भी। इस शाखा के अन्य प्रमुख कवि थे–रैदास, मलूकदास, नानक, कमाल, दादू आदि ।
इस प्रकार निर्गुणवादियों का विलक्षण अद्वैतवाद, उनकी रहस्यात्मक साधना-पद्धति, धार्मिक दम्भ और
आडम्बरपूर्ण विद्धता के प्रति तीव्र विरोध की भावना तथा समाज में प्रचलित जाति-पाँति और ऊँच-नीच की
भावना का खंडन—यह सब पुरानी लगभग बौद्ध परंपरा से ली गई वैचारिक प्रतिपत्तियाँ थीं।

(2) निर्गुणपंथ की प्रेममार्गी शाखा—यह धारा मुसलमान संतों और सूफियों की सद्भावना का फल थी।
मुसलमानों का सूफी संप्रदाय हिंदू धर्म के निकट आ जाता है। सूफी हिंदुओं के सर्वेश्वरवाद (सारा संसार ही ईश्वर
है) के निकट पहुँच जाते हैं। ये सूफी ईश्वर को अपने प्रेम-पात्र के रूप में देखना चाहते हैं, जबकि साधारण
शरीयत को मानने वाला मुसलमान ईश्वर के साथ मालिक और बंदा का संबंध मानता है। उन संतों ने हिंदू
प्रेमगाथाओं को लेकर काव्य-रचनाएँ की और फिर उनके द्वारा अपने सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। इस धारा के
अन्यतम कवि जायसी थे। जायसी के अलावा मुल्ला दाउद, कुतुबन और मंझन जैसे भक्त कवि भी थे।

(3) सगुण पंथ की कृष्ण भक्ति―शाखा यह धारा उन भक्तों के अंतस्तल से प्रवाहित हुई जो अपने
इष्टदेवों की पूजा और उपासना में मग्न रहते थे। वे देश और जाति का कल्याण भगवद्भजन मे ही देखते थे
उनको राजदरबारों के ऐश्वर्य में तनिक भी आकर्षण नहीं था। वे मुसलमानों से भी विरोध नहीं रखते थे लेकिन
उनमें मिलने की इच्छा भी नहीं थी। तभी तो वे बादशाह तक का निमंत्रण यह कहकर ठुकरा देते थे कि "सन्तन
को कहा सीकरी सों काम।" कृष्ण-भक्त कवि कुंभनदास को जब अकबर ने बुलाने के लिये आदमी भेजा तभी
उन्होंने यह कहा था। जिस शाखा ने असम-बंगाल से लेकर गुजरात तक के बड़े भू-भाग को रसमग्न कर दिया
था वह यही कृष्ण-भक्ति का प्रेम-प्रधान रूप था । कई संघटित संप्रदायों ने कृष्ण की जन्मभूमि गोकुल-वृन्दावन
को प्रधान केंद्र बनाकर देश भर में प्रचार किया तथा जो शताब्दियों तक संगीत, काव्य, चित्र आदि कलाओं को
प्रेरणा, विषय-वस्तु और उद्देश्य प्रदान करता रहा। कृष्ण भक्ति-शाखा इतनी समृद्ध और उत्कृष्ट है कि हम उसे
न केवल भक्तिकाल की प्रधान काव्यधारा कहें; वह संपूर्ण मध्ययुग में तथा उसके अनंतर भी कम से कम आधी
शताब्दी तक हम कृष्ण-काव्य की ही प्रमुखता देखते हैं। इस धारा के प्रमुख कवि सूरदास थे। वैसे विद्यापति के
पद कृष्ण-भक्ति आंदोलन के वेग के पूर्व ही रसिक जनों का चित्त हरने लगे थे। अन्य कवियों में नंददास,
कुंभनदास, परमानन्द दास तथा हितहरिवंश जैसे कवि भी थे।

(4) रामभक्ति-शाखा― यह ऐसी सगुणोपासना की शाखा थी जो राम को सर्वोपरि इष्टदेव मानती थी।
इसमें दसरथ-सुत राम में, जिनका चरित आदिकवि वाल्मीकि ने गाया था, परम ब्रह्मत्व और पूर्ण मानवत्व की
प्रतिष्ठा की। इसके प्रधान और प्रमुखतम कवि तुलसीदास थे। इनका कृतित्व और व्यक्तित्व भी इतना महान्
है कि उन्होंने अकेले जो रामभक्ति के प्रचार में सफलता पाई वह किसी संघटित संप्रदाय को भी नहीं मिल पाई
होगी। तुलसी की दृष्टि में व्यापकता और गहराई दोनों है। इन दोनों शाखाओं के भक्तकवि कृष्ण और राम
को ईश्वर का अवतार मानते थे । 

                                                      ★★★

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