जल संसाधन | jal sansadhan

जल संसाधन

जल के महत्व को विश्व का कोई भी व्यक्ति, या जंतु या प्रकति स्वयं भी नहीं नकार सकती है। यही जल इस पृथ्वी पर जीवन का प्रारंभ स्थल था और इसी जल के दम पर पृथ्वी में आज भी जीवन की संभावनाएँ बनी हुई हैं। जल के महत्व का आभास उस व्यक्ति को अधिक होगा जो जल के अभाव में जीवन यापन करने को बाध्य होता है। यह वास्तव में प्रकृति द्वारा प्रदत्त एक अमूल्य वरदान है।
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ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं है जहां जल की आवश्यकता को शत प्रतिशत नकारा जा सके। शरीर की आवश्यकता पूरी करने, घर के कार्यों को संपादित करने, उद्योगों को चलाने, ऊर्जा उत्पन्न करने, आदि क्षेत्र में जल का कोई विकल्प ही नहीं है। परंतु जल की जितनी अधिक आवश्यकता है उतना ही अधिक दोहन और उतनी ही कम उपलब्धता। जल के स्त्रोतों का दोहन इतनी तीव्रता से हो रहा है कि जीवनोपयोगी जल की दीर्घकालिक उपलब्धता पर प्रश्नचिहन लग गए है। जल की कमी की स्थिति को और अधिक भयावह बना देता है जल का दिन ब दिन प्रदूषित होना। एक तो वैसे भी बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जल की उतनी मात्रा उपलब्ध नहीं है जितनी होनी चाहिए उस पर मानव अपने मूखर्तापूर्ण कृत्यों से उपलब्ध जल को भी विषाक्त करने पर तुला हुआ है। यदि मानव ने अपनी गैरजिम्मेदाराना हरकतों की ओर गौर नहीं किया और शीघ्रातिशीघ्र इसे बंद करने का प्रयत्न नहीं किया तो उसे निकट भविष्य में इसका भयावह परिणाम भुगतना पड़ सकता है।

जल के स्रोत

जल के चार प्रमुख स्रोत हैं-
  • पृष्ठीय जल
  • भूमिगत जल
  • वायुमंडलीय जल तथा
  • महासागरीय जल
हम अपने व्यावहारिक जीवन में प्रत्यक्षतः पृष्ठीय और भूमिगत जल का ही उपयोग करते हैं। आइए इनके विषय में विस्तार से जानें।

पृष्ठीय जल : धरातल पर पृष्ठीय जल का मूल स्रोत वर्षण है। वर्षण का लगभग 20 प्रतिशत भाग वाष्पित होकर वायुमंडल में विलीन हो जाता है। जल का कुछ अंश भूमिगत हो जाता है। पृष्ठीय जल का एक बड़ा भाग धरातल पर नदियों-नालों, तालाबों, झीलों तथा पोखर-जोहड़ों में मिलता है। शेष जल बहकर सागर-महासागरों में जा मिलता है। भू-पृष्ठ पर पाये जाने वाले जल को पृष्ठीय या धरातलीय जल कहते हैं।
कुल पृष्ठीय जल का लगभग दो-तिहाई भाग देश की तीनों बड़ी नदियों – सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र से होकर बहता है। आज भारत में निर्मित जलाशयों के जल भंडारण की क्षमता लगभग 174 अरब घन मीटर है। स्वतंत्रता के समय जलाशयों के भंडारण की क्षमता मात्र 18 अरब घनमीटर थी। इस प्रकार जल भण्डारण की क्षमता लगभग दस गुनी बढ़ाई जा चुकी है।
गंगा द्रोणी में उपयोग के योग्य जल भंडारण की क्षमता सबसे अधिक है, परन्तु ब्रह्मपुत्र नदी द्रोणी में वार्षिक प्रवाह सर्वाधिक होते हुए भी उपयोग योग्य जल भंडारण की क्षमता सबसे कम है। गोदावरी, कृष्णा, महानदी तथा सिंधु नदी द्रोणियों में भण्डारण क्षमता पर्याप्त है। उपयोग योग्य जल भंडारण की क्षमता को अनुपात की दृष्टि से देखा जाए तो तापी नदी द्रोणी का पहला स्थान बनता है। तापी नदी द्रोणी की भंडारण क्षमता 97 प्रतिशत है। देश की तीनों बड़ी नदियों सिंधु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र में वार्षिक जल प्रवाह की मात्रा अधिक है। अतः इन नदियों के जल भंडारण की क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।

