467. अंतिम अरण्य- निर्मल वर्मा

मृत्यु से पूर्व....
अंतिम अरण्य- निर्मल वर्मा
             हिन्दी साहित्य में निर्मल वर्मा एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। इनका रचना कर्म पाठक को एक अलग संसार की यात्रा करवाता है,वह संसार जो हम सब के अंदर है लेकिन‌ हम व्यक्त नहीं कर पाते। और निर्मल वर्मा इसलिए भी जाने जाते हैं‌ की उनका 'कहने' का ढंग बहुत अलग है। 
निर्मल वर्मा

  एक ऐसे लेखक जो पात्रों की जगह वातावरण और दृश्यों के माध्यम से ज्यादा प्रभावशाली ढंग से बात को व्यक्त करते हैं।
    निर्मल वर्मा जी का उपन्यास 'अंतिम अरण्य' पढा।
जिसे हम अपनी ज़िन्दगी, अपना विगत और अपना अतीत कहते हैं, वह चाहे कितना यातनापूर्ण क्यों न रहा हो, उससे हमें शान्ति मिलती है। 
     यह कहानी है मेहरा साहब की। रिटायर्ड जिंदगी जी रहे मेहरा साहब की जिंदगी में लेखक का प्रवेश होता है, और कहानी लेखक माध्यम से प्रथम पुरूष में आगे बढती है। । मेहरा साहब अपने अतीत को शब्दों में बांधना चाहते हैं, उनके जिंदगी के कुछ फुटनोट लेखन का काम लेखक का होता है। यहाँ लेखक मात्र लेखन ही नहीं बल्की उसका मेहरा साहब के साथ आत्मिय संबंध भी जुड़ जाता है।
  जिंदगी के अंतिम अरण्य में मेहरा साहब की जब पत्नी साथ छोड़ जाती है तो वह स्वयं को नितांत अकेला महसूस करते हैं। हालांकि उनके साथ लेखक, मिस अन्ना,  डॉक्टर सिंह, निरंजन बाबू और नौकर मुरलीधर होते हैं। पर वह स्वयं को अंदर से अकेला महसूस करते हैं।
      मनुष्य की असली यात्रा मृत्यु से पहले शुरू होती है, जब वह जीने की पक्की सड़क छोड़कर किसी अनजानी पगडंडी की ओर मुड़ जाता है, जो जीने और मृत्यु से अलग किसी और दिशा की ओर जाती है। इसी अनजान पगडंडी पर चलते हैं मेहरा साहब। बहुत कुछ होते हुये भी उनके पास अतीत के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
    यहाँ हर एक पात्र का अपना एक अतीत है, किसी का अतीत स्पष्ट है तो किसी का धुंधला। हर पात्र अपने अतीत के साथ जीता है।
      मैंने निर्मल वर्मा की जितनी भी रचनाएँ पढी हैं। उनमें मौसम को विशेष महत्व होता है। इनकी रचनाएं अधिकांश शीत ऋतु को रेखांकित करती हैं, शिमला का वर्णन होता है, क्रिसमस की छुट्टियों आदि।
   अगर पात्रों की बात करें तो इनके पात्र विषाद की स्थिति में जीते हैं, और लेखक भी उनके भावों को वातावरण और दृश्यों के माध्यम से अंकित करता है।
निर्मल वर्मा के उपन्यासों में वातावरण का चित्रण देखें-
बरामदे के बाहर हल्की पीली-सी चाँदनी फैली थी। झाड़ियों पर जुगनू उड़ रहे थे, टिमकते तारों से हवा में तिरते हुए। निरंजन बाबू की कॉटेज बहती हुई धुंध में स्तब्ध-सी खड़ी थी, खुलती हुई, छिपती हुई, किसी प्रागैतिहासिक गुहा-सी ग़मग़ीन, समय की छाती पर अधर में टिकी हुई। जंगल की जड़ी-बूटियों के बीहड़ में पेड़ निस्तब्ध खड़े थे…सिर्फ़ रस्सी का झूला धीरे-धीरे झोंटे ले रहा था, अपने ख़ालीपन में ख़ुद को झुलाता हुआ…।

अंतिम अरण्य - निर्मल वर्मा उपन्यास अंश
उन्होंने सिगरेट सुलगाई, कुसी के सिरहाने सिर टिकाकर और खिड़की के बाहर पेड़ों पर छाया उतरने लगी थी।

"जानते हो, मेहरा साहब ने मुझे क्यों बुलाया है ?" उन्होंने आँखें मुँदे- मुँदे ही पूछा।
"किसलिए ?" 

"वह जानना चाहते हैं, कितना समय और बचा है।" 
“कैसा समय ?"
“जीने का.." उनकी मुँदी आँखें खुल गईं, “कितने दिन, महीने, साल ?"
मुझे हल्का-सा झटका लगा। 

“उनकी उम्र में शायद सबको ऐसा होता है।"
“उम्र की बात नहीं...क्या चौबीस घंटे हमें अपनी उम्र याद रहती है ? जो चीज़ याद रहनी चाहिए, उसे हम भूल जाते हैं।"
“कौन-सी चीज़ ?"
"जैसे यह...” उन्होंने हल्के-से मेरी छाती को थपथपाया, "दिल, देह, बीमारी, शोक...सब ! तुम्हें क्या यह अजीब नहीं लगता कि जो चीज़ हमेशा हमारे साथ रहती है-उसी के बारे में हम डॉक्टरों से पूछने जाते हैं...या ज्योतिषियों से।"

     'अंतिम अरण्य' उपन्यास एक रिटायर्ड व्यक्ति के जीवन के अंतिम चरण की भावुक कथा है। जब व्यक्ति मृत्यु से पूर्व मृत्यु अनुभव करता है।
   उपन्यास में लेखक महोदय ने संवाद के अतिरिक्त वातावरण को महत्वपूर्ण पात्र की तरह प्रस्तुत किया है।
अंत में उपन्यास की एक पंक्ति-
हमारा अतीत कोई एक जगह ठहरा हुआ स्टेशन नहीं है, जो एक बार गुज़रने के बाद गायब हो जाता है, वह यात्रा के दौरान हमेशा अपने को अलग-अलग झरोखों से दिखाता रहता है।

उपन्यास-  अंतिम अरण्य
लेखक-      निर्मल वर्मा
प्रकाशन वर्ष-   2000

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