अल्पायु बच्चे की माँ क्या करे जानते हैं विख्यात वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से

अल्पायु बच्चे की माँ क्या करे जानते हैं विख्यात वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा से 

सेलिब्रिटी वास्तु शास्त्री डॉ सुमित्रा अग्रवाल
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हर माँ ही अपने बच्चे की सुरक्षा की चिंता करती है उसके लिए नाना प्रकार के जतन करती है,फिर चाहे वो उनका अपना करियर हो, या त्याग, बलिदान, संघर्ष जो भी हो सब करती है। तीज त्यौहार के व्रत तक करती है अपने परिवार और बच्चे की मंगल कामना के लिए,।कई बार संतान ना होने पर नाना प्रकार की यातनाएं भी भोगती है। कई बार बच्चा होता तो है पर उनकी जन्मपत्रिका में अल्पायु के योग होते हैं। इस विपरीत स्थिति में तो पैरों के नीचे से जैसे जमीन घिसक जाती है। ज्योतिष के उपायों के साथ माताएं व्रत, पूजा, पाठ और भगवान की शरण लेती है। ऐसा ही एक व्रत है व्रतजीवत्पुत्रिका व्रत, इस वर्ष १८ सितम्बर को ये मनाया जाएगा। 

इस व्रत को कौन करे : पुत्र की रक्षा एवं लंबी आयु के लिए माताएं ये व्रत करती हैं ताकि उनको आजीवन पुत्र शोक न सताए। यदि पुत्र का अल्पायु योग हो तो वह भी इस व्रत के प्रभाव से मिट जाता है और उसे पूर्ण आयु प्राप्त होती है। इसके अलावा जिनके पुत्र तो होते हो, लेकिन जीवित नहीं बचते,वे इस व्रत के करने से जीवित रहने लगते हैं। बच्चे का मरणदोष दूर हो जाता है। 
ज्योतिष में अल्पायु के विषय में बहुत कुछ बताया हुआ है। शुक्र, बृहस्पति और बुध अगर छठे, आठवें और बारहवें भाव में हो तो अल्पायु योग बनता है। बालारिष्ट योग में यहाँ तक बताना संभव है की बच्चे की मृत्यु २साल में होगी या ८ साल में होगी या १३ साल में होगी। अशुभ ग्रहों से दृष्ट चन्द्रमा छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो बच्चे की जन्म लेते ही तुरन्त मृत्यु हो जाती है, शुभ-अशुभ ग्रहों से दृष्ट चन्द्रमा छठे, आठवें या बारहवें भाव में चार साल के अन्दर मृत्यु हो जाती है।

पौराणिक कथा में ऐसा कहा जाता है कि इस व्रत के दिन प्राचीनकाल के अत्यंत प्रसिद्ध धर्मात्मा राजा जीमूतवाहन अपने त्याग से गरुड़ को प्रसन्न करके शंखचूड़ के सभी वंशधरों को मृत्युलोक वापस लाने में सफल हुए थे। 

कोनसे देव की पूजा होती है और किन चीजों को इस व्रत के दौरान अवस्य करें:- भगवान् सूर्यनारायण की आराधना कर बाजरे और चने से बना भोग लगाएं। अष्टमी के दिन व्रती प्रातःकाल में उड़द के कुछ साबुत दाने निगल जाती हैं, जिसका तात्पर्य श्रीकृष्ण भगवान् का मूल रूप में उदर में प्रवेश माना जाता है। अपने पुत्रों के गले में काले या लाल रंग के रक्षासूत्र या धागे को पहनावें। इस दिन उड़द तथा गेहूं के दान का बड़ा माहात्म्य बताया गया है। शास्त्रों में व्रत के दिन काटे हुए फल व शाक खाना वर्जित किया गया है। दही चिउड़े का भोग लगाकर पशु-पक्षियों के लिए थोड़ा भाग निकाल कर और तब स्वयं खाएं। महाभारत के कई किस्से प्रचलित है उनमे से एक कथा इस व्रत से भी जुड़ी है।  जब महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद, पांडवों की अनुपस्थिति में अश्वत्थामा ने अपने साथियों के साथ उनके शिविरों में घुसकर अनेक सैनिकों का वध कर दिया। यहां तक कि द्रौपदी के सोए हुए पुत्रों को भी पांडव समझकर मार दिया। अर्जुन ने अश्वत्थामा का पीछा किया और उसे कैद कर लिया, अश्वत्थामा का सिर मुंडवाकर उसे आजाद कर दिया गया। इस अपमान से अश्वत्थामा बुरी तरह से चिढ़ा और पांडवों का बीजनाश करने पर उद्यत हो गया। उसने अपना अमोघ अस्त्र निकाला और अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ पर चला दिया। भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवों की सहायता के लिए आए, उन्होंने सूक्ष्म रूप धारण कर उत्तरा के गर्भ में प्रवेश किया और अमोघ अस्त्र को अपने शरीर पर झेल लिया। उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु की रक्षा हो गई। लेकिन जब पुत्र का जन्म हुआ, तो वह काफी कमजोर व निष्क्रिय था। भगवान् कृष्ण ने उसमें शक्ति का संचार किया। यही पुत्र आगे चलकर परीक्षित के नाम से पांडव वंश का भावी कर्णधार बना। इस प्रकार परीक्षित को जीवनदान प्रदान करने वाले व्रत का नामकरण 'जीवत्पुत्रिका' किया गया।

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