भूमिगत जल : वर्षा का जल रिस-रिस कर भूमिगत होता रहता है। जल रिसाव की प्रक्रिया पृष्ठीय जल से भी होती है। इन दोनों ही माध्यमों से भूमि के नीचे विशाल मात्रा में पानी इकट्ठा हो जाता है। इसे भूमिगत जल या भौम जल भी कहते हैं। केन्द्रीय भौम जल बोर्ड के अनुसार 1994-95 में भारत में आपर्य भूमिगत जल क्षमता लगभग 431 अरब घन मीटर प्रतिवर्ष है। इसमें से लगभग 396 अरब घन मीटर जल उपयोग के लिए उपलब्ध है। भूमिगत जल का वितरण सर्वत्र समान नहीं है। भूमिगत जल की उपलब्धता वर्षा की मात्रा, वर्षा की प्रकृति, भूमि के स्वभाव तथा भूमि के ढाल पर निर्भर करती है। अधिक वर्षा वाले भागों में जहाँ भूमि समतल तथा सरंध्र मृदा वाली है वहाँ पानी आसानी से रिस जाता है। अतः इन क्षेत्रों में भूमिगत जल कम गहराई पर पर्याप्त मात्रा में मिलता है। राजस्थान जैसे क्षेत्रों में समतल भूभाग तथा सरंध्र बलुई मृदा होते हुए भी वर्षा की कमी के कारण जल अधिक गहराई पर कम मात्रा में मिलता है। देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में यद्यपि अधिक वर्षा होती है, परन्तु भूमि के ढालू होने के कारण जल के प्रवेश के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं मिलती, फलतः इन भागों में भी भूमिगत जल अधिक गहराई में तथा कम मात्रा में मिलता है। गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदानों तथा तटीय मैदानों में भौम-जल के विशाल भंडार हैं। प्रायद्वीपीय पठार, हिमालयी क्षेत्रों तथा मरुस्थलीय भागों में भूमिगत जल कम मात्रा में मिलता है।

भूमिगत जल क्षमता का उपयोग
जिन क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा अपेक्षाकृत कम होती वहाँ पर भूमिगत जल का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात तथा उत्तर प्रदेश में भूमिगत जल का उपयोग बड़े पैमाने पर किया जाता है; जबकि आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा छत्तीसगढ़ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ वर्षा की मात्रा कम होते हुए भी भूमिगत जल का उपयोग कम हो पाता है। भूमिगत जल के विकास की विशेष आवश्यकता है।

