Dev Deepawali 2021: देव दीपावली इस दिन, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि व महत्व

Dev Deepawali 2021: इस साल देव दीपावली गुरुवार 18 नवंबर 2021 को मनाई जाएगी

Dev Deepawali 2021: देव दीपावली इस दिन, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि व महत्व

देव दिवाली पूर्णिमा के दिन आने वाला उत्सव है। पूर्णिमा के इस दिन को सिक्ख धर्म की नींव रखने वाले गुरुनानक देव जी का जन्म दिवस भी होता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान श्री विष्णु जी की अराधना कर तुलसी के पौधे के सामने दीपक जला कर पूजा की जाती है। वनारस में इस दिन गंगा जी के पूजन के लिए विशेष आयोजन किया जाता है। त्रिपुरा उत्सव से जाने वाले इस पवित्र दिन के समय शिव जी की पूजा भी की जाती है। इसके पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। जिसके बारे में हम आपको आगे बताने जा रहे हैं। 

इसी के साथ आपको देव दिवाली मनाए जाने कारणों का भी ज्ञान हो जाएगा। गंगा स्नान को कार्तिक स्नान भी कहा जाता है जो कि बहुत फलदायी होता है। इस दिन को वाराणसी, गुजरात और भारत के कई क्षेत्रों में दीपावली की भांति ही मनाया जाता है। इस दिन घरों के अंदर और बाहर रंगोली बनाते है और हर जगह दीपक जलाकर घर और आंगन को सजाते हैं। कुछ भक्त इस दिन अखंड रामायण का पाठ करते हैं। भक्त पूरी रात भजन कीर्तन करके सांस्कृतिक नृत्य करके संगीत का आनंद उठाते हैं।

Dev Diwali -देव दिवाली कब होती है? 

हिंदुओं द्वारा प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या के दिन दीपावली का प्रसिद्ध त्योहार मनाया जाता है। इस दीपावली के पूरे पंद्रह दिनों के बाद यह देव दिवाली का पर्व आता है। इस अवसर पर कार्तिक मास की पूर्णिमा की तिथि होती है। मास के आधार पर इसे कार्तिक पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।

देव दीपावली क्यों मनाते हैं? 

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार वाराणसी को महाकाल की नगरी कहा जाता है और इस दिन सभी देवी और देवता इस स्थान पर एकत्रित होते हैं। एक प्राचीन कथा के अनुसार भगवान शिव ने इसी दिन त्रिपुरासुर नाम के राक्षस का वध करके सभी को इस राक्षस के अत्याचारों से मुक्त किया था। इस अवसर पर सभी देवताओं ने काशी में इकट्ठा हो कर दीपक जला कर इस दिन को मनाया था।

इस कार्तिक माह की पूर्णिमा के दिन के बाद से ही भगवान शिव को त्रिपुरारी नाम से भी जाना जाने लगा था। इसलिए हिंदू धर्म के अनुयायी इस दिन को पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ मनाते हैं। इसी दिन गुरुनानक जयंती का शुभ समय भी होता है।

वर्ष 2021 की देव दिवाली (Dev Diwali Date)

साल 2021 में 18 नवंबर को गुरुवार के दिन देव दिवाली का उत्सव होगा। इस कार्तिक मास में 4 नवंबर को दीपावली आएगी। दीपावली के पर्व पर भी गुरुवार का दिन है। देव दिवाली को मनाने के लिए पूर्णिमा की तिथि का ज्ञान होना अति आवश्यक है। इस साल पूर्णिमा की इस प्रकार रहेगी।

  • वर्ष 2021 में 18 नवंबर के दोपहर 12 बजे पूर्णिमा की तिथि आरंभ होकर अगले दिन शुक्रवार 2 बजकर 26 मिनट पर समाप्त हो जाएगी।
  • वही 18 नवंबर को शाम 5ः09 बजे से 7ः47 बजे तक प्रदोष काल का मुहूर्त रहेगा। इस 2 घंटे और 38 मिनट की अवधि को पूजा के लिए बहुत शुभ माना जाता है। दीपावली की पूजा भी प्रदोष काल में ही करना उत्तम माना गया है।

इस दिवस पर भी प्रदोष काल में पूजा का आयोजन किया जाता है। पूजा के उपरांत दीपदान करना बहुत ही शुभ माना जाता है और कई स्थानों में इसे परंपरा के तौर पर किया जाता है। ग्रंथों में दीपदान के साथ साथ अन्य दान को भी बहुत विशेष कहा गया है।

देव दिवाली का महत्व (Dev Diwali Significance)

Dev Deepawali 2021: देव दीपावली इस दिन, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि व महत्व


हिंदू धर्म में देव दिवाली का विशेष महत्व है, इसलिए देवी-देवताओं के पृथ्वी पर आने खुशी में काशी को सजाया जाता है। उत्तर प्रदेश में इस पर्व पर विशेष रूप से आयोजन किया जाता है। इस दिन गंगा माता के तट पर श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है। इस दिन गंगा जी में स्नान करने से मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है। इस दिन दूर दूर से भक्त हरिद्वार में गंगा स्नान करने के लिए यात्रा पर निकल जाते हैं। वाराणसी में इस दिन शहीदों को श्रद्धांजलि देने के साथ पुष्पांजलि अर्पित करते हुए याद किया जाता है। गंगा सेवा निधि द्वारा इसका आयोजन किया जाता है। 

गुरुनानक जयंती का उत्सव भी इस पूर्णिमा पर होता है। जिससे कि इस दिन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। सिक्ख धर्म के अनुयायियों के लिए यह दिन बहुत महत्वपूर्ण होता है। गुरुनानक देव जी ने अपना पूरा जीवन लोगों की भलाई और उनको उपदेश देने लगा दिया था। उन्होंने सत्संग और चिंतन द्वारा ही अपना ज्ञान प्राप्त किया था। बचपन में उनके द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने में शिक्षक असमर्थ रह जाते थे, जिससे कि बचपन में ही उनकी स्कूली शिक्षा छूट चुकी थी।

देव दिवाली का दिन वनारस में अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। गंगा माता जी का पूजन तट के हर किनारे पर देखने को मिलता है और दीपकों की रोशनी हर जगह वितरित होती है। पंचगंगा घाट पर सर्वप्रथम मिट्टी के दीपक जलाने की परंपरा की शुरुआत हुई थी।

Comments

Popular posts from this blog

Gove confirms mandatory housebuilding targets for councils will be abolished in face of Tory rebellion – UK politics live

Kotak Mahindra Bank Recruitment 2022 Released for Graduate Candidates And Apply Online