Kartik Mahatmya Chapter-32 | कार्तिक माहात्म्य-32- बत्तीसवां अध्याय

Kartik Mahatmya Chapter-32 | कार्तिक माहात्म्य-32- बत्तीसवां अध्याय 

Kartik Mahatmya Chapter-32 | कार्तिक माहात्म्य-32- बत्तीसवां अध्याय

सूतजी कहते हैं कि ध्वजारोपण (झण्डी लगाना) सब पापों को नाश करने वाला है। चारों वणों में से जो कोई भी भगवान के मन्दिर में झण्डी लगता है, वह ब्रह्मादि देवताओं से पूजित होकर विष्णु लोक को प्राप्त हो जाता है। नारदजी कहते हैं कि हे राजा पृथु ! हम तुम्हें एक पुरातन इतिहास सुनाते हैं । पूर्वकाल में सत्ययुग में सुमति नाम वाला एक चन्द्रवंशीय राजा था। यह राजा भगवान का भक्त, अहंकार रहित, सप्तद्वीप का राजा था । सत्यवती नाम वाली उनकी रानी अत्यन्त पतिव्रता थी । वह भगवान के सामने नृत्य किया करती तथा कार्तिक शुक्ला द्वादशी को भगवान के मन्दिर में ध्वजा बाधा करती थी। एक दिन राजा तथा रानी को देखने के लिए विभांडक ऋषि आये । राजा ने उनका अत्यन्त आदर सत्कार किया । 

तब राजा को ध्वजा रोपण करते हुए देखकर मुनि ने कहा, हे राजन् ! भगवान को प्रसन्न करने के और भी अनेक साधन हैं, परन्तु तुम्हारी इस ध्वजा रोपण में इतनी श्रद्धा क्यों है? राजा कहने लगा-हे मने ! एक अत्यन्त अद्भुत आश्चर्य युक्त इतिहास है जो मैं आपको सुनाता हूं। मैं पूर्व जन्म में मालिनि नाम वाला, कुमार्गी, ब्रह्माणद्वेषी, महापापी शूद्र था, साथ ही वेश्यागामी भी था । मेरे इन कर्मों को देखकर मेरे बन्धु-बांध वों ने मुझको त्याग दिया । इसके बाद मैं वन में जाकर एक टूटे हुए विष्णु मन्दिर में रहने लगा और वन के मृगादि जीव जन्तुओं को मार कर पेट भरने लगा । इसके पश्चात् विन्ध्याचल पर्वत पर रहने वाली कोकिलिनी नाम वाली निषाद की कन्या जिसने अपने पति को मार दिया था, भूख से व्याकुल हुई वहां पर आ गई और मेरे पास ही रहने लगी।  संयोगवश कार्तिक शुक्ला द्वादशी के दिन हमने एक कपड़े को बांधकर उसकी झण्डी-सी बनाई और दोनों मदिरा पान करके उस झण्डी जैसे कपड़े को ले विह्वल होकर सारी रात खूब नाचते रहे । सारी रात नृत्य करते रहे । सारी रात नृत्य करते रहने के कारण प्रातःकाल हम दोनों की मृत्यु हो गई।

तब यमदूत हमें फांसी में बांधकर मारते हुए यमराज के पास ले जाने लगे । उसी समय विष्णु भगवान के दूत विमान लेकर वहां पर आ गए और यमदूतों को धमकाते हुए बोले, तुम पापियों को यमपुरी ले जा सकते हो, धर्मात्माओं को नहीं।

परन्तु यमदूती भी अत्यन्त क्रोधित होकर कहने लगे कि यह दोनों महापापी हैं, इस कारण यह यमपुरी ले जाने योग्य हैं । इन दोनों ने जीवन भर एक भी पुण्य कार्य नहीं किया है । तब विष्णु पार्षद कहने लगे कि महाखेद की बात है कि तुमको धर्म-अधर्म का कुछ भी ज्ञान नहीं है । यह ठीक है कि ये दोनों सारी आयु महापापों में रत रहे हैं, परन्तु इन्होंने कार्तिक शुक्ला द्वादशी को भगवान के मन्दिरों में ध्वजा रोपण तथा नृत्य किया है अतः अब ये पापी नहीं रहे। इनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गये हैं । इस कारण ये विष्णु लोक में जाने के अधिकारी हैं, भले ही इन्होंने अनजाने में ही यह सब कार्य किये हैं। इसके पश्चात् विष्णु भगवान के दूत उन दोनों को विमान में बिठाकर विष्णु लोक को ले गए।

नारदजी कहते हैं कि हे राजा पृथु ! अनजाने में भी भी ध्वजा रोपण का ऐसा फल है तो श्रद्धा के साथ कार्तिक शुक्ला द्वादशी को जो ध्वजा रोपण करता है उसके फल का तो कहना ही क्या है। इतनी कथा सुनकर विभांडक ऋषि तपोवन को चले गये।

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