जल की उपयोगिता
भारत में जनसंख्या निरंतर और तेजी से बढ़ रही है। स्वतंत्रता के बाद देश की जनसंख्या लगभग तिगुनी हुई है। जनसंख्या बढ़ने के कारण सभी क्षेत्रों में जल की मांग बहुत बढ़ी है। पेय जल तथा सिंचाई व उद्योगों के लिए जल की मांग अपेक्षाकृत अधिक बढ़ी है। दूसरी ओर भारत में प्रति व्यक्ति जल की वार्षिक उपलब्धता बराबर घट रही है। सन् 1951 में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल की उपलब्धता 5177 घन मीटर थी जो 2001 में घटकर केवल 1829 घन मीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष रह गई है। आने वाले समय में अर्थात् 2025 तक पहुँचते-पहुँचते जल की उपलब्धता प्रति व्यक्ति घटकर 1342 घन मीटर प्रतिवर्ष रह जाएगी। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि 1000 घन मीटर औसत वार्षिक जल की उपलब्धता पर जल संकट पैदा हो जाता है। आज कई देश जल संकट की स्थिति में पहुँच चुके हैं। यहाँ तक कि उन्हें जल का आयात करना पड़ता है।
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पानी का विविध उपयोग है। इस के उपयोग की सूची लम्बी है। पीने के लिए तो पानी चाहिए ही। घरेलू कार्यों, सिंचाई, उद्योगों, जन स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा मल-मूत्र की निकासी के लिए जल अपरिहार्य है। जल विद्युत के निर्माण तथा परमाणु संयंत्रों के शीतलन के लिए विशाल जल राशि निरंतर चाहिए। मत्स्य पालन, वानिकी और जल क्रीड़ाओं की कल्पना जल के बिना नहीं की जा सकती। पर्यटन को विकसित तथा बढ़ावा देने में पानी की विशेष भूमिका है। कृषि अर्थव्यवस्था का तो जल अभिन्न अंग है। इस प्रकार जल सभी प्रकार के विकास कार्य के लिए आवश्यक है। इसका उपयोग जीवन के हर क्षेत्र में आवश्यक है और उपयोग हर क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा है। नगरों के बढ़ने के कारण नगरों में जल की मांग प्रतिदिन बढ़ रही है।

जल संसाधन का उपयोग

जल के विविध उपयोग हैं। इनमें सिंचाई का पहला स्थान है। कुल उपयाग किए गए जल का 84 प्रतिशत भाग सिचाई के काम आता है। जल की मांग अन्य कामों में बढ़ रही है। इससे भविष्य में सिंचाई के लिए पानी का प्रतिशत घट जाएगा। प्राचीन काल से ही पानी का उपयोग सिंचाई के लिए होता आ रहा है। कावेरी नदी से ग्रांड ऐनीकट का दूसरी शताब्दी में निर्माण किया गया थज्ञ। सन् 1882 में उत्तर प्रदेश की पूर्वी यमुना नहर का निर्माण किया गया
भारत में वर्षा कुछ महीनों तक ही सीमित रहती है। वर्षा की मात्रा अनिश्चित है। कभी वर्षा जल्दी प्रारंभ हो जाती है। तो कभी देर से। दोनों ही स्थितियों में फसल बुरी तरह प्रभावित होती है। कुछ फसलें जैसे चावल, जूट और गन्ना के लिए अन्य फसलों की तुलना में अधिक पानी की आवश्यकता होती है जिसे केवल सिंचाई के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। समय पर और पर्याप्त मात्रा में सिंचाई फसलों की उत्पादकता और गुणवत्ता सुनिश्चित करती है।
हिमालय की सदानीर नदियाँ, गहरी जलोढ़ मिट्टियाँ और क्रमिक मंद ढाल ने भारत के विशाल जलोढ़ मैदानों में नहरों का बनाना आसान का दिया है। भारत के प्रायद्ववीपीय पठार पर इस प्रकार की नहरें बनाना अपेक्षाकृत कठिन और अधिक व्यय साध्य है। यहां तालाब और जलाशय बनाना आसान रहा है। तटीय मैदानों और डेल्टाई प्रदेशों में नहरों द्ववारा सिंचाई की सुविधाएँ पर्याप्त है।
भारत में सन् 1950-51 में 226 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही सिंचाई की सुविधाएँ विकसित थीं जो 1999-2000 में बढ़कर 847 लाख हेक्टेयर को उपलब्ध होने लगी हैं। सिंचाई की कुल संभावित क्षमता का 90 प्रतिशत भाग सिंचाई के उपयोग में लाया जा रहा है।

