*अयोध्या, एक पिता के अन्तरमन व्यथा को बयां करती अनंग जी की सुन्दर कविता*

सतोष कुमार श्रीवास्तव, अयोध्या विधानसभा रिपोर्टर
" बाप हूं " 
ठोकरें खाकर गिरा,फिर भी खड़ा हूं।
'बाप हूं ' तुमको  बचाऊंगा , अड़ा हूं।। 
चोट   लग   जाए , न  तेरे   पांव  में।
फूल बनकर राह में , हरदम पड़ा हूं।। 
गोद,अंगुली, हाथ,कंधे सब तुम्हारे।
तेरी हर सांसो में , मैं ही तो जड़ा हूं।। 
बहकने  के  रास्ते , मैं  जानता  हूं।
अनुभवी आंखें हैं,मैं तुमसे बड़ा हूं।।
आंधियां,तूफान,लहरों से , लड़ूंगा। 
सांस है,वटवृक्ष हूं,जमकर गड़ा हूं।।
मेरे तन के बदबुओं से ,भागते हो।
हर बीमारी में तुम्हारे , में सड़ा हूं।।
फूट  जाऊंगा , तुम्हारे  सामने ही।
मैं दुवाओं से भरा,कच्चा घड़ा हूं।।
डांटता हूं कि,बिखरने से बचो तुम। 
नारियल की ही तरह,मैं भी कड़ा हूं।।
' बाप हूं ' तुमको बचा लूंगा खड़ा हूं।।..."अनंग "

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