महामारी काल में जहां सरकारी स्कूलों पर बढ़ा भरोसा, वहीं निजी स्कूलों के चरित्र को बेपरदा कर दिया

महामारी काल में जहां सरकारी स्कूलों पर बढ़ा भरोसा, वहीं निजी स्कूलों के चरित्र को बेपरदा कर दिया


■  महामारी ने निजी स्कूलों के चरित्र को बेपरदा कर दिया। 

  निजी स्कूलों को जिस चीज की सबसे अधिक चिंता सताती रही है, वह रही है फीस

आम लोगों के हित की आड़ में कारोबार करने वाली निजी संस्थाओं की सरचनात्मक भ्रांतियां और अयोग्यताएं अब सामने आ चुकी


निजी स्कूलों के प्रति भरोसे की कमी और महामारी के दौरान कई स्कूल बंद हो जाने से सरकारी स्कूलों में दाखिले की दर बढ़ गई है।


वह नन्ही-सी बच्ची कुछ मिनटों के लिए चौखट पर खड़ी रही। फिर, अंदर आई और जिस मेज पर मैं बैठा था, उसके सहारे खड़ी हो गई। वह अब भी शांत थी। मानो कोई जल्दबाजी नहीं। कक्षा पहले की तरह चलती रही। दो मिनट की चुप्पी के बाद, मैंने उससे पूछा, ‘क्या कर रही हो?’ ‘मैं देख रही हूं।’ ‘क्या देखा?’ ‘स्कूल तो चल रहा है, लेकिन खिड़की बंद है।’


फिर, चटकदार गुलाबी कपड़े पहने वह बच्ची कक्षा में सबसे आगे चली गई और एक कुरसी पर चढ़ गई, जो उसकी लंबाई के हिसाब के काफी ऊंची थी। जैसे ही शिक्षक की नजर उस पर पड़ी, उन्होंने पूछा, ‘मुनीरा, स्कूल क्यों नहीं आई आज?’ ‘खिड़की बंद, तो मुझे लगा स्कूल बंद, इसलिए देखने आई हूं।’


अचानक वह तेजी से बाहर निकली और 10 मिनट में बालों में दो खूबसूरत चोटियां बनाकर व स्कूली यूनीफॉर्म पहनकर स्कूल बैग के साथ वापस लौट आई। उसके चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान थी। वह कक्षा तीन से पांच तक के बच्चों के समूह में घुल-मिल गई, क्योंकि उन सभी बच्चों की एक साथ लगाई जाने वाली कक्षा में ही वह पढ़ती थी।


चित्रांकन : यशवंत नामदेव


इस सरकारी स्कूल में कक्षा एक से पांच तक में 55 बच्चे हैं और शिक्षक दो। पिछले वर्ष मार्च में जब कोविड की वजह से स्कूल बंद किया गया था, तब यहां 39 छात्र थे। विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है, क्योंकि अब गांव में इस आयु-वर्ग के सभी बच्चों ने इसी स्कूल में दाखिला ले लिया है, जबकि महामारी से पहले कुछ छात्र नजदीक के एक छोटे शहर के दो निजी स्कूलों में भी जाते थे। इन दोनों में से एक स्कूल तो हमेशा के लिए बंद हो गया, जबकि दूसरा चल रहा है, लेकिन ग्रामीणों का उस पर से भरोसा उठ गया है। मैंने जिन-जिन लोगों से बात की, उन सबमें निजी स्कूलों के प्रति अविश्वास व्यापक रूप से दिखा। मैंने बार-बार सुना कि महामारी ने निजी स्कूलों के चरित्र को बेपरदा कर दिया है। यहां मैं उन्हीं भावनाओं का सार परोस रहा हूं।


दरअसल, निजी स्कूलों को जिस चीज की सबसे अधिक चिंता सता रही है, वह है फीस। पिछले 18 महीने के दौरान, उन्होंने बच्चों को व्यस्त रखने के अलावा कुछ और नहीं किया। इसके विपरीत, सरकारी स्कूलों के कई शिक्षक बच्चों के घर पर या गांव के चौपाल पर पहुंचे। कुछ तो नियमित रूप से ऐसा करते रहे। फिर भी, निजी स्कूल फीस मांगते रहे। कुछ ने जैसे-तैसे ऑनलाइन शिक्षण की व्यवस्था शुरू की, लेकिन उन्हें भी पता है कि जब तक यह व्यवस्था अधिकांश बच्चों की पहुंच में नहीं हो, कारगर नहीं होगी। और, सवाल यह भी है कि जिन कुछ बच्चों की पहुंच ऑनलाइन माध्यमों तक है, क्या वे वास्तव में इससे कुछ सीख पाते हैं?