बहुउद्देशीय नदी-परियोजनाएँ
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से भारत आत्मनिर्भर बनने तथा लोगों का जीवनस्तर सुधारने के लिए योजनाबद्ध आर्थिक गतिविधियों में लगा हुआ है। इसके अंतर्गत कई नदी-घाटी परियोजनाएँ विकसित की गई है। इनमें से कुछ उद्देशीय नदी-घाटी परियोजनाएँ है। इन परियोजनाओं का अर्थ है। समन्वित रूप से नदी-घाटियों से जुड़ी विभिन्न समस्याओं का हल करना। इनमें बाढ़ों के नियंत्रण, मृदा अपरदन पर रोक, सिंचाई और पीने के लिए पानी उद्योगों गावों और नगरों के लिए जल, विद्युत उत्पादन, अंतरथलीय जल परिवहन और कई अन्य सुविधाएँ जैसे मनोरंजन, वन्य जीव संरक्षण और मत्स्यन का विकास शामिल है।

सिंचित क्षेत्र का वितरण
स्वतंत्रता के बाद भारत में कुल सिंचित क्षेत्र लगभग चार गुणा बढ़ गया है। आज लगभग 850 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित है। भारत में शुद्ध बोए गए क्षेत्र के लगभग 38 प्रतिशत भाग में सिंचाई होती है। विभिन्न राज्यो में सिंचित क्षेत्र के वितरण में बहुत असमानता है। मिजोरम में शुद्ध बोए क्षेत्र का केवल 7.3 प्रतिशत सिंचित है।, जबकि पंजाब में यह 90.8 प्रतिशत है। कुल सिंचित क्षेत्र का अनुपात बोए गए क्षेत्र के संदर्भ में बहुत असमान है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, जम्मू और कश्मीर, तमिलनाडु और मणिपुर में बोए गए कुल क्षेत्र का 40 प्रतिशत से अधिक भाग सिंचाई के अंतर्गत है।
प्रत्येक राज्य के अंतर्गत सिंचित क्षेत्रों में बहुत अंतर है। आंध्र प्रदेश के तटीये जिले तथा गोदवरी-कृष्णा अंतर है। आंध्र प्रदेश के तटीय जिले तथा गोदावरी-कृष्ण के डेल्टाई भाग, उड़ीसा का महानदी डेल्टा, तमिलनाडु में कावेरी डेल्टा, पंजाब, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, देश के संघन सिंचित क्षेत्र हैं।

भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ

परियोजना का नाम

नदी

लाभान्वित राज्य

दामोदर घाटी

दामोदर

झारखंण्ड, पश्चिम बंगाल

भांखड़ा-नांगल

सतलुज

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान

हीराकुंड

महानदी

उड़ीसा

कोसी

कोसी

बिहार (और नेपाल)

चम्बल घाटी

चम्बल

मध्य प्रदेश, राजस्थान

तुंगभ्रदा

तुंगभ्रदा

कर्नाटक, आंध्र प्रदेश

नागार्जुन सागर

कृष्णा

आंध्र प्रदेश

नर्मदा घाटी

नर्मदा

मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान

इंदिरा गांधी नहर (राजस्थान नहर)

व्यास, सतलुज

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान


भारत में सिंचाई के प्रमुख तीन साधन हैं- (क) नहर (ख) कुएँ व नलकूप और (ग) तालाब। कुएँ और नलकूप सिंचाई के सर्वप्रमुख साधन है। नहरों तथा तालाबों का क्रमश: दूसरा व तीसरा स्थान है। नहर सिंचाई का अधिकतम विकास विशाल मैदानों तथा पूर्वी तटीय मैदानों को महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी डेल्टाओं में हुआ है। कुएँ और नलकूप जलोढ़ मैदानों में लोकप्रिय हैं। तालाबों द्ववारा सिंचाई पूर्वी तथा दक्षिणी राज्यों में होती है

