क्या दोषसिद्ध अपराधी को कोर्ट जेल के बजाय घर भेज सकता है, जानिए PO Act 1958
probation of Offenders Act, 1958
अपराधी परिवीक्षा अधिनियम,1958 कानून एक ऐसा कानून हैं जिसमे न्यायालय की यह शक्ति प्राप्त है कि वह दोषसिद्ध अपराधी को जेल न भेज कर उसे सुधारने के लिए घर भेज सकता है। अर्थात न्यायालय अपराधी को एक बार सुधारने का मौका दे सकता है एवं उस पर अपराधी पर नजर रखने के लिए एक परिवीक्षा (परख) अधिकारी की भी नियुक्ति कर सकता है, जानिए न्यायालय किस प्रकार के अपराधी को जेल न भेजकर सुधारने के लिए घर भेज सकता है?
अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 की धारा 3 एवं धारा 4 की परिभाषा
न्यायालय निम्न प्रकार के दोषसिद्ध अपराधी को परिवीक्षा (परख या आजमाइश) पर जेल न भेजकर घर भेज सकता है जानिए:-
1. ऐसा कोई अपराध जिसकी सजा दो वर्ष से कम के कारावास की हो।
2. भारतीय दंड संहिता की धारा 379 (चोरी), 380 (घर में घुस कर चोरी करना), 381 (ऑफिस में अधिकारी की फाइल या संपत्ति की चोरी), धारा 404 (मृतक व्यक्ति की चोरी करना) एवं 420 (छल द्वारा संपत्ति को लेना) के अपराधी को प्रथम बार अपराध करने पर परिवीक्षा पर छोड़ा जा सकता है लेकिन इससे पहले उसके चरित्र को भी देखा जाता है।
3. अगर कोई ऐसा अपराध है जो मृत्यु दण्ड या आजीवन कारावास को छोड़कर तब अपराधी की अपराध के विचारण में अधिक समय तक जेल में रखा जाता है तब आरोप सिद्ध होने पर अपराधी को जेल न भेजकर परिवीक्षा पर सुधारने के लिए घर भेज दिया जाता है।
4. एक अच्छे आचरण वाले अपराधी को उचित शर्तो के अनुसार परिवीक्षा पर छोड़ दिया जाता है।
5. ऐसा कोई अच्छे चरित्र का अपराधी जो स्वंय अपने घर, परिवार का पालन पोषण करता हो जैसे कोई व्यक्ति अचानक लड़ाई के दौरान कोई गंभीर चोट कर दे और उस पर गंभीर चोट का अपराध सिद्ध हो जाता है। तब न्यायालय उसे जेल न भेजकर उसके चरित्र एवं परिवार का एकमात्र भरण पोषण करने वाला व्यक्ति समझ कर सुधारने के लिए घर भेज सकता है।
6. कोई भी बालक जो 18 वर्ष से कम आयु का हैं या कोई 21 वर्ष से कम उम्र का बालक जिसने प्रथम बार कोई अपराध किया है। जिसको दण्ड देने से उस पर गलत प्रभाव होगा अगर न्यायालय को लगता है तब परिवीक्षा पर छोड़ दिया जा सकता है।
किन अपराधी को परिवीक्षा पर नहीं भेजा जा सकता है जानिए:-
1. ऐसा अपराधी जिसको मृत्यु दण्ड दिया गया है या आजीवन कारावास दिया जा चुका हो लेकिन कार्यपालिका ऐसे अपराधी को क्षमादान दे सकती है न्यायालय नहीं।
2. महिला उत्पीड़न से सम्बंधित कोई भी अपराधी को जैसे पास्को एक्ट, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376, 354 कोई जघन्य अपराध करने वाले को परिवीक्षा पर नहीं छोड़ा जा सकता है।
अतः हम कह सकते हैं कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य है सुधारात्मक दण्ड प्रणाली को बड़ावा देना क्योंकि व्यक्ति से कभी-कभी एक अच्छे चरित्र, आचरण के व्यक्ति से गलती द्वारा अपराध हो जाता है जो वह करना नहीं चाहता है। न्यायालय ऐसे व्यक्ति को अगर जेल भेज देता है तब वह अपराधियो के साथ रहकर गलत चरित्र का हो सकता है इसलिए ऐसे अच्छे चरित्र वाले व्यक्ति को जेल न भेजकर जमानत पर या बिना जमानत के परिवीक्षा अधिकारी की निगरानी में समाज में वापस दुवारा भेज दिया जाता है ताकि वह सुधर जाए। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article)
:- लेखक बी.आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665
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