 मगर निजी स्कूलों को इसकी परवाह नहीं है, वे तो सिर्फ पैसा बनाना चाहते हैं। उन्हें बच्चों या उनकी पढ़ाई में कोई दिलचस्पी नहीं है। वे एक व्यवसाय चला रहे हैं। और यह हास्यास्पद ही है कि उद्योग चलाने के बावजूद वे सेवा न देने पर भी भुगतान मिलने की उम्मीद पालते हैं। वे लोगों को जबरन फीस देने की कहते हैं। इसीलिए, इन स्कूलों ने सभी का भरोसा खो दिया है। अगर उन्होंने फिर से कामकाज शुरू किया भी है, तो बच्चे स्थानीय सरकारी स्कूल में भेजे जा रहे हैं। इसके अलावा, महामारी ने इस भावना को भी मजबूत किया है कि सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता आमतौर पर उनकी होने वाली आलोचनाओं से बेहतर होती है और निजी स्कूलों से अमूमन अच्छी है।


निजी स्कूलों के प्रति भरोसे की कमी और महामारी के दौरान कई के बंद हो जाने के कारण सरकारी स्कूलों में दाखिले की दर बढ़ गई है। मुनीरा का गांव इसका एक आदर्श उदाहरण है। निजी स्कूलों के अनुभवों के विपरीत, उस गांव के सरकारी स्कूल का कोई एक शिक्षक पिछले 18 महीनों से नियमत: मोहल्ला कक्षाएं आयोजित करता रहा। शिक्षकों ने यह भी सुनिश्चित किया कि स्कूल में मध्याह्न भोजन योजना के तहत बनने वाला खाना बच्चों के घरों पर नियमित पहुंचे। लॉकडाउन के सबसे बुरे दौर में उन्होंने कई घरों को सूखे अनाज की भी मदद की। पिछले हफ्ते जब मैं इस पूरे क्षेत्र में घूम रहा था, तब मैंने देखा कि स्कूलों के फिर से खुलने पर हर सरकारी स्कूल में नामांकन कम से कम 20 प्रतिशत बढ़ गया है।


बढ़ते नामांकन के कारण सरकारी स्कूली तंत्र में नई ऊर्जा का प्रवाह हुआ है। इसका प्रभावी ढंग से इस्तेमाल किया जाना चाहिए, ताकि जिस अभूतपूर्व शैक्षणिक आपात स्थिति से हम जूझ रहे हैं, उनसे निपटा जा सके। पिछले 18 महीनों में बच्चों की समझ के स्तर पर हुए नुकसान की हमें भरपाई करनी है। इसके अलावा, हमें भारत के कमजोर तबकों के बच्चों में स्कूल छोड़ने की दर बढ़ने के कारण पैदा होने वाले संकट से भी पार पाना है। ऐसे संभावित बच्चों की पहचान करके और लक्षित कार्रवाई करके यह प्रवृत्ति रोकी जा सकती है।


देखा जाए, तो सभी निजी स्कूल खराब नहीं हैं। कई अच्छी गुणवत्ता वाले हैं और वे बच्चों की शिक्षा और खैरियत के बारे में चिंतित हैं। मगर सच यही है कि ज्यादातर निजी स्कूल केवल अपना व्यावसायिक हित साधना चाहते हैं। निस्संदेह, महामारी ने हमारे मूल चरित्र को उजागर किया है। हमारी व्यक्तिगत आकांक्षाओं, डर, कमजोरियों और साहस, सबको। साथ ही, बतौर समाज हमारी विषमताओं, कमियों को भी बेपरदा कर दिया है। इनके अलावा, इसने यह भी बताया है कि जो काम सार्वजनिक हित में होने चाहिए, वह केवल सार्वजनिकता की भावना से ओत-प्रोत सामाजिक संस्थाएं ही कर सकती हैं। आम लोगों के हित की आड़ में कारोबार करने वाली निजी संस्थाओं की सरचनात्मक भ्रांतियां और अयोग्यताएं अब सामने आ चुकी हैं।


जाहिर है, समान, मजबूत और जीवंत सरकारी शिक्षा तंत्र का कोई विकल्प नहीं है। यह ठीक उसी तरह है, जैसे इस दुखद महामारी ने साफ कर दिया है कि प्रतिबद्ध निजी परोपकारी अस्पतालों की अच्छी संख्या होने के बावजूद उच्च गुणवत्ता वाले मजबूत सरकारी स्वास्थ्य तंत्र का कतई कोई विकल्प नहीं है।

✍️ अनुराग बेहर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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