बढ़ती जनसंख्या की बढ़ती मांग
पानी, प्रकृति का असमाप्त होने वाला उपहार है। किसी भी इसकी स्थैतिक एवं सामायिक वितरण की असमानता प्रायः मानव हितों, आजीविका तथा आर्थिक विकास को चुनौती देती रही है। बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए भोजन की बढ़ती मांग, नकदी फसलों का उगाना, बढ़ते हुए नगरीकरण और लोगों के बढ़ते जीवनस्तर के परिणामस्वरूप पानी की कमी निरंतर बढ़ रही है। ये भविष्य में पानी की कमी की समस्या को गंभीर बनाएँगे।
आज भी पश्चिमी राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों तथा प्रायद्ववीपीय पठार के आंतरिक भागों में पानी की गंभीर समस्या है। सैकड़ों गांवो और यहाँ तक कि नगरों में भी पानी की गुणवत्ता घट रही है। इससे जलजनित अनेक बीमारियाँ पैदा हो रही है।
पीने के पानी की आपूर्ति तथा सफाई, जीवन की मूलभूत आवश्यकताएँ है। पीने के पानी की सुविधाओं को बढ़ाने के लिए किए गए भारी प्रयासों के बावजूद पानी की माँग और उसकी आपूर्ति में भारी अंतर है। आज भी भारत में 8 प्रतिशत नगरों में पेय जल की आपूर्ति नहीं है। देश के लगभग 50 प्रतिशत गांवों में आज भी स्वच्छ, पीने योग्य पानी उपलब्ध कराने का काम शेष है।
स्वतंत्रता के पश्चात भारत में सिंचाई की सुविधाओं में बहुत विस्तार हुआ है। फिर भी दो-तिहाई कृषित क्षेत्र अभी भी वर्षा पर निर्भर है। हाल के वर्षों में कुओं और नलकूपों से जल की अधिक निवासी से भूमिगत जलस्तर गिर गया है। इससे भूमिगत जल संसाध नों में कमी आयी है। कई राज्यों में भूमिगत जल के अधिक मात्रा में निकालने से देश में भौम जल विकास कार्यक्रम के सामने गंभीर समस्या पैदा हो गई है। आज देश में जल की कम उपलब्धता व बढ़ती कमी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
विभिन्न कार्यों में प्रयुक्त किया जा रहा उपयोगिता के स्तर पर नहीं। घरो और औद्योगिकी केंद्रों के अपशिष्ट जल, जल प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं। जल संसाधनों का संरक्षण और प्रबंधन उपलब्ध जल सीमित है। इसका वितरण भी असमान है। जल प्रदूषित भी है। उपभोक्ताओं के लिए संतुलित तथा पर्याप्त जल आपूर्ति के लिए संरक्षण के उपायों को अपनाने की आवश्यकता है। जल एक ऐसा साधन है। जिसका सीधा संबंध हर जीव से जुड़ा है। अतः यह समुदाय की संपदा है।

जल संसाधनों के संरक्षण के उपाय

विभिन्न स्तरों पर किए जाने की आवश्यकता है। जल संरक्षण के कुछ सामान्य उपाय इस प्रकार है: जल संग्रहण के लिए अधिक से अधिक जलाश्यों का निर्माण, एक नदी बेसिन से दूसरी नदी बेसिन के लिए जल का स्थानांतरण और भूमिगत जल स्तर को उठाने के उपाय। जल एक राष्ट्रीय संपदा है। जल की कमी की समस्या को हल करने का निर्णय भी सरकार को लेना है इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हल करना है। अंतर्राष्ट्रीय जल विवादों को जल्दी-से-जल्दी निपटाना आवश्यक है। जल संरक्षण की विभिन्न तकनीकों में जल संभर विकास और वर्षा जल का संग्रहण अधिक महत्वपूर्ण है।
  • जल संभर विकास : नदी द्रोणी एक क्षेत्र है, जिसके जल को नदी और उसकी सहायक नदी की द्रोणी है, इसमें एक छोटी नदी हो सकती है अथवा नहीं भी परंतु जब कभी वर्षा होती है। तो वहाँ से होकर जल बहता है। और अंततः किसी न किसी नदी में मिल जाता है इस प्रकार जल संभर एक भू-आकृतिक इकाई है। और इसका उपयोग सुविधानुसार छोटे प्राकृतिक इकाई क्षेत्रों में समन्वित विकास के लिए किया जा सकता है। जल संभर विकास एक समग्र विकास की सोचा है। इमसें मिट्टी और आर्द्रता का संरक्षण, जल सग्रहण, वृक्षारोपण, उद्यान कृषि, चरागाह विकास और सामुदायिक भूमि संसाधनों का तलोच्चन संबंधी कार्यक्रम शामिल है। इन सभी कार्यक्रमों में भूमि की क्षमता तथा स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना होता है। इसमें स्थानीय लोगों की सहभागिता की आवश्यकता होती है। इसके लिए केंद्रीय तथा राज्य सरकारों ने आशाजनक परिणाम प्राप्त करने के लिए कई योजनाएँ अपने हाथों में ली है।
  • वर्षा जल संग्रहण : यह भूमिगत जल की क्षमता को बढाने की तकनीक है। इसमें वर्षा के जल को रोकने और इकट्ठा करने के लिए विशेष ढांचों जैसे कुएँ गड्ढ़े, बंधिका आदि का निर्माण करना शामिल है। इसके द्वारा न केवल जल का संग्रहण होता है, अपितु, जल को भूमिगत होने के लिए अनुकूल परिस्थितयाँ पैदा हो जाती है। भूमिगत जलाश्यों में कृत्रिम पुनर्भरण तकनीक को अपनाकर वर्षा जल को इकट्ठा किया जाता है। इससे घर परिवार की आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है।

वर्षा जल संग्रहण के उद्देश्य

  • जल की बढ़ती मांग को पूरा करना
  • धरातल पर बहते जल की मात्रा को कम करना
  • सड़कों को जल भराव से बचाना।
  • भौम जल को इकट्ठा करने की क्षमता तथा जलस्तर को बढ़ाना।
  • भौम जल प्रदूषण को घटाना।
  • भौम जल की गुणवत्ता को बढ़ाना तथा
  • ग्रीष्म ऋतु तथा लंबी शुष्क अवधि में जल की घरेलू आवश्यकता को पूरा करना
  • भौम जल के पुनर्भरण के लिए कम लागत की कई तकनीके हैं। इनमें जल को रिसने में सहायक गडढ़ों का निर्माण, खेतों के चारों और गहरी नालियाँ खोदना, गडढों को फिर से भरना, और छोटी-छोटी नदिकाओं पर बंधिकाएँ बनाना शामिल है। छत के पानी को टंकियों अथवा भूमि के नीचे आसानी से इकट्ठा किया जा सकता है।
जल के कुशल प्रबंधन के लिए आवश्यक बिंदू
  • जन-जागरण पैदा करना और जल के सरंक्षण और उसके कुशल प्रबंधन से संबंधित सभी क्रिया-कलापों में लोगों को शामिल करना।
  • बागवनी, वाहनों की धुलाई, शौचालयों और वाश-बेसिनों में उपचरित जल के उपयोग को रोकना।
  • सभी जल निकास की ईकाइयों जैसे कुओं, नलकूपों आदि को पंजीकृत करना।
  • भूमिगत जल निकास इकाइयों की निगरानी, जिससे उन्हें सूखने से बचाया जा सके।
  • जलाशयों को प्रदूषण से बचाना। एक बार दूषित होने पर जलाशय वर्षों बाद पुन: उपयोगी हो पाते है।
  • जल की बर्बादी तथा जल-प्रदूषण को रोकने के लिए जल की पाइपलाइने की तत्काल मरम्मत कराना।
सभी क्षेत्रों के लिए कोई एक जैसे उपाय लागू नहीं किए जा सकते हैं। क्षेत्र-विशेष के जलसंसाधनों के विकास और प्रबंधन के लिए क्षेत्र संबंधित स्थानीय लोगों को शामिल करना चाहिएँ

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